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Moradabad Dehat Assembly seat: ऐसी सीट जहां बीजेपी को है अपनी दूसरी जीत का इंतजार

मुरादाबाद देहात सीट पर दबदबे की बात करें तो यह सीट मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र है और अब तक इस सीट के लिए हुए 16 चुनावों में 12 बार मुस्लिम विधायक चुनकर विधानसभा तक पहुंचे हैं. इस सीट पर 55 प्रतिशत मुस्लिम और 45 प्रतिशत हिंदू मतदाता हैं.

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सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
स्टोरी हाइलाइट्स
  • मुरादाबाद देहात से 16 चुनावों में 12 बार मुस्लिम विधायक जीते
  • 1993 में भाजपा को यहां से पहली और आखिरी बार मिली जीत
  • 2017 के चुनाव में सपा के हाजी इकराम कुरैशी ने जीत हासिल की

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले की मुरादाबाद देहात विधानसभा सीट है. मुरादाबाद शहर का एक बड़ा भाग इस विधानसभा में शामिल किया गया है. पिछले परिसीमन के बाद इस विधानसभा का भौगोलिक समीकरण काफी बदल गया है. 

सरकारी आंकड़ों के अनुसार मुरादाबाद देहात विधानसभा सीट पर 345451 मतदाता हैं जिसमें 1 लाख 88 हजार 650 पुरुष मतदाता और 1 लाख 56 हजार 788 महिला मतदाता व अन्य मतदाता हैं.

सामाजिक तानाबाना

अगर सीट पर दबदबे की बात करें तो यह सीट मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र है और अब तक इस विधानसभा के लिए हुए 16 चुनावों में 12 बार मुस्लिम विधायक चुनकर विधानसभा तक पहुंचे हैं. इस सीट पर 55 प्रतिशत मुस्लिम और 45 प्रतिशत हिंदू मतदाता हैं.

मुस्लिम मतदाताओं में अंसारी बिरादरी के वोटर्स की संख्या ज्यादा है तो वहीं हिंदू मतदाताओं में वैश्य, सैनी और ठाकुर बिरादरी के लोग शामिल हैं.

राजनीतिक प्रष्ठभूमि
1957 में अस्तित्व में आई मुरादाबाद देहात विधानसभा सीट का अपना ही राजनीतिक महत्व है. 1957 से 2017 तक इस सीट पर हुए 16 विधानसभा चुनावों में निर्दलीय से लेकर बड़ी-बड़ी राजनीतिक पार्टियों से जीतकर कई विधायक विधानसभा तक पहुंचे. 

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मुरादाबाद देहात विधानसभा के लिए 1957 से 2017 तक 16 विधानसभा चुनाव हो चुके हैं. मुरादाबाद देहात विधानसभा सीट पर 4 बार निर्दलीय तो 2 बार प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, 2 बार कांग्रेस, 1 बार लोकदल, 2 बार जनता दल, 1 बार भाजपा और 4 बार समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार चुनाव जीत चुके हैं.

1957 में हुए पहली बार विधानसभा चुनाव में खमानी सिंह निर्दलीय विधायक चुने गए थे. उसके बाद 1962 के विधानसभा चुनाव में समीकरण बदले और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से चुनाव लड़े रियासत हुसैन विधायक चुने गए.

1967 में एक बार फिर खमानी सिंह कांग्रेस का दामन थामकर मैदान में उतरे और उनका मुकाबला फिर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के रियासत हुसैन से हुआ जिसमें खमानी सिंह ने रियासत हुसैन से बाजी जीत ली और विधायक चुन लिए गए, लेकिन रियासत हुसैन लगातार सक्रिय रहे और 1969 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के रियासत हुसैन ने मैदान मार लिया और विधायक चुन लिए गए.

यह वो दौर था, जब मुरादाबाद देहात विधानसभा की राजनीति खमानी सिंह और रियासत हुसैन के ही इर्द-गिर्द रहती थी, लेकिन 1974 के चुनाव परिणाम ने हैरान कर दिया और इन दोनों राजनेताओं को नकारते हुए देहात विधानसभा की जनता ने चुनाव मैदान में निर्दलीय उतरे ओमप्रकाश को अपना विधायक चुन लिया.

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1977 में हुए विधानसभा चुनावों तक प्रजा सोशलिस्ट पार्टी का अस्तित्व भी समाप्त हो चुका था, लेकिन रियासत हुसैन हिम्मत नहीं हारे. 1977 और 1980 के विधानसभा चुनाव में रियासत हुसैन लगातार दो बार निर्दलीय विधायक का ताज लेकर विधानसभा तक पहुंचे.

सिर्फ एक बार भाजपा को मिली जीत
हालांकि फिर दौर बदला और 1985, 1989, 1991 में हुए विधानसभा चुनावों में एक बार लोकदल और दो बार जनता दल ने इस सीट पर जीत हासिल की. 1993 के विधानसभा चुनाव आने तक भाजपा और अयोध्या प्रकरण के बाद लहर में आ चुकी थी जिसका असर मुरादाबाद देहात विधानसभा सीट पर भी देखने को भी मिला और पहली बार 1993 में भाजपा ने बाजी मार ली और सुरेश प्रताप सिंह विधानसभा के अंदर पहुंच गए.

हालांकि भाजपा के लिए ये पहली और आखिरी जीत ही साबित हुई और आज तक फिर से भाजपा का खाता तक नहीं खुल पाया. 1996 में समाजवादी से सौलत अली विधायक चुन लिए गए. लगातार तीन बार विधायक रहे रिजवान उल हक की मौत के बाद उनके छोटे भाई शमीम उल हक ने उनकी राजनीतिक विरासत संभाल लिया. 

लिहाजा 2002 के विधानसभा चुनाव में शमीम उल हक ने कांग्रेस से चुनावी मैदान में उतरकर बाजी मारी और विधायक बने, लेकिन 2007 में विधानसभा चुनाव आते-आते शमीम उल हक ने अपने मरहूम भाई की राजनीतिक विरासत अपने भतीजे उस्मान उल हक के हाथ सौंप दी. 2007 में उस्मान उल हक सबसे कम उम्र के विधायक चुन लिए गए.

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लेकिन एक हत्याकांड में उस्मान उल हक को आजीवन कारावास की सजा हो गई और वो जेल चले चले गए. विधायक भतीजे के जेल चले जाने के बाद शमीम उल हक फिर सक्रिय हुए और 2012 में सहानुभूति का लाभ लेते हुए समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव में उतरे और अपने आपको साबित करते हुए विधायक बनकर मुरादाबाद देहात विधानसभा का नेतृत्व किया.

हालांकि शमीम उल हक की आकस्मिक मौत हो जाने के बाद 2017 में समाजवादी पार्टी से मुरादाबाद शहर के रहने वाले हाजी इकराम कुरैशी को मौका दिया गया. हाजी इकराम कुरैशी समाजवादी पार्टी में जिलाध्यक्ष सहित 2012 की सपा सरकार में राज्यमंत्री तक रह चुके हैं. मुरादाबाद देहात विधानसभा की जनता ने हाजी इकराम कुरैशी को अपना विधायक चुन लिया.
 
2017 का जनादेश

मुरादाबाद विधानसभा चुनाव 2017 में सपा ने देहात विधानसभा से अपने उम्मीदवार के रूप में सपा जिलाध्यक्ष और सपा सरकार में दर्जा राज्यमंत्री रहे हाजी इकराम कुरैशी को चुनाव मैदान में उतारा. उसके ठीक उलट भाजपा ने भी जिलाध्यक्ष हरिओम शर्मा पर दांव खेला लेकिन हरिओम शर्मा से कड़े मुकाबले में हाजी इकराम कुरैशी ने 97916 वोट हासिल करते हुए जीत हासिल कर ली.

जबकि दूसरे नंबर पर रहे हरिओम शर्मा को 69135 वोट मिल पाए. तीसरे नंबर पर राष्ट्रीय लोकदल के कामरान उल हक को 23404 वोट मिले जबकि बसपा के पन्नालाल सैनी 20054 वोट पाकर चौथे पायदान पर रहे.

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विधायक का रिपोर्ट कार्ड
हाजी इकराम कुरैशी का जन्म 10 अक्टूबर 1958 को मुरादाबाद में ही हुआ. हाजी इकराम कुरैशी ने हाई स्कूल तक की शिक्षा मुरादाबाद में ग्रहण की है. 1979 में इकराम ने तनवीर बानो को अपनी जीवनसंगिनी बनाया. हाजी इकराम कुरैशी लंबे समय से समाजवादी पार्टी में सक्रिय हैं और कई बार जिलाध्यक्ष भी रह चुके हैं.

उनकी सक्रियता और पार्टी के प्रति निष्ठा देखते हुए बिना चुनाव लादे 2012 में सपा सरकार के सत्ता में आने के बाद इकराम कुरैशी को आवश्यक वस्तु निगम का अध्यक्ष बनाया गया था. जनवरी 2017 में उन्हें एक बार फिर समाजवादी पार्टी का जिलाध्यक्ष बनाया गया, लेकिन इकराम कुरैशी के टिकट मांगने के बाद उनका नाम मुलायम सिंह यादव द्वारा 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों की सूची में शामिल नहीं किया गया मगर अखिलेश यादव ने उन्हें अपनी सूची में शामिल कर लिया और उन्हें मुरादाबाद देहात विधानसभा के लिए उम्मीदवार घोषित कर दिया.

इकराम कुरैशी ने समाजवादी पार्टी की जातिगत समीकरण की रणनीति को फिट किया था और इतना ही नहीं पार्टी में पारिवारिक कलह में अखिलेश यादव का समर्थन करने के लिए भी उम्मीदवार बनाया गया. 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में देहात विधानसभा से इकराम कुरैशी अपने निकटतम प्रतिद्वंदी भाजपा के उम्मीदवार हरिओम शर्मा को लगभग 28 हजार वोटों से हराकर विजयी हुए.

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