दुनिया में बहुत कम ऐसी महान शख्सियत जन्म लेती हैं, जो अपनी कला की रोशनी से कई जिंदगियों को रौशन कर देती हैं. उन्हीं में से एक थे कथक डांस के सम्राट पंडित बिरजू महाराज. 83 साल की उम्र में पंडित बिरजू महाराज भले ही इस दुनिया से रुख्सत हो गए हैं, लेकिन उनके घुंघरूओं की झनकार और आवाज हमेशा लोगों के दिलों में जिंदा रहेगी.
4 फरवरी 1938 को जन्में पंडित बिरजू महाराज लखनऊ घराने से ताल्लुक रखते थे. उनका पूरा नाम पंडित बृजमोहन मिश्रा था, लेकिन लोग उन्हें पंडित बिरजू महाराज के नाम से ही जानते थे. कहा जाता है कि पहले उनका नाम 'दुखहरण' रखा गया था, लेकिन बाद में इसे बदलकर 'बृजमोहन नाथ मिश्रा' रख दिया गया था. पंडित बिरजू महाराज के दुखरहण नाम के पीछे भी एक दिलचस्प किस्सा है. कहा जाता है कि 4 फरवरी 1938 को लखनऊ के एक अस्पताल में ग्यारह लड़कियां पैदा हुई थीं. लेकिन इसी बीच उसी अस्पताल में इकलौते लड़के ने जन्म लिया था. वो इकलौते लड़के कोई और नहीं बल्कि पंडित बिरजू महाराज थे.
ऐसे में उनके जन्म पर सबने कहा कि 'दुखहरण' आ गया. आज के दिन पहला लड़का अस्पताल में जन्मा है. लेकिन कुछ घंटों बाद ही कहा जाने लगा कि चारों तरफ गोपियां बीच में कन्हैया और फिर उनका नाम बृजमोहन रख दिया गया. इसके बाद लाड प्यार में लोग उन्हें बिरजू कहने लगे और फिर आदर सम्मान से सुगंधित हुए तो वो बिरजू महाराज के नाम से दुनियाभर में पहचाने जाने लगे.
पंडित बिरजू महाराज पूरी दुनिया में भारतीय कथक नृत्य का जाना पहचाना चेहरा हैं. बिरजू महाराज को कथक विरासत में मिला था. उन्होंने कई देशों में अपने डांस परफॉर्मेंस से रोशनी बिखेरी. वे ठुमरी, दादरा, भजन और ग़ज़लों पर एक मजबूत पकड़ रखते थे. वे खुद भी एक अद्भुत गायक थे. पंडित बिरजू महाराज कथक डांसर होने के साथ एक संवेदनशील कवि भी थे.
पंडित बिरजू महाराज ने डांसिंग और संगीत में अपना इतना बड़ा योगदान दिया है, जिसकी कल्पना करना भी लोगों के मुश्किल है. बिरजू महाराज के हुनर की चमक लोगों को उसी वक्त दिखने लगी थी, जब 7 साल की छोटी सी उम्र में उन्होंने गाने की शानदार प्रस्तुति मंच पर पेश की थी.
बिरजू महाराज का जन्म एक ऐसे घराने में हुआ था, जिनकी रूह में ही कला बसती है. बिरजू महाराज कथक नर्तकों के महान महाराज परिवार के वंश थे, जिसमें उनके दो चाचा शंभू महाराज और लच्छू महाराज और उनके पिता और गुरु अच्छन महाराज जैसी महान शख्सियतें शामिल हैं.
13 साल की उम्र में जब बच्चे खेल-कूद में मस्त रहते हैं उस उम्र में बिरजू महाराज ने दिल्ली के मंडी हाउस इलाके में स्थित संगीत भारती में कथक नृत्य की बारीकियां सिखाना शुरू कर दी थीं. पंडित बिरजू महाराज ने नए कथक डांस ड्रामा को कोरियोग्राफ करके कथक को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया. इसमें कोई दो राय नहीं है कि कथक की दुनिया के वो हमेशा महाराजा ही रहेंगे. कथक को जब भी जाना जाएगा पंडित बिरजू महाराज के नाम से ही जाना जाएगा.
कला की दुनिया में पंडित बिरजू महाराज के योगदान का आप इस बात से ही अंदाजा लगा लीजिए कि दुनियाभर में अपनी कला की छाप छोड़ने वाले बिरजू महाराज ने अपने जीवन में हजारों परफॉर्मेंस दी हैं और कथक छात्रों के लिए सैकड़ों वर्कशॉप आयोजित कर नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति से जोड़े रखने की कोशिश की.
पंडित बिरजू महाराज की कला सिर्फ यहीं तक नहीं थमी, उन्हें संगीत की भी खूब समझ थी. पंडित बिरजू महाराज म्यूजिक भी कंपोज कर चुके हैं. उन्होंने फिल्म शतरंज के खिलाड़ी में अपनी रुहानी आवाज का जादू भी बिखेरा.
उन्होंने 2002 की ब्लॉकबस्टर फिल्म देवदास और विश्वरूपम के लिए डांस कोरियोग्राफ भी किया, जिसके लिए उन्हें 2012 में नेशनल फिल्म अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था.
पंडित बिरजू महारान इन गानों को कोरियोग्राफ कर चुके हैं-
- काहे छेड़ मोहे - देवदास
- उन्नाई कानाधु नान - विश्वरूपम
- जगावे सारी रैना - डेढ़ इश्किया
- मोहे रंग दो लाल - बाजीराव मस्तानी
साल 2002 में उन्हें लता मंगेशकर पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था. इसके अलावा उन्हें पद्म विभूषण, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, कालिदास सम्मान, फिल्मफेयर अवॉर्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है.