यूपी में Exit Poll फिर से बीजेपी की सरकार बनाने की ओर इशारा कर रहे हैं. इंडिया टुडे-एक्सेस माय इंडिया के सर्वे में बीजेपी को 288-326 सीटें मिलती दिख रही हैं. वहीं, सपा 71-101 पर सिमटती नजर आ रही है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अखिलेश यादव ओपी राजभर, स्वामी प्रसाद मौर्य और दारा सिंह चौहान जैसे बीजेपी से आए ओबीसी नेताओं के दम पर परिवर्तन का दावा कर रहे थे, आखिर वे सपा के कितने काम आए. आईए Exit Poll के नतीजों से इन्हें समझने की कोशिश करते हैं.
ओबीसी वोटर का बीजेपी को फिर मिला साथ
एग्जिट पोल के मुताबिक, ओबीसी समुदाय का सपा से ज्यादा वोट बीजेपी को मिलता नजर आ रहा है. बीजेपी को जाटों का 56 फीसदी वोट मिला तो 21 फीसदी जाटव और 52 फीसदी गैर-जाटव दलितों का साथ मिला है. इस तरह से ओबीसी का 67 फीसदी वोट मिला तो 71 फीसदी सामान्य वर्ग साथ रहा. बीजेपी को 60 फीसदी कुर्मी, 70 फीसदी ब्राह्मण, 73 फीसदी ठाकुर वोट मिलने का अनुमान है. इतना ही नहीं बीजेपी को 10% यादव वोट भी मिलता दिख रहा है.
बीजेपी ने ऐसे किया डैमेज कंट्रोल
बीजेपी ने शानदार तरीके से घर में मची भगदड़ के बाद पिछड़े वोटर्स को मैनेज किया. यूपी विधानसभा चुनाव को लेकर बीजेपी जानती थी कि बिना पिछड़ी जातियों के वोट को साधे वह सत्ता पर काबिज नहीं हो सकती. इसी के चलते पार्टी ने 2017 चुनाव के पोस्टर लीडर रहे केशव प्रसाद मौर्य को चुनावी मैदान में पूरी तरह से उतार दिया. साथ ही बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह ने भी प्रचार की कमान संभाली. केशव-स्वतंत्र देव की जोड़ी ने पिछड़ी जातियों के प्रभुत्व वाली सीटों पर जमकर मेहनत की और उसी का नतीजा एग्जिट पोल्स में दिख रहा है.
केशव मौर्य-स्वतंत्र देव सिंह ने पार्टी छोड़कर गए नेताओं के प्रभाव वाली सीटों पर फोकस किया किया. स्टार प्रचारक के तौर पर केशव-स्वतंत्र देव ने वैसे तो पूरे प्रदेश में प्रचार किया, लेकिन जिन क्षेत्रों में पिछड़े वोट निर्णायक क्षमता रखते थे, वहां पर बीजेपी के ओबीसी नेताओं ने डेरा डाला और उन्हें साधने के लिए तमाम जतन किए.
कितना चमत्कार दिखा पाए मौर्य-राजभर ?
पूर्वांचल के कई जिलों में राजभर समुदाय का वोट राजनीतिक समीकरण बनाने और बिगाड़ने की ताकत रखता है. यूपी में राजभर समुदाय की आबादी करीब 3 फीसदी है, लेकिन पूर्वांचल के जिलों में राजभर मतदाताओं की संख्या 12 से 22 फीसदी है. वहीं, यूपी में यादव और कुर्मियों के बाद ओबीसी में तीसरा सबसे बड़ा जाति समूह मौर्य समाज का है. यह समाज मौर्य के साथ-साथ शाक्य, सैनी, कुशवाहा, कोइरी, काछी के नाम से भी जाना जाता है. यूपी में करीब 6 फीसदी मौर्य-कुशवाहा की आबादी है, लेकिन करीब 15 जिलों में 15 फीसदी के करीब है.
क्या सिर्फ हेडलाइन बनकर रह गए ये स्वामी प्रसाद- ओपी राजभर?
ओपी राजभर 2017 में बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव लड़े थे. राजभर की पार्टी को 8 सीटें मिली थीं. इनमें से चार पर उनकी पार्टी सुहेलदेव समाज पार्टी ने जीत भी हासिल की थी. इसके बाद राजभर को योगी सरकार में मंत्री भी बनाया गया. लेकिन बाद में उन्हें कैबिनेट से बर्खास्त कर दिया गया. इसके बाद से ओपी राजभर लगातार योगी सरकार के खिलाफ हमलावर रहे. उन्होंने बीजेपी के खिलाफ जमकर बयानबाजी की. यहां तक कि यूपी में सपा गठबंधन की सरकार बनने के दावे भी किए. उधर, स्वामी प्रसाद मौर्य ने यूपी चुनाव से पहले बीजेपी से इस्तीफा देकर सपा जॉइन कर सुर्खियां बटोरीं. उन्होंने योगी सरकार पर जमकर निशाना साधा. स्वामी प्रसाद मौर्य के साथ दारा सिंह चौहान समेत कुछ मंत्री और बीजेपी विधायक भी सपा में शामिल हुए.
जमीन पर नहीं दिखा इन नेताओं का प्रभाव
ओबीसी का चेहरा माने जाने वाले ओपी राजभर, स्वामी प्रसाद मौर्य और दारा सिंह चौहान जैसे बड़े चेहरों के एसपी के साथ आने पर खूब हो हल्ला हुआ कि अखिलेश यादव के साथ गैर यादव ओबीसी भी वोटर आ जाएगा. ये वही गैर यादव ओबीसी था, जिसने यूपी में लोकसभा और विधानसभा चुनाव में बीजेपी को जिताया. एग्जिट पोल देखकर लगता है कि बीजेपी से एसपी में शामिल हुए ओबीसी के बड़े नेता सिर्फ हेडलाइन में ही चमके. जमीन पर उनका वैसा प्रभाव नहीं दिखा, जैसा कि कयास लगाए जा रहे थे. इन नेताओं के साथ आने से लगा कि गैर यादव ओबीसी एक बार फिर से सपा के साथ आ गया है. लेकिन शायद ऐसा नहीं हुआ.
ओबीसी बाहुल्य इलाकों में ओबीसी का प्रदर्शन
पश्चिम यूपी, बृज से रूहेलखंड तक 136 सीटे आती हैं, जिनमें से 98 सीटें बीजेपी को मिलती दिख रही हैं. इस इलाके में जाट, गुर्जर, सैनी, कुर्मी वोटरों का प्रभाव माना जाता है. वहीं, पूर्वांचल के इलाके में 139 सीटें आती हैं. इनमें से 96 सीटें बीजेपी को मिलती दिख रही हैं. इन सीटों पर कुर्मी, मौर्या-कुशवाहा, राजभर, चौहान जैसी जातियों का प्रभाव है. पूर्वांचल का ये वही इलाका है, जहां से स्वामी प्रसाद मौर्या, दारा सिंह चौहान जैसे कद्दावर ओबीसी नेता आते हैं. ऐसे में माना जा रहा था कि पूर्वांचल में बीजेपी के ओबीसी वोट बैंक में इन नेताओं के जाने से बड़ी सेंधमारी हो सकती है. लेकिन एग्जिट पोल के नतीजों से ऐसा प्रतीता होता नहीं दिखा. वहीं, बीजेपी का निषाद पार्टी और अपना दल (एस) से गठबंधन करने का दांव सफल होता दिख रहा है.