नेशनल अवॉर्ड विनर बालिका वधू फेम एक्ट्रेस सुरेखा सीकरी आज किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं. थिएटर, टीवी से लेकर सिनेमा के बड़े पर्दे तक उनका नाम बड़े अदब से लिया जाता है. सुरेखा को सबसे ज्यादा पॉपुलैरिटी कलर्स के सीरियल बालिका वधू में 'दादी सा' के किरदार से मिली. इसी शो ने उन्हें फेम दिलाया जो उन्हें नेशनल अवॉर्ड के मंच तक लेकर गया.
लॉकडाउन में बॉलीवुड को हुए नुकसान में सुरेख सीकरी को भी आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ा. जब सरकार ने इंडस्ट्री को अपना काम शुरू करने के लिए गाइडलाइंस जारी किए जिसमें 65 साल से ज्यादा उम्र के लोगों के काम करने की मनाही थी, तो सुरेखा पर जैसे पहाड़ टूट पड़ा. उनके आर्थिक परेशानी की खबरें इंटरनेट पर वायरल होने लगीं. बाद में सुरेखा ने सफाई देते हुए कहा था कि उन्हें पैसों की दिक्कत नहीं है बल्कि काम की जरूरत है. खैर, आइए बात करें उनके एक्टिंग करियर के बारे में.
लॉकडाउन में बॉलीवुड को हुए नुकसान में सुरेख सीकरी को भी आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ा. जब सरकार ने इंडस्ट्री को अपना काम शुरू करने के लिए गाइडलाइंस जारी किए जिसमें 65 साल से ज्यादा उम्र के लोगों के काम करने की मनाही थी, तो सुरेखा पर जैसे पहाड़ टूट पड़ा. उनके आर्थिक परेशानी की खबरें इंटरनेट पर वायरल होने लगीं. बाद में सुरेखा ने सफाई देते हुए कहा था कि उन्हें पैसों की दिक्कत नहीं है बल्कि काम की जरूरत है. खैर, आइए बात करें उनके एक्टिंग करियर के बारे में.
बालिका वधू में सुरेखा ने दादी के किरदार को बारीकी से पेश किया जिस कारण उन्हें घर-घर में उसी नाम से जाना जाने लगा. उनका कड़क मिजाज लोगों को खूब पसंद आया. लोग उन्हें टीवी के बाहर भी दादी सा के नाम से पुकारने लगे थे.
छोटे पर्दे पर तो उनके अभिनय का जादू चला ही, बड़े स्क्रीन पर भी सुरेखा ने अपने अभिनय का लोहा मनवाया है. इसका सबसे ताजा उदाहरण है आयुष्मान खुराना की फिल्म बधाई हो.
सुरेखा सीकरी का जन्म 19 अप्रैल, 1945 को नई दिल्ली में हुआ था. वे बचपन से ही पढ़ाई में बहुत अच्छी थीं. वे बड़ी होकर पत्रकार या लेखक बनने की ख्वाहिश रखती थीं. मगर किस्मत को तो कुछ और ही मंजूर था. सुरेखा अलीगढ़ मुस्लिम युनिवर्सिटी में पढ़ती थीं. विवि में एक बार अब्राहम अलकाजी साहेब अपना एक नाटक लेकर पहुंचे. नाटक का नाम द किंग लियर था. इस नाटक से सुरेखा जी की बहन प्रभावित हुईं और उन्होंने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में दाखिला लेने का मन बना लिया.
सुरेखा ने पहले तो कहा कि वे लेखक बनना चाहती हैं. लेकिन मां के कहने पर उन्होंने अपनी किस्मत आजमाई. उन्होंने फॉर्म भरा, ऑडिशन दिया और 1965 में उनका सेलेक्शन भी हो गया. इसके बाद तो सुरेखा जी ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.
वे 15 सालों तक नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा की रेप्यूट्री कंपनी के साथ काम करती रहीं. टीवी की दुनिया में वे बालिका वधू के अलावा बनेगी अपनी बात, परदेस में है मेरा दिल, एक था राजा एक थी रानी, केसर, कभी कभी और जस्ट मोहब्बत जैसे सीरियल्स का हिस्सा रहीं.
किस्सा कुर्सी का उनकी पहली फिल्म थी. इसके बाद वे तमस, सलीम लंगड़े पर मत रो, लिटिल बुद्धा, सरफरोश, जुबीदा, काली सलवार, रेनकोट, तुमसा नहीं देखा, हमको दीवाना कर गए, डेव डी, घोस्ट स्टोरीज और बधाई हो जैसी फिल्मों का हिस्सा रही हैं.