410 करोड़ वाला बजट...ऑस्कर जीतने वाली कंपनी का VFX...रणबीर-आलिया की जोड़ी, बायकॉट वाले ट्रेंड में आपका साथ रहा हो या ना रहा हो, फिल्म को लेकर बज तो था सभी के मन में...पैसे आपके नहीं लगे लेकिन हिट होगी या फ्लॉप, ये सवाल तो कई बार कौंधा. उस जिज्ञासा को शांत करने के लिए पक्की बात है, देर रात कई बार गूगल पर Brahmastra Review भी टाइप किया ही होगा और हमे पता है आप पढ़ भी चुके हैं. तो नया क्या बताएं? कुछ अलग लीक से हटकर है क्या? सब विश्वास का खेल है जनाब, ये विश्वास ही सबकुछ है. ये विश्वास ही ब्रह्मास्त्र की किस्मत है, ये विश्वास ही बॉक्स ऑफिस पर ब्रह्मास्त्र की सफलता का पैमाना है. ज्यादा समझ नहीं लगी होगी...थोड़ा डिटेल में चलते हैं
क्या आप अस्त्रों की दुनिया में 'विश्वास' करते हैं?
ब्रह्मास्त्र अस्त्रों की दुनिया है, अलग-अलग अस्त्र, उसकी अलग-अलग ताकत और कई सारे रक्षक. अब ट्रेलर देखकर पता चल गया था कि VFX का जबरदस्त बवाल है, हर चीज ग्रैंड दिखाई गई है. अब अगर तब ट्रेलर के दौरान आपने खुले दिल से उस अस्त्रों की दुनिया का स्वागत किया था, ब्रह्मास्त्र आपके लिए बनी है. लेकिन अगर बुद्धिजीवियों की तरह आपके मन कई सारे सवाल उठ गए. अरे आग इस रंग की थोड़ी होती है....ये क्या हैरी पॉटर का सस्ता डुप्लीकेट सा लग रहा है, अरे क्या बच्चों की फिल्म बना दी है. हम जानते हैं कई के मन में ये सवाल भी आए थे और ऐसे लोगों की अच्छी तादाद थी, तो बता दें ब्रह्मास्त्र आपके लिए नहीं बनी है. ट्रेलर अगर आपका अस्त्रों की दुनिया में विश्वास नहीं जगा पाया है, ये 2 घंटा 45 मिनट की फिल्म कोई जादू नहीं करने वाली है. ये मन है आपका....इसमें एक बार कुछ घर कर जाए ना तो बस उसी दिशा में सोचने लग जाते हैं.
फिल्म की कहानी...स्टारकास्ट....डायरेक्शन, ये सब मायने रखता है. रिव्यू लिखते हैं तो जानते हैं इन पहलुओं का किसी भी फिल्म में क्या रोल होता है. लेकिन एक पहलू छूट जाता है और शायद वहीं कारण बनता है कि क्यों कई बार फिल्म क्रिटिक और ऑडियंस रिएक्शन एक दूसरे से मैच नहीं खाते हैं....ये वो विश्वास ही है...शब्द एक है लेकिन सारी ताकत इसी में छिपी है. ब्रह्मास्त्र जैसी फिल्म की बात हो...ये विश्वास मेकर्स के लिए किसी जुए जैसा है...अगर चल गया तो ऐसी छप्पर फाड़ कमाई होगी कि सारे रिकॉर्ड टूट जाएंगे...लोगों ने अगर अस्त्रों की दुनिया में दिलचस्पी दिखा दी...निगेटिव रिव्यू...कमजोर कहानी...सब धरा का धरा रह जाएगा और सिर्फ उस दुनिया को जानने की ललक आपको बड़े पर्दे तक खींच लाएगी.
ब्रह्मास्त्र के ट्रेलर के बाद विश्वास या किंतु-परंतु?
लेकिन अगर इसका उल्टा हुआ....मेकर्स विश्वास नहीं जगा पाए....410 क्या 1000 करोड़ खर्च कर दें, ब्रह्मास्त्र को फ्लॉप होने से कोई नहीं रोक सकता. आपको समझना पड़ेगा....ब्रह्मास्त्र कोई साधारण या कह लीजिए टिपिकल बॉलीवुड फिल्म नहीं है, जमकर पैसा इसलिए लगाया गया है क्योंकि कुछ अलग दिखाने की कोशिश है. वो कोशिश आपका विश्वास जीतने की है...इसलिए है कि आप सही मायनों में अस्त्रों की दुनिया के बारे में और ज्यादा जानना चाहें. लेकिन अगर लॉजिक ढूंढा...मन में किंतु-परंतु वाले सवाल आए...ब्रह्मास्त्र के मेकर्स की वहीं करारी हार हो जाएगी और ऐसी सूरत में तो आने वाले पार्ट बनाने को लेकर भी कई बार सोचना पड़ेगा.
विश्वास की ताकत जानते हैं आप?
ये पढ़ते-पढ़ते आपको लग रहा होगा...'विश्वास' शब्द को लेकर कितना कुछ कह दिया गया है, लेकिन इसकी ताकत को आप कमतर मत आंकिए. कुछ उदाहरण देते हैं...बॉलीवुड के ही है...टीवी वाले भी हैं, सारा खेल समझ जाएंगे. शुरुआत 90s के दौर से...शक्तिमान सीरियल आया करता था, हर रविवार दूर दर्शन पर राजमा चावल खाते हुए टीवी पर टकटकी लगाए जरूर देखा है...जरा आज के बच्चों से पूछ लीजिए वो ये सीरियल देखना चाहते हैं....क्या उन्हें शक्तिमान जैसा सुपरहीरो इंप्रेस करने वाला है....सवाल ही पैदा नहीं होता...विश्वास ही नहीं हैं उन्हें....उनके लिए तो वो कहानी भी पुरानी है और जो किरदार उसे निभा रहे हैं वो 'आउटडेटेड'. लेकिन अब अपने आप से पूछिए...जब आप शक्तिमान देखते थे....क्या आप भी ऐसा ही सोचते थे? जवाब तो मिल ही गया हो...तो बस इसी को विश्वास कहते हैं...आपने किया इसलिए शक्तिमान इतने साल चला...
फिल्मों की बात करते हैं....राकेश रोशन की 'कोई मिल गया' सभी ने कई बार देख रखी है....जब बच्चे थे तो वो बॉस्केटबॉल वाला सीन तो अलग ही मजा दे जाता था....लॉजिक था क्या उसमें? सिर्फ विश्वास था जादू की ताकत में...हमने कर लिया इसलिए फिल्म कई बार देख डाली....जादू की दुनिया में आपने ऐसी दिलचस्पी दिखाई कि मेकर्स ने क्रिश पैदा कर दिया...क्रिश 3 तक ले आए....बॉक्स ऑफिस पर कैसी रही...बताने की जरूरत थोड़ी है.
ब्रह्मास्त्र हिट है या फ्लॉप है?
वैसे विश्वास ये बड़ी टेढ़ी चीज है....ये अलग-अलग चीजों से बनता है...जैसे ब्रह्मास्त्र में अगर आपने खुद को पूरी तरह अस्त्रों में इन्वेस्ट कर दिया...कह सकते हैं कि आपको उनकी दुनिया में विश्वास है...लेकिन कई बार फिल्म से ज्यादा फिल्म बनाने वाले पर आपका विश्वास होता है...उस सूरत में भी विश्वास ही सारा खेल करता है. राजामौली की बात कर लीजिए....वो जीता-जागता एक ब्रांड हैं...उनका नाम ही लोगों के लिए विश्वास की मुहर है...उनकी फिल्म का नाम अनाउंस ना हो...सिर्फ पता चल जाए कि राजामौली किसी प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं...लोगों के मन में एक बड़ी ब्लॉकबस्टर चलने लगती है...रोहित शेट्टी भी ऐसा ही कमाल करते हैं...फिल्में देख लीजिए उनकी...लॉजिक तो मिलता ही नहीं है, कहानी भी हमेशा सेम सी ही लगती है...लेकिन एक चीज है...उड़ती हुई गाड़ियों की दुनिया...आपने उसमें इतना विश्वास दिखाया कि रोहित शेट्टी बॉलीवुड के एक सफल बल्कि काफी सफल डायरेक्टर माने जाते हैं.
तो अब ये आपको ही तय करना है....आप कौन सी वाली ऑडियंस हैं...विश्वास करने वाली या लॉजिक और किंतु परंतु करने वाली...अगर विश्वास वाला पहलू हावी हो गया तो ब्रह्मास्त्र बहुत बड़ी बल्कि ऑल टाइम ब्लॉकबस्टर बनने वाली है...लेकिन अगर लॉजिक और किंतु परंतु वाली ऑडियंस की तादाद ज्यादा रही...तो ब्रह्मास्त्र का निशाना एकदम सटीक तो बैठेगा...लेकिन वो हमला सीधा मेकर्स पर होगा...वो चित हो जाएंगे.