उत्तर प्रदेश की सियासत में लंबे समय तक सत्ता की कमान ब्राह्मण समुदाय के हाथों में रही है. नारायण दत्त तिवारी के बाद यूपी में कोई भी ब्राह्मण समुदाय से मुख्यमंत्री नहीं बन सका. सूबे में पिछले 3 दशकों से राजनीतिक पार्टियों के लिए ब्राह्मण समुदाय महज एक वोटबैंक बनकर रह गया है. बसपा ने यूपी में ब्राह्मण सम्मेलन का आगाज कर सभी दलों को बेचैन कर दिया है. यही वजह है कि 2022 के चुनाव में बसपा के बाद सपा से लेकर बीजेपी और कांग्रेस तक ब्राह्मण समुदाय को साधने में जुट गई हैं.
यूपी में 6 ब्राह्मण मुख्यमंत्री रह चुके हैं
आजादी के बाद यूपी की सियासत में 1989 तक ब्राह्मण का वर्चस्व कायम रहा और 6 ब्राह्मण मुख्यमंत्री बने. गोविंद वल्लभ पंत, सुचेता कृपलानी, कमलापति त्रिपाठी, हेमवती नंदन बहुगुणा, श्रीपति मिश्र और नारायण दत्त तिवारी बने. ये सभी कांग्रेस से थे. इनमें नारायण दत्त तिवारी तीन बार यूपी के सीएम रहे.
वहीं, अगर इन मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल को देखें तो करीब 23 साल तक प्रदेश की सत्ता की कमान ब्राह्मण समुदाय के हाथ में रही है. लेकिन, मंडल और कमंडल की राजनीति ने उन्हें हाशिए पर धकेल किया. हालांकि, बीजेपी में अटल विहारी वाजपेयी और मुरली मनोहर जोशी से लेकर कलराज मिश्रा जैसे ब्राह्मण नेता चेहरा हुआ करते थे, पर सूबे की सत्ता में कांग्रेस की तरह उनकी हनक नहीं रही.
1989 के बाद से कांग्रेस सत्ता में नहीं आई है जबकि पिछले दिनों से सपा से लेकर बसपा और बीजेपी की कई बार सरकारें बनी, लेकिन सूबे को ब्राह्मण मुख्यमंत्री नहीं मिला. इसके बावजूद 2017 के चुनाव में ब्राह्मणों ने बीजेपी का जमकर समर्थन किया, लेकिन इस समुदाय का मानना है कि बीजेपी सरकार में उन्हें वैसी तवज्जो नहीं मिली जैसी वो उम्मीद लगाए बैठे थे.
राजपूत बनाम ब्राह्मण की सियासत
साल 2017 में बीजेपी पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की तो राजपूत समुदाय से आने वाले योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने. यही वजह है कि योगी सरकार में राजपूत बनाम ब्राह्मण के विपक्ष के नैरेटिव के मद्देनजर ब्राह्मण वोटों का अपने पाले में जोड़ने के लिए बसपा से लेकर सपा और कांग्रेस तक सक्रिय हैं.
उत्तर प्रदेश में 10 से 12 फीसदी ब्राह्मण हैं. 2017 के चुनाव में बीजेपी के कुल 312 विधायकों में 58 ब्राह्मण समुदाय के प्रतिनिधि चुनकर आए थे. इसके बावजूद राज्य सरकार में ब्राह्मणों की हनक पहले की तरह नहीं दिखी. सूबे के 56 मंत्रियों के मंत्रिमंडल में 9 प्रतिनिधि ब्राह्मण समुदाय से हैं. दिनेश शर्मा, श्रीकांत शर्मा और बृजेश पाठक जैसे ब्राह्मण समुदाय के मंत्री सरकार में शामिल हैं. इसके बावजूद विपक्ष योगी सरकार पर ब्राह्मण विरोधी होने का आरोप लगाकर उन्हें अपने पाले में करना चाहता है.
बसपा का ब्राह्मण सम्मेलन
बसपा जहां अयोध्या से ब्राह्मण सम्मेलन शुरू कर पूर्वांचल में अपने सियासी समीकरण दुरुस्त करने में जुट गई है. सूबे में ब्राह्मणों को साधने की जिम्मेदारी मायावती ने पार्टी महासचिव सतीष चंद्र मिश्र और पूर्व मंत्री नकुल दूबे को दे रखी है. इस कड़ी में अंबेडकरनगर के दिग्गज नेता पवन पांडेय की बसपा में दोबारा से वापसी हो गई है.
बसपा की सक्रियता को देखते हुए सपा ने भी ब्राह्मण सम्मेलन करने का फैसला किया है. समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव रविवार को पार्टी के 5 ब्राह्मण नेताओं से मिले. इन नेताओं ने अखिलेश को परशुराम प्रतिमा भेंट की है. सपा ने ब्राह्मणों के उत्पीड़न को सियासी हथियार बनाने का फैसला लिया है. इसके लिए पांच सदस्यीय कमेटी गठित कर दी गई है. यह कमेटी ब्राह्मणों के साथ होने वाली घटनाओं को सड़क से लेकर सदन तक उठाएगी.
सपा का ब्राह्मण प्रेम
बसपा के अयोध्या से शुरू हुए ब्राह्मण सम्मेलन किया है तो सपा ने 1857 क्रांति के नायक मंगल पांडेय की जन्मभूमि बलिया से ब्राह्मण सम्मेलन की शुरुआत करने का फैसला किया है. इन सम्मेलनों के जरिए सपा शासनकाल में ब्राह्मणों के लिए किए गए कार्यों को भी गिनाया जाएगा ताकि 2022 के चुनाव में ब्राह्मण समुदाय को वोट को अपने पाले में लाया जा सके.
उत्तर प्रदेश की सियासत में भले ही ब्राह्मणों की ताकत सिर्फ 10 से 12 फीसदी वोट तक नहीं सिमटी हुई है. ब्राह्मणों का प्रभाव समाज में इससे कहीं अधिक है. ब्राह्मण समाज प्रभुत्वशाली होने की वजह से राजनीतिक हवा बनाने में भी सक्षम है. 1990 से पहले तक सत्ता की कमान ज्यादातर ब्राह्मण समुदाय के हाथों में रही है, लेकिन इसके बाद से राजनीतिक पार्टियां उन्हें महज वोटबैंक की तरह ट्रीट करती आ रही हैं.
यूपी में ब्राह्मण सियासत
कांग्रेस के राज में ज्यादातर मुख्यमंत्री ब्राह्मण समुदाय के बने, लेकिन बीजेपी के उदय के साथ ही ब्राह्मण समुदाय का कांग्रेस से मोहभंग हुआ. यूपी में जिस भी पार्टी ने पिछले तीन दशक में ब्राह्मण कार्ड खेला, उसे सियासी तौर पर बड़ा फायदा हुआ है.
साल 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी गठबंधन को 72 फीसदी ब्राह्मणों ने वोट दिया जबकि सपा-बसपा को 5-5 फीसदी ब्राह्मण वोट मिले. कांग्रेस को लगभग 11 फीसदी ब्राह्मणों ने वोट दिया. 2019 लोकसभा में बीजेपी को 82 फीसदी ब्राह्मणों ने वोट किया लेकिन लेकिन सपा-बसपा गठबंधन और कांग्रेस को 6-6 फीसदी ब्राह्मण वोट मिले.
विधानसभा चुनाव में ब्राह्मणों का रुझान
2017 यूपी विधानसभा में बीजेपी को 80 फीसदी ब्राह्मणों ने वोट किया. यूपी में कुल 58 ब्राह्मण विधायक जीते, जिनमें 46 विधायक बीजेपी से बने थे. वहीं, 2012 विधानसभा में जब सपा ने सरकार बनायी थी तब बीजेपी को 38 फीसदी ब्राह्मण वोट मिले थे. सपा के टिकट पर 21 ब्राह्मण समाज के विधायक जीतकर आए थे. 2007 विधानसभा में बीजेपी को 40 फीसदी ब्राह्मण वोट मिले थे. 2007 में BSP ने दलित-ब्राह्मण गठजोड़ का सफल प्रयोग किया था, जिसे बसपा ने सोशल इंजीनियरिंग का नाम दिया था.
यूपी की सियासत में मायावती ने 2007 में ब्राह्मण महत्व दिया था, जिसके चलते प्रदेश में ब्राह्मण वोटों का महत्व बढ़ा दिया. तब से जो भी दल सत्ता में आए उसमें ब्राह्मण वोटों की अहम भूमिका रही, 2007 में जब मायावती सत्ता में आईं तो उस समय बीएसपी से 41 ब्राह्मण विधायक चुने गए.
ब्राह्मण समाज का बसपा प्रेम
बता दें कि 1993 में बसपा से महज एक ब्राह्मण विधायक था, लेकिन चुनाव दर चुनाव यह आंकड़ा बढ़ता गया. 2007 के यूपी चुनाव में सीएसडीएस की रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ 17 फीसदी ब्राह्मणों ने ही मायावती को वोट दिया था और इसमें से भी अधिकतर वोट बसपा को वहां मिले थे जहां उसने ब्राह्मण उम्मीदवार खड़े किए थे.
बीजेपी से 2017 के चुनाव में सबसे ज्यादा 58 ब्राह्मण विधायक बने, लेकिन इससे पहले बीजेपी से जीते ब्राह्मणों की संख्या 20 से ज्यादा नहीं बढ़ी थी. 2002 से लेकर 2012 तक तो बीजेपी से जीतने वाले ब्राह्मणों की संख्या दहाई का अंक भी नहीं छू पाई थी.
वहीं, सपा से सबसे ज्यादा 21 ब्राह्मण 2012 के चुनाव में जीतकर आए थे जबकि इससे पहले यह आंकड़ा 11 तक ही सिमटा रहा है. वहीं, कांग्रेस 90 के बाद से दहाई का अंक कभी क्रॉस नहीं कर सकी. ऐसे में यूपी में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर ब्राह्मण वोटों पर सभी की निगाहें लगी हुई हैं, देखना है कि 2022 में ब्राह्मण समुदाय की अंगुली बैलेट मशीन पर किसके चुनाव चिह्न की ओर जाती है.