जी हां, हम बात कर रहे हैं कांग्रेसियों की भैय्याजी यानी प्रियंका गांधी वाड्रा की. उनको खासकर रायबरेली और अमेठी के कांग्रेसी भैय्याजी के नाम से पुकारते हैं. गांधी परिवार के गढ़ यानी अमेठी- रायबरेली में 4 सीटों पर सपा-कांग्रेस के उम्मीदवार आमने सामने हैं, हालात काबू में करने की माथापच्ची जारी है, इसी के चलते प्रियंका ने वैलेंटाइन डे यानी 14 फ़रवरी से अमेठी रायबरेली का सघन प्रचार अभियान टाल दिया. प्रियंका के करीबी इसको सही करार दे रहे थे, तो तमाम कार्यकर्ता अपने भैय्याजी के आने का इंतज़ार कर रहे थे.
इसी बीच अचानक रायबरेली की रैलियों में 17 फरवरी को भाई राहुल के साथ प्रियंका का कार्यक्रम बना. कांग्रेस में सोनिया की जगह राहुल ले रहे हैं और प्रियंका सिर्फ उनकी सहयोगी की भूमिका में हैं, इसका यहां भी प्रियंका ने इस बात का खास ख्याल रखा. पहली रैली में सिर्फ राहुल बोले, प्रियंका सिर्फ मंच पर बैठीं. सन्देश साफ़ था कि, राहुल की चमक के आड़े वो खुद ना आने पाएं.
इंदिरा जैसी छवि
इसके बाद रायबरेली की दूसरी रैली में प्रियंका मंच पर आईं और माइक संभाला. वो खुद को इंदिरा के जैसा मानती हैं और कार्यकर्ता भी उनमें इंदिरा की छवि देखते हैं, तो प्रियंका भी इसका खासा ख्याल रखती हैं. इंदिरा की हेयर स्टाइल, इंदिरा की तरह साड़ी पहनने का अंदाज़ और इंदिरा के अंदाज़ में भाषण देने की कला तो सभी ने पहले भी देखी है, लेकिन इस बार उम्र के 45 बसंत पार कर चुकीं प्रियंका के हाथ में चश्मा भी दिखा, जो भाषण देते वक़्त भी उनके हाथ में था, जो कभी इंदिरा रखती थीं.
प्रियंका की मुहर
अब फोकस करते हैं, प्रियंका के भाषण पर. यूपी के पहले सियासी भाषण में प्रियंका ने वही थीम अपनायी, जिसके चलते सपा और कांग्रेस का गठबंधन हुआ. यानी बिहार की तरह गठजोड़ बनाकर बीजेपी को चित किया जाए. बिहार की ही तर्ज पर नीतीश की तरह अखिलेश आगे बढ़ कर लड़ते दिखें, नीतीश की छवि की तरह अखिलेश की छवि को आगे रखा जाए. वो सब हो गया तो फिर पीके यानी प्रशांत किशोर ने बिहार की तरह 'बिहारी बनाम बाहरी' जैसा 'अपने लड़के बनाम बाहरी मोदी' को थीम बनाया. जब ये थीम फाइनल हुआ, तब प्रियंका ने ही उसको हरी झंडी दी थी. इसलिए प्रियंका ने भाषण में इसी बात पर पीएम मोदी को घेरकर शुरुआत की.
मोदी पर हमला
प्रियंका ने कहा कि, यूपी को किसी बाहरी की ज़रूरत नहीं, यहां का हर युवा नेता बन सकता है. अब झांसों और खोखले वादों में लोग नहीं आने वाले, सब समझदार हैं. राहुल और अखिलेश के दिलोजान में यूपी है.
इसके बाद नोटबंदी और कानून व्यवस्था की बारी आई. लफ्जों की बाजीगरी दिखाते हुए प्रियंका ने दोनों को जोड़ा. बोलीं, महिलाओं पर अत्याचार की बात करते हैं, लेकिन सबसे बड़ा अत्याचार तो 6 महीने से महिलाओं के साथ ही हुआ, जब उनकी बचत को छीन लिया और उनको लाइन में लगा दिया.
प्रियंका ने पीएम को घेरते हुए कहा कि, महिला को किसी व्यक्ति की बहन, मां या पत्नी से संबोधित करने की बजाय उसको व्यक्तिगत तौर पर पहचान दी जानी चाहिए. कुल मिलाकर प्रियंका ने पहले चुनावी समर में वो सब किया, जिसकी उम्मीद थी. हालांकि स्मृति ईरानी के हमलों का जवाब देने की बजाय उन्होंने पीएम मोदी को ही निशाने पर रखा.
रणनीति में बदलाव
लेकिन सवाल वही है कि, 2007 में प्रियंका ने गांधी परिवार के गढ़ में 100 से ज़्यादा रैलियां की थीं और कांग्रेस 10 में से 7 सीटें पार्टी जीत गई. प्रियंका का खूब डंका बजा, लेकिन 2012 में भी 100 से ज़्यादा रैलियां और नुक्कड़ सभाएं करने के बावजूद कांग्रेस महज दो सीटें ही जीत सकीं. ऐसे में इस बार सपा और कांग्रेस के उम्मीदवारों के 4 सीटों पर आमने-सामने लड़ने से कहीं रिजल्ट बेहतर नहीं रहा तो प्रियंका की छवि को चोट पहुंच सकती है. इसलिए कांग्रेस और प्रियंका की रणनीति में आखिर वक़्त में बदलाव आया, उनका प्रचार अभियान सीमित कर दिया गया. आखिर कांग्रेस अपने तुरुप के इक़्के पर 2017 में दांव लगाकर 2019 का रिस्क कतई नहीं लेना चाहती.