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स्वामी प्रसाद मौर्य के जाने से बीजेपी के 'विनिंग फॉर्मूले' पर चोट, बनेंगे सपा की नई राजनीति का चेहरा?

Swami Prasad Maurya: पांच साल पहले बीजेपी ने गैर-यादव ओबीसी वोटों को जोड़कर यूपी की सत्ता का वनवास खत्म किया था, लेकिन अब यही समीकरण बिखरने का डर उसे सता रहा है. ऐसे में अखिलेश यादव गैर-यादव ओबीसी वोटों को सपा से जोड़ने के लिए स्वामी प्रसाद मौर्या जैसे चेहरे के सहारे सियासी दांव चल रहे हैं.

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स्वामी प्रसाद मौर्य, अखिलेश यादव, रोशनलाल वर्मा
स्वामी प्रसाद मौर्य, अखिलेश यादव, रोशनलाल वर्मा
स्टोरी हाइलाइट्स
  • यूपी में सात चरणों में विधानसभा चुनाव होने हैं
  • बीजेपी गैर-यादव ओबीसी वोटों के सहारे सत्ता में
  • स्वामी प्रसाद बीजेपी में रहकर भी फिट नहीं हुए

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में सपा प्रमुख अखिलेश यादव बीजेपी के पुराने फार्मूले की तर्ज पर नई सोशल इंजीनियरिंग बनाने में जुटे हैं. इसी कड़ी में योगी मंत्रिमंडल से स्वामी प्रसाद मौर्य का इस्तीफा देना बीजेपी के लिए किसी खतरे की घंटी से कम नहीं है. पांच साल पहले बीजेपी ने गैर-यादव ओबीसी वोटों को जोड़कर सत्ता का वनवास खत्म किया था, लेकिन अब यही समीकरण बिखरने का डर उसे सता रहा है. ऐसे में अखिलेश यादव ने गैर-यादव ओबीसी वोटों को सपा से जोड़ने के लिए स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे चेहरे के सहारे सियासी दांव चला है. 

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2017 के चुनाव में उत्तर प्रदेश की सियासत में बीजेपी ने गैर-यादव ओबीसी का फॉर्मूला बनाया था. गैर-यादव ओबीसी ने बीजेपी को सत्ता में पहुंचाया. बीजेपी को अब सबसे बड़ा डर इसी बात का सता रहा है कि कहीं यह गैर यादव ओबीसी अखिलेश यादव के साथ न मिल जाएं, क्योंकि सपा की पूरी कोशिश इसी वोट बैंक पर लगी है. इस सियासी समीकरण को अमलीजामा पहनाने के लिए अखिलेश यादव हरसंभव कोशिश में जुटे हैं, जिसके तहत लालजी वर्मा, रामअचल राजभर के बाद अब स्वामी प्रसाद मौर्य को अपने साथ मिलाया है.

स्वामी प्रसाद की राजनीतिक विचाराधारा

गैर-यादव ओबीसी वोटबैंक को ही अपने पाले में लाने के लिए बीजेपी के दूसरे सबसे बड़े गैर-यादव ओबीसी चेहरे स्वामी प्रसाद मौर्य को सपा ने तोड़ लिया है. आधिकारिक तौर पर भले ही स्वामी प्रसाद की जॉइनिंग बाकी है, लेकिन 14 जनवरी को वो अपने समर्थकों के साथ अखिलेश यादव की साइकिल पर सवार हो जाएंगे. इसके बाद यूपी के सियासी संग्राम में जातिगत लड़ाई नया मोड़ लेने वाली है.

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स्वामी प्रसाद तीन दशक से सियासत में हैं और बसपा में रहते हुए पिछड़ों और अतिपिछड़ों की राजनीति करते रहे हैं. बौद्ध धर्म के अनुयायी हैं और अंबेडकरवाद व कांशीराम के सिद्धांतों पर चलने वाले नेता रहे हैं. यही वजह थी कि बीजेपी उनकी कभी नेचुरल चॉइस नहीं रही, लेकिन मोदी लहर और अतिपिछड़ी जातियों के बीजेपी के साथ खड़ी होने के चलते कमल थाम लिया था. 

हालांकि, बीजेपी में रहते हुए भी स्वामी प्रसाद दलित-पिछड़ों के इर्द-गिर्द अपनी राजनीति को रखा और पांच साल के बाद पार्टी को अलविदा कह दिया है. इस्तीफा देने के साथ ही उन्होंने योगी सरकार पर दलित, पिछड़ों, किसानों और नौजवानें के साथ उपेक्षा का आरोप लगाया और बीजेपी के ईट से ईट बजा देने की चुनौती दे दी है. 

स्वामी से क्या सपा को मिलेगा सियासी फायदा

स्वामी प्रसाद के बीजेपी छोड़ से सीधा फायदा सपा को होता दिख रहा है. सपा को एक मंझा हुआ गैर-यादव ओबीसी चेहरा मिल गया है, जो खुद मौर्य समाज से आते हैं. यादव-कुर्मी के बाद मौर्य तीसरी सबसे बड़ी ओबीसी जाति है और स्वामी प्रसाद की पकड़ ओबीसी और अति पिछड़ी जातियों में ठीक ठाक है. 

स्वामी प्रसाद मौर्य ने कभी भी अपने आपको सर्वजन का नेता नहीं कहा है बल्कि सिर्फ दलित पिछड़े अति पिछड़े समाज की बात करते रहे. समाजवादी पार्टी को यह नैरेटिव इसलिए मुफीद लग रहा है, क्योंकि उनके पास बड़ा वोट बैंक तो पहले से तैयार है. ऐसे में अगर पिछड़ी और अति पिछड़ी जातियों का बड़ा चेहरा आता है तो सियासी तौर पर सपा को बड़ा फायदा हो सकता है. 

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स्वामी के साथ ओबीसी नेताओं का समूह

स्वामी प्रसाद के साथ जिन नेताओं और विधायकों ने बीजेपी छोड़ने का ऐलान किया है, उसमें ब्रजेश प्रजापति, जो ओबीसी के कुम्हार जाति से हैं. प्रजापित समाज के गिने चुने विधायक में ब्रजेश प्रजापति का नाम है. ऐसे में सांकेतिक ही सही लेकिन बीजेपी से अलग होना इस वोट बैंक को नुकसान पहुंचा सकता है. बिल्हौर से भगवती सागर, जो दलित जाति कुरील से आते हैं. विधायक रोशनलाल वर्मा है, जो लोध बिरादरी से ताल्लुक रखते हैं. रोशनलाल वर्मा ने ही जितिन प्रसाद को 2017 चुनाव में हराया था. इसके अलावा विनय शाक्य, जो मौर्य समाज के शाक्य समाज से आते हैं. 

स्वामी प्रसाद मौर्य के साथ जाने वाले ज्यादातर लोग अति पिछड़ी और पिछड़ी जातियों के विधायक होंगे. ऐसे में कहीं ना कहीं ये सपा का माहौल मजबूत करने में मददगार होंगे और साथ ही सपा का वो टैग भी हटाने में इनकी भूमिका होगी कि समाजवादी पार्टी यादवों की पार्टी है. अखिलेश यादव इस यादव टैग को हटाने के लिए पिछले 5 साल से बहुत मेहनत कर रहे हैं और यही वजह है कि उन्होंने अपने संगठन में लगभग 45 फीसदी गैर यादव जातियों को तरजीह दे रखी है. 

दारा सिंह चौहान-धर्म सिंह सैनी

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स्वामी प्रसाद मौर्य के साथ जिन और दूसरे नामों की चर्चा है, उसमें योगी के कैबिनेट मंत्री दारा सिंह चौहान का नाम भी शामिल है. हालांकि, दारा सिंह चौहान खामोशी अख्तियार किए हुए हैं, लेकिन चर्चा है कि वह पार्टी नेतृत्व से मिलेंगे. पूर्वांचल में चौहान जिन्हें नोनिया जाति के नाम से भी जाना जाता है, जो बड़ी तादाद में 2014 के बाद यह जाति बीजेपी के साथ जुड़ी थी.

2017 में अमित शाह के ऑपरेशन ओबीसी के तहत दारा सिंह चौहान भी बसपा से बीजेपी में आए थे, लेकिन माना जा रहा है कि देर सवेर दारा सिंह चौहान भी स्वामी प्रसाद मौर्य के साथ ही सपा का रुख करेंगे. ऐसे में बीजेपी की पूरी कोशिश है कि दारा सिंह चौहान को रोका जाए. 

वहीं, धर्म सिंह सैनी जो कि सैनी समुदाय से हैं और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले की नकुड़ सीट से लगातार चुनाव जीत रहे हैं. बीजेपी डैमेज कंट्रोल में जुटी तो सबसे पहले धर्म सिंह सैनी का वीडियो जारी किया, जिसमें वह यह कहते सुने गए कि वह फिलहाल बीजेपी में है, लेकिन साथ ही उन्होंने स्वामी प्रसाद मौर्य को अपना बड़ा भाई बताया. धर्म सिंह सैनी फिलहाल इंकार कर रहे हैं, लेकिन समाजवादी पार्टी जाने कि इन की संभावना भी बनी हुई है.

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स्वामी क्या सपा के ओबीसी चेहरा होंगे

दरअसल स्वामी प्रसाद मौर्य यूपी में अकेले ऐसे ओबीसी नेता हैं, जिनके साथ बड़े ओबीसी नेताओं का एक पूरा समूह जुड़ा है. इसी के चलते उनके साथ दर्जनभर विधायक और लगभग आधा दर्जन ऐसे बड़े नेता जो मंत्री हैं. वह कभी भी पाला बदल सकते हैं. वो जब बसपा से बीजेपी आए थे तब भी ऐसा हुआ था और आज जब वह बीजेपी से सपा जा रहे हैं तब भी ऐसा होने की पूरी उम्मीद है.

फिलहाल बीजेपी का डैमेज कंट्रोल जारी है बीजेपी के बड़े नेता की माने तो स्वामी प्रसाद मौर्य के साथ जाने वाले तमाम वह नेता हैं. जिनका टिकट इस बार कटना तय माना जा रहा है, लेकिन बीजेपी का डैमेज कंट्रोल कितना असर दिखाता है और जिन बड़े नेताओं के नाम स्वामी प्रसाद मौर्य के साथ सपा में जाने वालों की फेहरिस्त में जुड़ रहे हैं. क्या वह रुकते हैं या फिर स्वामी प्रसाद मौर्या के साथ का रुख करते हैं यह जल्द ही तय हो जाएगा. ऐसे में एक बात साफ है कि इस बार बीजेपी अकेले या इकलौती ऐसी पार्टी नहीं होगी जो गैर यादव ओबीसी वोट पर दावेदारी करेगी बल्कि सपा भी इसमें सेंधमारी करेगी? 

 

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