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90s में गायब होने की कगार पर खड़े अमिताभ बच्चन, जब एक फ्लॉप फिल्म ने दिया पुनर्जन्म, 500 मिलियन से ज्यादा व्यूज

90s में अमिताभ ने करियर का ऐसा दौर देखा, जब लोगों ने ये मानना शुरू कर दिया था कि शायद अब उनका करियर यहीं थम जाएगा. तब अमिताभ बच्चन को जिन चीजों ने फिर से स्क्रीन का कद्दावर लेजेंड बनाए रखा, उनमें से एक थी उनकी एक फ्लॉप फिल्म 'सूर्यवंशम'.

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'सूर्यवंशम' में अमिताभ बच्चन
'सूर्यवंशम' में अमिताभ बच्चन

हिंदी सिनेमा का महानायक कहे जाने वाले अमिताभ बच्चन की लाइफ, इंडियन सिनेमा फैन्स के लिए एक दंतकथा बन चुकी है. इंडियन थिएटर्स के बड़े पर्दे पर सबसे परमानेंट चेहरों में से एक अमिताभ की जिंदगी, उनके फिल्मी सफर और प्रेम प्रसंगों के चर्चे तक लोगों को जुबानी याद हैं. 

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55 साल और 200 फिल्मों से ज्यादा लंबे करियर में अमिताभ ने पर्दे पर कई बार पुनर्जन्म लिया है. उनके करियर का ग्राफ कई बार नीचे गया और कई बार ऊपर आया. मगर 90s में उन्होंने करियर का ऐसा दौर देखा, जब लोगों ने ये मानना शुरू कर दिया था कि शायद अब उनका करियर यहीं थम जाएगा. तब अमिताभ बच्चन को जिन चीजों ने फिर से स्क्रीन का कद्दावर लेजेंड बनाए रखा, उनमें से एक थी उनकी एक फ्लॉप फिल्म 'सूर्यवंशम'. 

एक गुजरती सदी के साथ अमिताभ के खो जाने का डर
साल 2000 सिर्फ एक नई सदी की शुरुआत भर नहीं थी. नई सदी की शुरुआत ने लोगों के एटिट्यूड उनकी इच्छाओं, महत्वाकांक्षाओं और चॉइस को भी बहुत तेजी से बदला था. देश में एक पूरी नई जेनरेशन जवान हो रही थी जिन्हें मिलेनियल्स कहा जाता है. और लेट 90s से ही सबकुछ बदला-बदला लगने लगा था. 

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'सूर्यवंशम' में अमिताभ बच्चन (क्रेडिट: सोशल मीडिया)

एक पूरी पीढ़ी ऐसी थी जिसने अमिताभ का 70s वाला एंग्री यंगमैन अवतार नहीं देखा था. जिन्होंने वो 80s का वो दौर भी नहीं देखा जब अमिताभ के एंग्री यंगमैन अवतार का सिस्टम से लड़ने वाला कलेवर कम हुआ और उनकी एक्शन हीरो इमेज बलवान हुई. 90s की शुरुआत अमिताभ के ऑनस्क्रीन जादू के फीके पड़ने से हुई और उनकी 'जादूगर', 'तूफान' और 'मैं आजाद हूं' जैसी फिल्में फ्लॉप हो गईं. बीच में कल्ट क्लासिक 'अग्निपथ' से उनका नेशनल अवॉर्ड आया और 'खुदा गवाह' से कामयाबी भी आई.  

तभी 1992 से 1997 के बीच अमिताभ टेम्परेरी रिटायरमेंट पर चले गए. उनकी वापसी 'मृत्युदाता' (1997) जैसी बड़ी फ्लॉप से हुई, जिसने अमिताभ की अपनी कंपनी को घाटे में खड़ा कर दिया. यंग ऑडियंस को 50 से ज्यादा उम्र के हो चुके, एक्शन हीरो अमिताभ का कद समझने में दिक्कत आ रही थी. उनकी 'लाल बादशाह' और 'कोहराम' जैसी फिल्में भी फ्लॉप हुईं. 

अमिताभ की 'बड़े मियां छोटे मियां' और 'मेजर साब' जरूर हिट हुईं, मगर पहली में लोगों ने गोविंदा को हीरो के रूप में देखा और दूसरी में अजय देवगन को. अमिताभ की एक्शन हीरो इमेज के साथ उन्हें लीड रोल में रखकर कहानियां तैयार करना राइटर्स और फिल्ममेकर्स के लिए मुश्किल हो रहा था. मगर इसी दौर में आई अमिताभ की फ्लॉप फिल्म 'सूर्यवंशम' (1999) ने एक अनोखा कमाल किया. 

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टीवी के परमानेंट आइकॉन बन गए अमिताभ 
लेट 90s और 2000s की शुरुआत टेलीविजन चैनल्स का दौर था. बॉक्स ऑफिस पर कुछ खास कमाल ना कर सकी 'सूर्यवंशम', जनता के एंटरटेनमेंट का फेवरेट जरिया बन चुके टीवी पर आई. घर-घर में चल रहे टीवी पर जनता वो फिल्में देखना ज्यादा पसंद करती थी, जिन्हें शुरू से मिस कर देने पर कहानी मिस कर देने का डर न हो. घर पर रूटीन लाइफ चलती रहे और फिल्म की कहानी से भी दोस्ती-यारी बनी रहे. और 'सूर्यवंशम' जो किसी भी नजर से कोई बहुत बड़ा सिनेमेटिक जादू नहीं थी, इस मामले में परफेक्ट निकली. 

'सूर्यवंशम' में अमिताभ बच्चन (क्रेडिट: सोशल मीडिया)

ऐसा लगता था जैसे टीवी पर हर दिन 'सूर्यवंशम' चलती ही रहती है. नई फिल्में देखने के लिए लोग थिएटर्स जाते, और टीवी पर 'सूर्यवंशम' फेवरेट बनी रहती. घर पर लोग परिवार के साथ फिल्म देखते थे और अमिताभ की फिल्म का फैमिली ड्रामा लोगों को अपील करता था. ऊपर से अमिताभ इसमें एक बाप और बेटे के डबल रोल में थे. 

उम्रदराज किरदार उन्हें बहुत सूट कर रहा था. ये कहना गलत नहीं होगा कि लोगों को 'सूर्यवंशम' में अमिताभ के यंग किरदार से ज्यादा, उनका बूढ़ा मगर कद्दावर शख्सियत वाला अवतार, ठाकुर भानु प्रताप सिंह अपील कर रहा था जो उसूलों के लिए अपने बेटे को भी सजा दे सकता था. वो एक जाती हुई पीढ़ी को रिप्रेजेंट कर रहा था, जिनके लिए नैतिकता और आचरण बहुत महत्वपूर्ण था. 

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उसका अपने बेटे के साथ कनफ्लिक्ट और आखिरकार बेटे का, अपनी मेहनत से अपने बाप के कद को मैच करना फिल्म का इम्प्रेसिव एंगल था. इस फिल्म ने अमिताभ को लगातार लोगों की नजरों के सामने बनाए रखा. ये वही दौर था जब अमिताभ 'कौन बनेगा करोड़पति' से भी टीवी पर धाक जमानी शुरू कर चुके थे. और इस कॉम्बिनेशन ने टीवी देख रही यंग ऑडियंस के सामने एक नया अमिताभ बच्चन पेश किया. 

'सूर्यवंशम' से एक सीन (क्रेडिट: सोशल मीडिया)

एंटरटेनमेंट के दुनिया में आती डिजिटल क्रांति का भी 'सूर्यवंशम' ने बराबर सामना किया. 2020 में ये फिल्म यूट्यूब पर आई, तो इसे शेयर करने वाले चैनल पर 500 मिलियन से ज्यादा व्यूज हो गए. अमिताभ के करियर को नई सदी में दोबारा ऊपर उठाने वाली 'मोहब्बतें' और 'कभी खुशी कभी गम' को याद कीजिए. इन दोनों फिल्मों में अमिताभ के किरदार नैतिकता की उसी लकीर को फॉलो कर रहे थे जो ठाकुर भानु प्रताप ने खींची थी. 

इसी तरह 'आंखें' और 'खाकी' में भी अमिताभ के किरदार उनकी रियल उम्र के करीब थे और वो अपनी पहचान, अपने उसूलों के लिए ही लड़ रहे थे. ये कहा जा सकता है कि टीवी पर चलती 'सूर्यवंशम' ने अमिताभ की जो इमेज बनाई, फिल्ममेकर्स ने उसे ही बड़े पर्दे पर नई कहानियों में उतारना शुरू किया. और अमिताभ एक पूरी नई पीढ़ी के सामने एक नए अवतार में खड़े हो गए. 

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1942 में जन्मे अमिताभ ने जब 'सात हिंदुस्तानी' (1969) में डेब्यू किया था तब वो 27 साल के थे. आज वो 82 साल के हो चुके हैं और इसी साल उन्होंने 'कल्कि 2898 AD' में जनता पर वो जादू किया है कि लोग इसके सीक्वल में उन्हें देखने का इंतजार कर रहे हैं. उनकी ये फिल्म 2024 की सबसे बड़ी इंडियन फिल्म है.

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