बॉलीवुड इंडस्ट्री में आशा पारेख न भूलने वाला नाम है. एक्टिंग के लिए अलावा आशा जी ने इंडस्ट्री में कई ऐसे काम किए हैं. उन्हीं की इन अचीवमेंट को ध्यान में रखते हुए एंटरटेनमेंट जगत के सबसे प्रेस्टिजियस अवॉर्ड दादा साहेब फाल्के से उन्हें इस साल नवाजा गया है. आशा जी हमसे अपने इस लंबी जर्नी पर दिल खोलकर बातचीत करती हैं.
कई जगह आपके नाम के आगे 'रिटायर' एक्ट्रेस लिखा जाता है. ये शब्द आपको परेशान नहीं करता?
-लोगों को कुछ निगेटिव व सेंसेशनल लिखना होता है, तो ऐसी चीजें होती रहती हैं. इसलिए मेरे नाम के आगे रिटायर लिखते हैं. मैं किससे कंपलेन करने जाऊं, मेरी कोई नहीं सुनता है. अब मैं हर किसी का मुंह तो जाकर बंद नहीं कर सकती हूं न. मैंने इतना कुछ इस इंडस्ट्री को दिया है, अगर बदले में ये भी मिलता है, तो मंजूर है. रही बात मेरी, मैं जिस तरह से लाइफ जीना चाहती हूं, उस पर फोकस करती हूं.
1952 से करियर की शुरूआत की है. पीछे मुड़कर देखती हैं, तो क्या सोचती हैं?
- अपनी इस जर्नी को देखती हूं, तो लगता है कि मैंने खोया बहुत कम..पाया बहुत ज्यादा है. मुझे लगता है कि मैंने अपनी जिंदगी में जो कुछ भी किया है, उसकी मुझे बहुत खुशी है. मैं तो यही दुआ करती हूं कि भगवान मुझे अगली जिंदगी दे, तो यही सबकुछ मिले. हां, मेरी गलतियों को हटाकर मैं वही आशा पारिख दोबारा जन्म लेना चाहूंगी.
कुछ गलतियों को ठीक करने की भी ख्वाहिश होती होगी?
-काश ऐसा हो सकता.. लेकिन जो संभव ही नहीं, उसकी क्यों सोचे. जो बीत गया सो बीत गया, उसे वापस थोड़े ही ला सकते हैं. अब मैं कितना भी चाहूं कि मैं बीस साल की हो जाऊं, वो तो नहीं हो पाऊंगी मैं. मैं तो अब ऐसे देखती हूं कि मेरी जो गलतियां रही हैं, उन्हीं ने काफी कुछ सिखाया है. हालांकि काश.. तो हर किसी की जिंदगी में होता है. इंसान हूं, तो सोचती जरूर हूं कि काश मैंने इसकी जगह ये कर लिया होता, काश मैं वो गलती नहीं करती.. बस यही अफसोस करती हूं.
दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड बहुत ही कम एक्ट्रेसेज को नसीब हुआ है. आप मानती हैं, अवॉर्ड सिस्टम पर भी कहीं न कहीं पेट्रियाकी सोच हावी है?
- नहीं ऐसा नहीं है. देखिए जिन एक्टर्स को मिला है, उन्होंने कितना कुछ अचीव किया है. मैंने भी बहुत कुछ किया है, जो कई लोगों को पता ही नहीं है. सिने आर्टिस्ट असोसिएशन की मैं एकलौती फीमेल एक्ट्रेस मेंबर थी. अमजद भाई जी ने सिने आर्टिस्ट वेलफेयर ट्रस्ट शुरू किया, जिसमें भी मैं ही एक अकेली फीमेल एक्ट्रेस थी. मैं सेंसर बोर्ड चीफ की पहली फीमेल मेंबर बनी हूं. तो अपनी जिंदगी में बहुत सारे फर्स्ट काम किए हैं. मेरी पहचान केवल एक्ट्रेस के रूप में ही नहीं है. बल्कि इंडस्ट्री के लिए मैंने बहुत सारा काम भी किया है.
दशक दर दशक एक्ट्रेसेज की परिभाषा बदली है. आज की जनरेशन को देखकर क्या लगता है?
-परिभाषा तो नहीं बदलती है, हां माहौल जरूर बदलता रहता है. आज के वक्त की बात करूं, तो जो एंटरटेनमेंट फिल्में होती हैं, उसमें बेचारियों को कुछ करने को नहीं मिलता है. कुछ ऐसी वुमन ओरिऐंटेड फिल्में हैं, जो बन रही हैं. उसकी मैं दिल से तारीफ करती हूं. हालांकि बड़ी-बड़ी फिल्मों में हीरोइन का रोल अभी भी बहुत कम होता है. ये मेल डोमिनेटेड इंडस्ट्री रही है, इसमें बदलाव की उम्मीद करती हूं.
कहा जाता है कि आज की सिनेमा में प्यार और मेलोडी दोनों ही गायब होते जा रहे हैं? फिल्में अब मटेरियलिज्म और भव्यता तक सीमित होकर रह गई हैं. आपकी राय?
- हां बिलकुल ऐसा है. कहानी में आत्मा मरती जा रही है. अब आत्मा ही नहीं रहे, तो बाहरी साज सज्जा का किया जा सकता है. ये हमारे वक्त भी होता था, अगर कंटेंट बढ़ियां न हो, तो फिल्में नहीं चलती थीं. मुझे याद है चिराग जो फिल्म थी, वो मेरी पसंदीदा फिल्म थी. इसमें मैं अंधी के किरदार में भी थी लेकिन फिल्म दर्शकों ने नकार दी. फैंस का कहना था कि आशा पारिख को अंधी क्यों बना दिया, आखिर में उसकी आंखें ले आते. उस वक्त भी दर्शकों को समझ पाना मुश्किल होता था. हालांकि इस बीच दृश्यम और ऊंचाई ने कितना अच्छा काम किया, वो तो किसी भव्यता से लबरेज नहीं थे.
सोशल मीडिया पर जिस तरह से बॉलीवुड इंडस्ट्री को लेकर निगेटिविटी फैली है. उसे देखकर दुख होता है?
-यह बहुत गलत है. फिल्म तो फिल्म है, जिसका मूल मकसद एंटरटेनमेंट है. अब किसी एक्ट्रेस ने ओरेंज पहन लिया या नाम कुछ ऐसा हो गया, तो उसे बैन कर रहे हैं? ये नहीं अच्छा लगता है. हमारी इंडस्ट्री मरती जा रही है. फिल्में चल ही नहीं रही हैं, हालात पहले से ही काफी खस्ता हैं और उस पर ये बायकॉट और बैन वाली चीजें, इससे नुकसान होता है. इंडस्ट्री ही खत्म हो जाएगी. लोग वैसे ही थिएटर पर नहीं जा रहे हैं. अगर फिल्में फ्लॉप होती रहीं, तो दूसरी फिल्म कैसे बनेगी.
एक तरफ हम प्रोग्रेसिव होने का दावा करते हैं, तो वहीं बिकिनी के रंग को लेकर बवाल जैसे किस्से हमें किस समाज की ओर धकेल रहे हैं?
-बिकनी पर बवाल नहीं था, यहां तो ओरेंज रंग की बिकिनी को लेकर सवाल उठ रहे हैं. मुझे लगता है कि हमारा दिमाग अब बंद होता जा रहा है. हम बहुत ही छोटी सोच के होते जा रहे हैं, जो गलत है. बॉलीवुड हमेशा से सॉफ्ट टारगेट रहा है.
एक्ट्रेस के रूप में आपके डूज ऐंड डोंट्स क्या थे?
-स्वीम सूट नहीं पहनना ही मेरा डोंट था. मुझे लगता हमारे वक्त बहुत कम ही एक्ट्रेसेज ने स्वीम सूट पहना है. यहां हमें ऑडियंस का डर नहीं होता था, बस हमारी चॉइस होती थी कि हमें नहीं पहनना है. उस वक्त इस तरह का दबाव नहीं होते थे. मुझे आजतक इस डिसीजन की वजह से कोई रिजेक्शन नहीं मिले हैं.
आपने ऑटोबायोग्राफी लिखी है. बायोपिक का प्लान है?
- नहीं बाबा.. ऑटोबायोग्राफी भी हंसी मजाक में लिख दी. लेकिन बायोपिक को लेकर मेरी कोई अपेक्षा नहीं है. मैं चाहती ही नहीं हूं कि मेरी कोई बायोपिक बने.
आपकी वहीदा जी और हेलेन जी की बॉन्डिंग बहुत फेमस है. आपस में गुजारे कोई क्रेजी मोमंट जिसे शेयर कर सकें?
-बहुत से ऐसे पल रहे हैं. हमने साथ में काफी ट्रैवलिंग की है. एक अलग किस्म की बॉन्डिंग हो गई है, तो हम मिलते हैं, हंसी मजाक करते हैं. हम हाल ही में डिनर के लिए साथ गए थे. मुझे याद है कि हम तीनों एक साथ क्रूज पर गए थे और हमने एक ही कमरा बुक किया था. उस रूम में एक ही बाथरूम था, तो हमारी काफी नोंक-झोंक हुई थी.
एक चाइल्ड आर्टिस्ट के रूप में आपने करियर की शुरूआत की है. वहीं आज के चाइल्ड आर्टिस्ट पर बढ़ते प्रेशर को देखकर कितनी कोफ्त होती है?
- उन पर प्रेशर डालना बहुत गलत है. मैं देखती हूं, इतने छोटे बच्चों को डांस भी करवा रहे हैं, उनसे गाना भी गवा रहे हैं, एक्टिंग के लिए भेज रहे हैं. टैलेंट है, अच्छी बात है लेकिन आप उसपर प्रेशर डालकर उससे कुछ अचीव करवाना चाहते हैं. वो सही नहीं है. आगे चलकर वो बच्चा अचीव न कर पाए, तो उसका फ्रस्ट्रेशन कौन हैंडल करेगा. वहीं दूसरी ओर कोई बच्चा जीत जाता है, तो उसके सिर पर सक्सेस सवार हो जाता है और आगे चलकर उसकी मेहनत करने वाली आदत खत्म हो जाती है. मां बाप को बिलकुल प्रेशर नहीं डालना चाहिए.
गुजरते साल को कैसे देखती हैं और नए साल से क्या उम्मीदें हैं?
- गुजरता साल तो बहुत अच्छा रहा. इसी साल मुझे दादा साहेब अवॉर्ड मिला है, जिसे मैंने कभी सपने में सोचा ही नहीं था. आने वाले साल से बस यही उम्मीद है कि मैं हेल्दी रहूं और बहुत सारा काम करूं.