एक ओर मणिरत्नम की पीएस-2 जैसी ग्रैंड स्केल वाली फिल्म रिलीज हो रही है, तो वहीं दूसरी ओर मिथुन चक्रवर्ती के छोटे बेटे नमाशी चक्रवर्ती, राजकुमार संतोषी की फिल्म 'बैड बॉय' से अपना बॉलीवुड डेब्यू करने जा रहे हैं. न्यूकमर नमाशी और अमरीन कुरैशी की यह फिल्म क्रिटिक्स के मानकों पर कितनी खरी उतरती है. उसके लिए पढ़ें ये रिव्यू...
कहानी
बैंगलुरु में रहने वाले शुभांकर बनर्जी (शाश्वत चटर्जी) अपने उसूलों के पक्के हैं और उन्हें चीजों की क्वालिटी से कोई समझौता गंवारा नहीं है. यहां तक कि उन्होंने अपनी फैमिली पर भी अपना यह विचार थोप कर रखा है. बेटी रितुपर्णा (अमरीन कुरैशी) अपने पिताजी की सख्ती से परेशान हैं, लेकिन डर इतना है कि उन्हें एक शब्द कहने की हिम्मत नहीं है. वहीं दूसरी ओर रघु (नमाशी चक्रवर्ती) और उसका परिवार है. रघु के पिता (राजेश कुमार) कबाड़ी की दुकान चलाते हैं, बहुत ही सिंपल-सी फैमिली है. दो अलग स्टैंडर्ड व क्लास से ताल्लुक रखने वाले यूथ जब आपस में टकराते हैं और आगे चलकर जब प्यार में पड़ते हैं, तो वहां से कहानी एक नया मोड़ लेती है. रितू के पिता रघु के सामने एक चैलेंज रखते हैं, जिसे पूरा करने के बाद ही रघु और रितू एक साथ हो सकते हैं. आखिर क्या है वो चैलेंज? क्या रघु उसे पूरा कर पाता है?
डायरेक्टर
बॉलीवुड में दामिनी, अंदाज अपना-अपना, घायल, अजब प्रेम की गजब कहानी, पुकार, लज्जा जैसी फिल्में बना चुके राजकुमार संतोषी 'बैड बॉय' लेकर आए हैं. सबसे बड़ा सवाल कि आखिर उन्हें इस कहानी में ऐसा क्या पोटेंशियल दिखा, जिसे बनाने को वो राजी हो गए? पूरी फिल्म देखने के दौरान ऐसा लगता है कि 90 की फिल्म में आज की जनरेशन के एक्टर को फिट कर दिया गया है. कहानी इतनी बेसिक और प्रेडिक्टेबल है कि आपको पहले से पता होता है कि अगले सीन में क्या होने वाला है. ऐसे फॉर्मूले पर हजारों बॉलीवुड की कहानियां लिखी गई हैं. बावजूद इसके, इसी फॉर्मूले को लेकर फिल्म बनाने की हिम्मत संतोषी जी ने आखिर क्यों की है, वो समझ से परे है. दावा है कि आप 90 की किसी भी फिल्म को उठा लें, लगेगा उसी का रेफरेंस है. जब स्क्रिप्ट ही इतनी कमजोर है, तो जाहिर है चाहकर भी आपका फिल्म से कनेक्ट कर पाना मुश्किल हो जाता है.
हालांकि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि फिल्म देखने के दौरान 90s की फिल्मों की यादें ताजा हो जाती हैं. सरल कहानी, ड्रामे का ओवरडोज और एक्शन करते हीरो पहले बड़ा लुभाते थे, लेकिन क्योंकि अब वक्त बदल चुका है और कंटेंट ड्रीवन फिल्मों को तवज्जो दी जा रही है, ऐसे में इस फिल्म का स्टैंड कर पाना थोड़ा मुश्किल लगता है. गनीमत है कि डायरेक्टर ने फिल्म के डायलॉग्स और उसके फ्लेवर को कॉमिक अंदाज में परोसा है, जो कहीं-कहीं आपको हंसाते हैं और एक लाइट फिल्म का एहसास कराते हैं. एक गाने में जब मिथुन चक्रवर्ती की एंट्री होती है, वहां पिता और बेटे को डांस करता देख अच्छा लगता है. अगर फिल्म की कहानी में थोड़ी मेहनत होती, तो शायद इसकी डेस्टिनी कुछ और होती. ओवरऑल कमजोर स्क्रीनप्ले और प्रेडिक्टेबल सीन्स की वजह से फिल्म औसत कैटेगरी तक सीमित रह जाती है.
टेक्निकल
फिल्म के डायलॉग्स पर मेहनत दिखती है. राइटर संजीव के लिखे वन लाइनर डायलॉग्स आपको गुदगुदाते हैं और कॉमेडी के फ्लेवर को बरकरार रखते हैं. हिमेश रेशमिया के म्यूजिक से बहुत उम्मीदें होती हैं लेकिन इस फिल्म के गाने बहुत निराश करते हैं. खासकर मिथुन की एंट्री वाले गाने 'जनाब ए अली' को भी ढंग से प्रमोट नहीं किया गया है. सिनेमैटोग्राफर तनवीर मीर का काम डीसेंट रहा है, एरियल शॉट्स तो बेहतरीन हैं लेकिन कुछ क्लोजअप शॉट्स की टेक्निक पर चूक नजर आती है. फिल्म के फर्स्ट हाफ की एडिटिंग की सख्त जरूरत थी, एडिटर स्टीवन एच बर्नाड चाहते तो कुछ गैर जरूरी शॉट्स को हटाकर फिल्म को और थोड़ा क्रिस्प कर सकते थे.
एक्टिंग
नमाशी चक्रवर्ती ने फिल्म से अपना डेब्यू किया है. इंटरव्यूज के दौरान नमाशी यह बता चुके हैं कि उन्होंने अपनी पहचान छिपाकर फिल्मों के लिए ऑडिशन दिए हैं. चूंकि अब लोग जान चुके हैं कि वो मिथुन के बेटे हैं, तो उन्हें अपनी कमर कसनी होगी. मिथुन जैसे एक्टर की लेगेसी को आगे बढ़ाने के लिए उन्हें अपने एक्टिंग क्राफ्ट पर गंभीरता से काम करने की जरूरत है. रघु के किरदार में कुछ सीन्स में नमाशी ओवर एक्टिंग करते दिखे हैं, तो कुछ जगहों पर कॉमेडी और उनके एक्सप्रेशन का तालमेल ठीक से बैठता नजर नहीं आता है. लास्ट के एक इमोशनल सीन पर भी नमाशी के एक्सप्रेशन बेजार से लगते हैं. रितू के रूप में अमरीन कुरैशी का भी काम एवरेज रहा है. कई जगह वो अंडर परफॉर्म करती दिखीं, चेहरे पर असहजता साफ झलक रही है. फ्लैट एक्सप्रेशन की वजह अमरीन के कई इमोशन स्क्रीन पर ढंग से इमोट होते नहीं दिखते हैं.
खैर, इनकी पहली फिल्म है, हो सकता है एक्सपीरियंस के साथ उनकी एक्टिंग में परिपक्वता आए. एंग्री पिता के रूप में शाश्वत चटर्जी का काम कमाल का रहा है. पोल्टू बने जॉनी लीवर ने फिल्म के सेकेंड हाफ को संभाला. उनकी कॉमेडी और अतरंगी फेशियल एक्सप्रेशन आज भी गुदगुदाते हैं. गरीब पिता बने राजेश कुमार ने अपना काम पूरी ईमानदारी से किया है. बाकी के सभी सपोर्टिंग स्टारकास्ट का काम सहज और ऑन पॉइंट रहा.
क्यों देखें
ये एक साफ सुथरी फैमिली फिल्म है, जिसमें कॉमेडी का तड़का लगा है. भले कहानी बोरिंग हो लेकिन डायलॉग्स और कॉमेडी का पूरा ख्याल रखा गया है. फिल्म को एक मौका दिया जा सकता है. मिथुन के बेटे ने डेब्यू किया है, तो उनके फैंस को भी फिल्म देखनी चाहिए. 90s के स्टाइल में बनी यह फिल्म आपको स्लाइस ऑफ लाइफ का फील देती है.