दो विधानसभा वाला छोटा सा रुद्रप्रयाग जनपद धार्मिक और राजनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है. रुद्रप्रयाग जनपद में केदारनाथ और रुद्रप्रयाग विधानसभा हैं. जिले की दोनों विधानसभाएं हमेशा चर्चा में रहती हैं. रुद्रप्रयाग विधानसभा, अलकनंदा और मंदाकिनी के संगम पर स्थित है. उत्तराखंड राज्य गठन होने के बाद से अब तक चार विधानसभा चुनाव संपन्न हुए हैं. इस सीट पर बीजेपी तीन बार चुनाव जीती है, तो एक बार कांग्रेस उम्मीदवार ने जीत दर्ज किया है. सितम्बर 1997 में रुद्रप्रयाग जनपद का गठन, टिहरी, पौड़ी और चमोली जिले के कुछ हिस्सों को काटकर किया गया था. 1997 में रुद्रप्रयाग उत्तर प्रदेश का हिस्सा था. 1997 से लेकर 2000 तक रुद्रप्रयाग में तीन-तीन विधायक रहे. बद्री-केदार वाले क्षेत्र में केदार सिंह फोनिया, रुद्रप्रयाग वाले क्षेत्र में डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक तो टिहरी वाले क्षेत्र में मातबर सिंह कंडारी रुद्रप्रयाग का प्रतिनिधित्व करते रहे.
9 नवम्बर 2000 में उत्तराखंड राज्य का गठन हुआ. जिसके बाद पहली बार रुद्रप्रयाग में विधानसभा चुनाव संपन्न हुआ. प्रथम विधानसभा चुनाव में भाजपा के मातबर सिंह कंडारी विधानसभा पहुंचे. वहीं वर्ष 2007 में भी भाजपा के मातबर सिंह कंडारी ही विधायक चुने गए. एनडी तिवारी की सरकार में मातबर सिंह कंडारी नेता प्रतिपक्ष रहे. जबकि खंडूरी सरकार में वह सिंचाई मंत्री रहे. वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने एक बार फिर से मातबर सिंह कंडारी को ही मैदान में उतारा. वहीं कांग्रेस ने वरिष्ठ नेता डॉ. हरक सिंह रावत को रुद्रप्रयाग विधानसभा से चुनाव लड़वा दिया. इस चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी डॉ. हरक सिंह रावत ने मातबर सिंह कंडारी को काफी बड़े अंतर से पराजित किया. इस तरह कांग्रेस ने वर्षों से रुद्रप्रयाग विधानसभा पर भाजपा की बादशाहत को समाप्त कर दिया.
रुद्रप्रयाग विधानसभा से चुनाव जीतने के बाद डॉ. हरक सिंह रावत तत्कालीन हरीश रावत सरकार में मंत्री रहे. तत्कालीन हरीश रावत सरकार को गिराने में डॉ. हरक सिंह रावत के योगदान को अहम माना जाता है. 2017 के विधानसभा चुनाव में रुद्रप्रयाग विधानसभा के राजनीतिक समीकरण पूरी तरह से बदल गये. उस दौरान भाजपा से मंत्री और विधायक रहे मातबर सिंह कंडारी कांग्रेस में शामिल हो गये. जबकि कांग्रेस नेता भरत सिंह चौधरी बीजेपी में शामिल हो गये.
2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने तत्कालीन रुद्रप्रयाग की जिला पंचायत अध्यक्ष लक्ष्मी राणा पर दांव खेला. जबकि भाजपा ने कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुये भरत सिंह चौधरी को टिकट दिया. 2017 के विधानसभा चुनाव में फिर रुद्रप्रयाग विधानसभा भाजपा के हाथ लग गई. कुल मिलाकर देखा जाय तो रुद्रप्रयाग में चार विधानसभा चुनाव हुए हैं. जिनमें तीन बार भाजपा उम्मीदवार तो एक बार कांग्रेस उम्मीदवार को जीत मिली.
रुद्रप्रयाग विधायक भरत सिंह चौधरी का राजनीतिक सफर
रुद्रप्रयाग विधायक भरत सिंह चौधरी 2017 में पहली बार भाजपा के टिकट पर विधानसभा पहुंचे हैं. उत्तर प्रदेश सरकार में भी भरत सिंह चौधरी ने दो बार विधानसभा चुनाव लड़ा था, लेकिन उन्हें कामयाबी हासिल नहीं हो पाई. वह अब तक छह बार चुनाव लड़े हैं. भरत सिंह चौधरी के राजनीतिक करियर की शुरूआत 1985 में शुरू हुई थी. 1985 में वह साधन सहकारिता समिति के अध्यक्ष बने थे. जिसके बाद वह 1989 में जिला परिषद के सदस्य भी रहे. जबकि 1998 में वह ग्राम प्रधान मरोड़ा के प्रधान चुने गये.
वर्ष 1993 में पहली बार भरत सिंह चौधरी ने तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार में कर्णप्रयाग विधानसभा सीट से जनता दल के टिकट पर चुनाव लड़ा था. इस चुनाव में उन्हे हार मिली और डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक विजयी रहे. 1996 में भी भरत सिंह चौधरी ने कर्णप्रयाग विधानसभा सीट से ही सेकुलर कांग्रेस से चुनाव लड़ा, लेकिन यहां भी उन्हे हार झेलनी पड़ी. इसके बाद वर्ष 2002 में कर्णप्रयाग से कांग्रेस ने भरत सिंह चौधरी को अपना दावेदार घोषित किया. लेकिन कांग्रेस के टिकट पर भी भरत सिंह चौधरी की नैया पार नहीं हो पाई.
2002 के बाद भरत सिंह चौधरी ने कर्णप्रयाग विधानसभा छोड़, रुद्रप्रयाग विधानसभा पर ध्यान देना शुरू किया. 2007 और 2012 का विधानसभा चुनाव भरत सिंह चौधरी ने रुद्रप्रयाग विधानसभा से निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर लड़ा. लेकिन दोनों विधानसभा चुनावों में जनता ने एक बार फिर चौधरी को नकार दिया. वर्ष 2013 में भरत सिंह चौधरी ने भाजपा की सदस्यता ग्रहण की और 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने चौधरी को विधानसभा चुनाव का टिकट दिया.
2017 में मोदी लहर और जनता की सिम्पैथी के चलते आखिरकार भरत सिंह चौधरी पांच चुनाव हारने के बाद पहली बार विधानसभा पहुंचे. 2017 के चुनाव में भरत सिंह चौधरी ने कांग्रेस प्रत्याशी लक्ष्मी राणा को काफी बड़े अंतर से परास्त कर दिया.
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2017 का जनादेश
2017 में भरत सिंह चौधरी कांग्रेस की महिला प्रत्याशी लक्ष्मी राणा को हराकर चुनाव जीते थे. 2017 में भरत सिंह चौधरी को 29 हजार तो लक्ष्मी राणा को 14 हजार के लगभग वोट पड़ी. 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से बागी होकर प्रदीप थपलियाल ने भी चुनाव लड़ा था. जिन्हें पांच हजार के करीब वोट पड़े थे. इसके अलावा तत्तकालीन ब्लॉक प्रमुख जगमोहन रौथाण और उक्रांद से देवेन्द्र चमोली ने भी चुनाव लड़ा था.
विधायक का रिपोर्ट कार्ड
रुद्रप्रयाग विधायक भरत सिंह चौधरी लॉ ग्रेजुएट हैं. विधायक के बारे में कहा जाता है कि वह कई भाषाओं का ज्ञान रखते हैं. विधायक भरत सिंह चौधरी का जन्म 20 मई 1959 को अगस्त्यमुनि विकासखंड के गडगू गांव में हुआ था. विधायक का कार्यकाल अभी तक ठीक-ठाक ही रहा है. हालांकि कई बार विधायक विवादों में भी घिरते नजर आये हैं. विधायक पर यह भी आरोप लगे हैं कि उन्होंने विधायक बनते ही अपने पुराने साथी कार्यकर्ताओं को छोड़ दिया.
इसके अलावा जनता का कहना है कि विधायक ने सिर्फ अपने लोगों को ही कार्य दिया है. विधायक भरत सिंह चौधरी अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि रुद्रप्रयाग के विद्यालयों को ई-लर्निंग कक्षाओं से जोड़ना मानते हैं. इसके अलावा उनका कहना है कि रुद्रप्रयाग विधानसभा में सबसे अधिक सड़के उनके कार्यकाल में बनी हैं. जिला चिकित्सालय रुद्रप्रयाग में उन्होंने 28 डॉक्टरों की नियुक्ति करवाई हैं.
सामाजिक ताना-बाना
रुद्रप्रयाग विधानसभा में 1,01,838 वोटर हैं. जिनमें 50741 महिला और 51097 पुरूष वोटर हैं. विधानसभा चुनाव में मात्र 60 प्रतिशत लोग ही अपने मत का प्रयोग करते हैं. रुद्रप्रयाग विधानसभा के भीतर 17 प्रतिशत एससी, 15 प्रतिशत ब्राह्मण, 67 प्रतिशत ठाकुर तो एक प्रतिशत अन्य लोग निवास करते हैं. रुद्रप्रयाग विधानसभा में ठाकुर वोटरों का अधिक बोलबाला रहता है. यही कारण है कि आज तक रुद्रप्रयाग विधानसभा में ठाकुर व्यक्ति ही विधानसभा पहुंचा है.
रुद्रप्रयाग विधानसभा के बारे में
रुद्रप्रयाग विधानसभा के अंतर्गत प्रसिद्ध अलकनंदा एवं मंदाकिनी नदी का संगम स्थल है. इसके अलावा कोटेश्वर महादेव भी रुद्रप्रयाग विधानसभा में स्थित है. उत्तराखंड के चार धामों की यात्रा का सबसे महत्वूपर्ण पड़ाव रुद्रप्रयाग ही है. यहीं से बद्रीनाथ, केदारनाथ सहित गंगोत्री और यमुनोत्री आने-जाने वाले यात्री आवाजाही करते हैं.
समस्याएं व मुद्दे
रुद्रप्रयाग विधानसभा में सबसे बड़ी समस्या पानी की है. रुद्रप्रयाग विधानसभा की पूर्वी एवं पश्चिमी भरदार पट्टियों के अधिकांश गांवों में पानी का गंभीर संकट छाया रहता है. रुद्रप्रयाग विधानसभा के कई गांव आज भी सड़क मार्ग से नहीं जुड़ पाये हैं. कई गांवों में सड़क तो बन गई हैं, लेकिन वर्षों से इनका डामरीकरण नहीं हो पाया है. रुद्रप्रयाग विधानसभा में एक डिग्री कॉलेज स्थित है, लेकिन वर्षों से कॉलेज को अपना भवन नहीं मिल पाया है.
रुद्रप्रयाग विधानसभा में शिक्षा और स्वास्थ्य भी एक बड़ा मुद्दा है. कहने को रुद्रप्रयाग विधानसभा में ही जिला चिकित्सालय है, लेकिन यह चिकित्सालय मात्र रेफर सेंटर बन गया है. यहां के अधिकांश मरीजों को बेस चिकित्सालय श्रीनगर रेफर किया जाता है.