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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की सियासी सरगर्मियों के बढ़ने के साथ-साथ राजनीतिक गठजोड़ और सियासी समीकरण भी सेट किए जाने लगे हैं. कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी और आरएलडी प्रमुख जयंत चौधरी के बीच रविवार को लखनऊ एयरपोर्ट पर मुलाकात हुई. इस दौरान दोनों नेताओं के बीच बातचीत भी हुई है.
हालांकि, सपा और आरएलडी का गठबंधन तय है, लेकिन सीट शेयरिंग के फॉर्मूले पर अभी तक सहमति नहीं बनी है. ऐसे में प्रियंका-जयंत की मुलाकात के बाद सवाल खड़े होने लगे हैं कि क्या यूपी में गठबंधन का समीकरण बदलेगा?
कहां हुई मुलाकात?
प्रियंका गांधी रविवार को गोरखपुर से जनसभा करके लखनऊ से दिल्ली के लिए लौट रही थी जबकि जयंत चौधरी लखनऊ में अपनी पार्टी का चुनावी घोषणा पत्र जारी करके दिल्ली वापस लौट रहे थे. प्रियंका-जयंत दोनों ही एक ही समय राजधानी लखनऊ के चौधरी चरण सिंह हवाईअड्डे एयरपोर्ट पर पहुंच गए. इस दौरान एयरपोर्ट के वीआईपी लाउंज में दोनों नेताओं की मुलाकात हो गई, जहां एक-दूसरे का हाल-चाल जाना और कुछ देर तक उनमें बातचीत हुई हैं.
आरएलडी नेता शाहिद सिद्दीकी ने aajtak.in से इस मुलाकात की पुष्टि की है. हालांकि, उन्होंने कहा है कि इस मुलाकात के राजनीतिक मायने न निकाले जाएं. कांग्रेस से हमारे अच्छे रिश्ते रहे हैं, और आगे भी मुलाकातें होती रहेंगी.
अखिलेश से भी हुई थी प्रियंका की मुलाकात
प्रियंका-जयंत के बीच एयरपोर्ट पर हुई मुलाकात के दौरान किस मुद्दे पर बातचीत हुई, इसे लेकर सियासी कयास लगाए जा रहे हैं. हालांकि, इसी तरह पिछले दिनों दिल्ली से लखनऊ आते वक्त विमान में प्रियंका गांधी और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के बीच भी मुलाकात और बातचीत हुई थी.
प्रियंका गांधी और जयंत चौधरी के बीच मुलाकात ऐसे समय हुई है जब कांग्रेस यूपी में एक मजबूत सहयोगी के तलाश में है जिसके सहारे 2022 के चुनावी नैया पार लगा सके. कांग्रेस के यूपी ऑब्जर्वर व छत्तीसगढ़ के सीएम भूपेश बघेल ने हाल ही में गठबंधन के लिए छोटे दलों को ऑफर दिया है. किसान आंदोलन से आरएलडी को पश्चिम यूपी में राजनीतिक संजीवनी मिली है, जिसके चलते कांग्रेस की नजर जयंत चौधरी पर है.
सपा-आरएलडी के गठबंधन में सीटें फाइनल नहीं!
हालांकि, यूपी में सपा और आरएलडी का गठबंधन लगभग तय माना जा रहा था, लेकिन सीट शेयरिंग के लेकर पेच फंसा हुआ है. दोनों ही दलों के बीच अभी तक सीट बंटवारे को लेकर तो कोई सहमति बन पाई है और न ही कोई फॉर्मूला सामने आया है. वहीं, कांग्रेस और आरएलडी दोनों ही सूबे में अपना सियासी वजूद बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं. दोनों के राजनीतिक भविष्य के लिए उत्तर प्रदेश का यह चुनाव बेहद अहम है.
अखिलेश यादव से पत्रकार जब भी सवाल पूछते हैं कि आरएलडी को कब और कितनी सीटें देंगे तो इस पर वो जवाब देने से बचते रहे हैं. वहीं, जयंत चौधरी भी अभी तक खुलकर गठबंधन को लेकर बयान नहीं दे रहे हैं और उन्होंने 2022 तक के लिए टाल दिया है. ऐसे में प्रियंका गांधी के साथ जयंत चौधरी की एयरपोर्ट पर हुई मुलाकात के बाद अब सूबे की सियासत में नए तरह से सियासी समीकरण को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं.
हुड्डा और जयंत भी हो चुकी है मुलाकात
दरअसल, कांग्रेस ने दीपेंद्र हुड्डा को आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए स्क्रीनिंग कमेटी का सदस्य नियुक्त किया है. दीपेंद्र और जयंत चौधरी दोनों ही जाट समुदाय से आते हैं और उनके बीच रिश्ते भी बहुत अच्छे हैं. ऐसे में कांग्रेस सांसद दीपेंद्र हुड्डा और जयंत चौधरी के बीच हाल ही में कई बार मुलाकात हुई हैं. यूपी में जाट समुदाय को साधने लिए कांग्रेस ने दीपेंद्र हुड्डा को लगा रखा है.
किसान आंदोलन आरएलडी के लिए सियासी ऑक्सीजन का काम कर रहा है. किसानों के हर मंच पर जयंत चौधरी लगातार खड़े हुए नजर आ रहे हैं तो प्रियंका गांधी भी किसानों के मुद्दे पर मुखर हैं. आरएलडी यूपी में 65 से 70 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी में जिसमें सबसे ज्यादा सीटें पश्चिम यूपी की है तो कुछ सीटें पूर्वांचल के इलाके की भी है. इस पर सपा सहमत नहीं है.
लोकसभा चुनाव 2019 में आएलडी को महज तीन सीटें सपा-बसपा ने दी थी. ऐसे में सपा 2022 के विधानसभा चुनाव में 15 से 22 सीटें ही देने के मूड में है, जिस पर आरएलडी राजी नहीं है. इसकी वजह यह भी है कि जयंत चौधरी ने दूसरे दलों के नेताओं को बड़ी संख्या में पार्टी में शामिल कर लिया है, वो सब टिकट के दावेदारी कर रहे हैं. आरएलडी उन्हीं सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है, जहां जाट और मुस्लिम निर्णायक भूमिका में है.
कांग्रेस पश्चिम यूपी की सियासी समीकरण को देखते हुए 2009 के लोकसभा चुनाव की तरह आरएलडी के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की संभावनाओं पर काम शुरू कर दिया है. आरएलडी को मानमाफिक सीटें सपा भले ही न दे रही है, लेकिन कांग्रेस दे सकती है. इसीलिए जयंत चौधरी के साथ दीपेंद्र हुड्डा के बाद अब प्रियंका गांधी की मुलाकात के सियासी मायने निकाले जा रहे हैं.
2009 की तरह बन रहा यूपी का माहौल
बता दें कि 2009 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी यूपी में कांग्रेस को 15 सीटें दे रही थी, जिसके चलते गठबंधन पर बात नहीं बन सकी थी. इसके बाद कांग्रेस ने आरएलडी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था और पश्चिम यूपी से लेकर तराई बेल्ट की ज्यादा तर सीटें दोनों दलों के खाते में गई थी. कांग्रेस ने सपा के बराबर 22 सीटें जीतने में सफल रही जबकि आरएलडी पांच सीटें जीती थी. इस बार भी पश्चिम यूपी और तराई बेल्ट में किसान नाराज है. ऐसे में सूबे के बदले हुए सियासी और मौके की नजाकत को देखते हुए आरएलडी क्या सपा का साथ छोड़कर और कांग्रेस से हाथ मिलाएगी?