उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए राजनीतिक पार्टियां अपने-अपने सियासी समीकरण और राजनीतिक गठजोड़ बनाने में जुटी हैं. बीजेपी ने सूबे में अपनी सत्ता को बचाए रखने के लिए निषाद पार्टी और अपना दल (एस) से गठबंधन कर रखा है तो सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा सहित कई छोटी पार्टियों के साथ हाथ मिलाया है. कांग्रेस ने गठबंधन के लिए छोटे दलों को खुला ऑफर दे रखा है, लेकिन अभी तक कोई भी पार्टी तैयार नहीं है. ऐसे में क्या वजह है कि कांग्रेस के साथ यूपी में कोई दल हाथ मिलाने को तैयार नहीं है.
यूपी में अपनी हालत सुधारने के लिए कांग्रेस जीतोड़ मेहनत करती हुई नजर आ रही है. सूबे में कांग्रेस की कमान प्रियंका गांधी संभाले हुए हैं और एक के बाद एक लोकलुभावने घोषणा कर रही हैं. साथ ही कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं में जोश भरने के काम में जोर-शोर से लगी हुई हैं. ऐसे में कांग्रेस कशमकश में फंसी हुई है कि कैसे पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी की छवि और लोकप्रियता को बचाए रखा जाए. 2022 के चुनाव में कांग्रेस बेहतर नहीं कर पाई तो उसका सीधा असर प्रियंका गांधी पर पड़ेगा. इसी के मद्देनजर कांग्रेस ने सूबे में गठबंधन के लिए अपने दरवाजे खोल दिए थे.
कांग्रेस के लिए क्यों गठबंधन अहम है?
गठबंधन की राजनीति के इस दौर में कांग्रेस उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में बिल्कुल अकेले पड़ गई है. कांग्रेस के लिए गठबंधन कितना जरूरी है, इसे बंगाल विधानसभा चुनाव और हाल ही में हुए बिहार में दो सीटों पर हुए उपचुनाव के परिणाम से समझ सकते हैं. बंगाल में कांग्रेस का खाता नहीं खुला. वहीं. कांग्रेस 2020 के चुनाव में बिहार के कुशेश्वरस्थान सीट पर गठबंधन में लड़ी थी. उसके उम्मीदवार को दूसरा स्थान मिला था. लेकिन उपचुनाव में कांग्रेस गठबंधन से अलग होकर लड़ी तो जमानत भी नहीं बचा पाई. इसीलिए कांग्रेस यूपी में गठबंधन के लिए बेताब नजर आ रही है.
कांग्रेस ने गठबंधन के लिए दिया ऑफर
बता दें कि कांग्रेस के यूपी चुनाव ऑब्जर्वर और छत्तीसगढ़ के सीएम भूपेश बघेल ने पिछले दिनों कहा था कि यूपी में अभी हमारा किसी से गठबंधन नहीं, लेकिन छोटे दलों को साथ लेकर चलेंगे. गठबंधन के लिए कांग्रेस दरवाजे सभी के लिए खुले हुए हैं. प्रियंका गांधी ने भी लखनऊ दौरे पर गठबंधन के विकल्प खुले रहने की बात कही थी. बसपा से लेकर आरएलडी तक से कांग्रेस के गठबंधन की चर्चाएं तेज हो गई थी.
बसपा सुप्रीमो मायावती ने कांग्रेस से गठबंधन के सवाल पर मंगलवार को साफ तौर पर कहा कि हम यूपी विधानसभा चुनाव 2022 के लिए किसी भी दल के साथ चुनावी समझौता नहीं करेंगे और अकेले ही चुनाव लड़ेंगे. बसपा जनता से गठबंधन करेंगी और प्रदेश में सरकार बनाएंगे. वहीं, सपा अखिलेश यादव भी साफ कह चुके हैं कि 2022 के चुनाव में कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं करेंगे बल्कि छोटे दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ेंगे.
आरएलडी ने कांग्रेस से किया किनारा
सपा और बसपा के पूरी तरह किनारा कर लेने के बाद कांग्रेस की कोशिश पश्चिम यूपी में आरएलडी के साथ तालमेल करने की थी. इस बात को तब बल मिला जब पिछले दिनों आरएलडी प्रमुख जयंत चौधरी से प्रियंका गांधी की लखनऊ एयरपोर्ट पर हुई मुलाकात हुई. ऐसे में यह चर्चाएं तेज हो गई थी कि कांग्रेस ने जयंत चौधरी को यूपी में गठबंधन करने के लिए राज्यसभा भेजने का आश्वासन दिया है. ऐसे में आरएलडी प्रमुख जयंत चौधरी ने भी साफ कर दिया है कि यूपी में कांग्रेस के साथ उनका कोई तालमेल नहीं होगा बल्कि सपा के साथ गठबंधन की बातचीत चल रही है. अखिलेश यादव ने तो साफ कह दिया कि 21 नंवबर को आरएलडी के साथ गठबंधन की घोषणा करेंगे.
मायावती और जयंत चौधरी के बयान से कांग्रेस के गठबंधन की कोशिशों को झटका लगा. कांग्रेस को उम्मीद थी कि मायावती और जयंत के साथ आने में सूबे में एक मजबूत विकल्प खड़ा कर सकेंगी. खास तौर पर पश्चिम यूपी में जयंत चौधरी किसान आंदोलन के चलते ट्रंप कार्ड के तौर पर हैं. जयंत और मायावती के इनकार के बाद यूपी के सियासी संग्राम में कांग्रेस बिल्कुल अकेली पड़ गई है.
कांग्रेस के सियासी प्रयोग फेल रहे
दरअसल, कांग्रेस यूपी में पिछले 3 दशक से सत्ता से बाहर है, जिसके चलते पार्टी के बड़े नेता पार्टी छोड़कर चले गए हैं और जनाधार भी खिसक गया है. 1989 के बाद से कांग्रेस यूपी में वापसी के लिए तमाम सियासी प्रयोग करती रही है, लेकिन सफल नहीं रही. कांग्रेस ने 2017 का विधानसभा चुनाव सपा के साथ लड़ा था. राहुल गांधी-अखिलेश यादव के इस गठबंधन को जनता ने नकार दिया था. सपा 47 और कांग्रेस 7 सीटों पर सिमट गई थी. इससे पहले 1996 में कांग्रेस ने बसपा के साथ मिलकर चुनावी मैदान में उतरी थी, जो सफल नहीं रहा. ऐसे ही कांग्रेस ने यूपी में आरएलडी के साथ भी मिलकर भी चुनावी किस्मत आजमा चुकी है.
बसपा से लेकर सपा और आरएलडी उत्तर प्रदेश 2022 चुनाव में कांग्रेस के साथ आने को तैयार नहीं है. इसके लिए पुराने अनुभव को सामने रखा जा रहा है, क्योंकि सूबे में जिस भी पार्टी ने कांग्रेस के साथ हाथ मिलाया है उसका सियासी बंटाधार हुआ है. सपा सत्ता में रहते हुए 2017 में सबसे प्रदर्शन किया था. मायावती के साथ सबसे रोड़ा पंजाब का चुनाव है जिसमें कांग्रेस और बसपा आमने-सामने हैं. इतना ही नहीं यूपी का प्रभारी बनने के बाद प्रियंका ने कई बार बसपा पर निशाना साध चुकी हैं तो मायावती ने भी कांग्रेस पर सवाल खड़ी करती रही हैं.
बसपा-कांग्रेस के बीच तालमेल में दिक्कत
यूपी में बसपा और कांग्रेस के रिश्ते पहले से ही ठीक नहीं हैं. प्रियंका गांधी का भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर से मुलाकात ने भी बसपा को असहज किया है. इसके अलावा सबसे बड़ी वजह बसपा का अकाली दल से गठबंधन है, जिसके चलते कांग्रेस से उसके रिश्ते को प्रभावित किया है. पंजाब के साथ ही यूपी में चुनाव होने हैं. पंजाब में जिन 20 सीटों पर बसपा चुनाव लड़ेगी, उनमें से 18 कांग्रेस के पास हैं. यूपी में जिस तरह से पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी सक्रिय हुए हैं, बसपा उससे भी परेशान है.
वहीं, कांग्रेस भी सूबे में अपने सियासी वजूद के बचाए रखने के लिए जद्दोजहद में है. कांग्रेस में एक धड़ा है, जिनका मानना है कि 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बीजेपी की हार सुनिश्चित करनी है तो क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ना होगा. गठबंधन नहीं होता है तो सूबे में कांग्रेस के लिए सियासी राह आसान नहीं होगी. इसी के चलते कांग्रेस के तमाम बड़े नेता पार्टी छोड़कर सपा में शामिल हो गए हैं.
कांग्रेस के सामने अब क्या विकल्प?
कांग्रेस के सामने अब यही विकल्प बचा है कि उत्तर प्रदेश की सभी 403 सीटों पर अकेले चुनावी मैदान में उतरकर किस्मत आजमाए, क्योंकि तमाम छोटे दल या तो बीजेपी के साथ हैं या फिर सपा के साथ मिलकर चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रखी है. ऐसे में सिर्फ रघुराज प्रताप सिंह की जनसत्ता पार्टी और भीम आर्मी के चंद्रशेखर बचे हैं. इसके अलावा असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM है. इनमें ओवैसी के साथ गठबंधन मुश्किल है जबकि चंद्रशेखर अपनी अलग सियासी राह तलाश रहे हैं.
ऐसे में यूपी की मौजूदा सियासी हालात में कांग्रेस के पास क्या सभी सीटों पर ऐसे मजबूत उम्मीदवार हैं, जो बीजेपी के साथ-साथ सपा और बसपा को कैंडिडेट को कड़ी टक्कर दे सके. कांग्रेस के अकेले चुनावी मैदान में उतरने में सबसे बड़ा जोखिम यह है कि कांग्रेस के पास अपना बेस वोट कोई है नहीं. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पास कुछ मुस्लिम और कुछ समर्पित पुराने कांग्रेसियों का वोट ही बचा है. ऐसे में देखना है कि प्रियंका गांधी के अगुवाई में कांग्रेस यूपी में क्या सियासी गुल खिलाती है?