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Garautha Assembly Seat: कांग्रेस का वो अभेद किला जिसे बीजेपी-SP-BSP ने किया धराशाई

गरौठा विधानसभा सीट लोधी राजपूत, पटेल, यादव, ब्राह्मण,ठाकुर, पाल, कुशवाहा समाज के मिले जुले वर्चस्व वाली सीट रही है. यहां धार्मिक समीकरण का कोई खास प्रभाव कभी देखने को नहीं मिला. किसान वोटर यहां सबसे ज्यादा हैं.

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तेज प्रदाप सिंह
तेज प्रदाप सिंह
स्टोरी हाइलाइट्स
  • कांग्रेस का वो अभेद किला जहां बने कई रिकॉर्ड
  • कभी कांग्रेस के प्रति वफादार, अब बीजेपी कर रही अगुवाई

झांसी जिले की गरौठा विधानसभा में हमेशा ही रोचक मुकाबला देखने को मिलता रहा है. 2017 में यहां से बीजेपी के जवाहर लाल राजपूत ने सपा के दिग्गज माने जाने वाले दीपनारायण सिंह यादव को चुनाव मैदान में पटखनी दी थी. यह चुनाव इसलिए भी रोचक था, क्योंकि दीपनारायाण सिंह यादव यहां बाहुबली और आर्थिक रुप से बेहद सक्षम प्रत्याशी रहे हैं, वहीं जवाहर लाल राजपूत किसान नेता माने जाते हैं. जवाहर ने बैलगाड़ी से नामंकन दाखिल कर पूरे चुनाव को फॅच्यूनर बनाम बैलगाड़ी का मुकाबला बना दिया और जीत भी लिया. इस बार एक बार फिर गरौठा विधानसभा की चुनावी महफिल में जोर आजमाइश का खेल शुरू हो गया है.

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गरौठा विधानसभा के इतिहास पर नजर डालें तो यहां से कांग्रेस सर्वाधिक चुनाव जीती है. झांसी जिले में राजा समथर रणजीत सिंह जूदेव गरौठा विधानसभा से 7 बार विधायक चुने गए.

कांग्रेस का अभेद किला

बुंदलेखंड की राजनीति में राजा समथर यानी राजा रणजीत सिंह जूदेव का बड़ा नाम रहा है. उनके कद का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक दौर में उनकी सीधे इंदिरा और राजीव गांधी जैसे शीर्षस्थ नेताओं से बात होती थी. गरौठा सीट पर रणजीत सिंह के नाम का ही सिक्का चलता था. बुंदलेखंड की यही इकलौती सीट है जहां कांग्रेस नेता व समथर रियासत के राजा रणजीत सिंह जूदेव के नाम जीत की डबल हैट्रिक रही.

2017 का जनादेश

1974 में कांग्रेस विरोधी लहर में जीत दर्ज कर की थी सियासत में एंट्री समथर महाराज रणजीत सिंह जूदेव का राजनीतिक उदय 70 के दशक में हुआ. यह वह दौर था, जब झांसी जिला या कहें समूचे बुन्देलखण्ड की राजनीति में रणजीत सिंह जूदेव का व्यक्तित्व सबसे प्रभावशाली था. रणजीत सिंह जूदेव 1974 में पहली बार विधायक बने. इसके बाद 1977 के चुनाव में जब जनता लहर में कांग्रेस के पैर उखड़ गये थे. उस समय जूदेव यह सीट कांग्रेस की झोली में डाल कर राजनीतिक पंडितों को चौंका दिया था. जब जेपी आंदोलन की आग में कांग्रेस प्रत्याशियों के लिए जमानत भी बचाना मुश्किल था. पूरे देश में जनता दल की आंधी चल रही थी, तब भी 1989 में उन्होंने जीत दर्ज की थी. राममंदिर आंदोलन से भाजपा की लहर में भी 1991 में राजा रणजीत सिंह ने अपने इलाके में कांग्रेस को परास्त नहीं होने दिया. लेकिन इसके बाद इस सीट पर कांग्रेस को वापसी करने का मौका नहीं मिला और बसपा-सपा ने अपनी सियासी ताकत दिखाना शुरू कर दिया. फिर 2017 में बीजेपी के जवाहर लाल राजपूत ने सपा प्रत्याशी को आसानी से हरा दिया.

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सामाजिक ताना बाना

गरौठा विधानसभा सीट लोधी राजपूत, पटेल, यादव, ब्राह्मण,ठाकुर, पाल, कुशवाहा समाज के मिले जुले वर्चस्व वाली सीट रही है. यहां धार्मिक समीकरण का कोई खास प्रभाव कभी देखने को नहीं मिला. किसान वोटर यहां सबसे ज्यादा हैं. 
 

विधायक का रिपोर्ट कार्ड

गरौठा विधानसभा पिछड़ी विधानसभा मानी जाती रही है. गरौठा से वर्तमान भाजपा से विधायक जवाहर लाल राजपूत एडवोकेट हैं. कोराना लहर के बीच करीब दो सालों तक थमे विकास कार्यों के बाद भी यहां कई बड़े काम दिखाई दे रहे हैं. कई पाइपलाइन में भी हैं. गरौठा विधासभा में अधिकांश सड़कें खराब रही हैं, जो भाजपा सरकार में बनकर तैयार हैं.  गरौठा में पेयजल की समस्या पर भी काम हुआ और हर घर नल पाइप पेयजल योजना से फायदे नजर आने लगे हैं. वहीं मोंठ तालाब पर पूर्व सपा विधायक का कब्जा हटाने वाला मामला भी यहां की सुर्खियां में रहा जिसे भाजपा विधायक जवाहर राजपूत ने खड़े होकर हटवा दिया. डिफेंस कॉरिडोर भी गरौठा विधानसभा के लिए बड़ी सौगात के तौर पर देखा जा रहा है. सोलर ऊर्जा पार्क को भी भाजपा अपनी उप​लब्धियों में गिना रही है और साथ ही बुंदेलखंड एक्सप्रेस वे का कुछ हिस्सा इस विधानसभा से जुड़ जाएगा. यहां किसानों के लिए कई योजाएं मंजूर हुईं हैं और प्रदेश में सबसे अधिक फसल नुकसान का मुआबजा और बीमा क्षतिपूर्ति भी इसी विधानसभा पर दी गई.
 

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