
वो तारीख थी 28 दिसंबर 1895, जब लुमियर ब्रदर्स द्वारा बनाई गई दुनिया की पहली फिल्म की पेरिस में पब्लिक स्क्रीनिंग हुई. ये फिल्म मात्र 45 सेकेंड की थी. करीब एक साल बाद इस फिल्म का प्रदर्शन भारत में भी हुआ. इस शुरुआत के बाद अगले कुछ बरसों तक फिल्मों में कई तरह के प्रयोग होते रहे. फिर कैलेंडर में साल बदलता है और 1911 में तब के बॉम्बे शहर में स्थित अमेरिका-इंडिया पिक्चर पैलेस में एक फिल्म दिखाई जाती है, जिसका नाम था- द लाइफ ऑफ क्राइस्ट (The Life of Jesus Christ).
तब इस फिल्म को देखने वहां एक 41 साल का शख्स भी पहुंचता है. उसका नाम था धुंडिराज. फिल्म देखते हुए धुंडिराज तालियां पीट रहा था और साथ ही साथ उसके मन में कई कल्पनाएं आकार ले रही थीं. उस वक्त थिएटर में बैठे किसी व्यक्ति को ये अंदाजा भी नहीं था कि बहुत जल्द भारत के सिनेमा जगत का इतिहास रचा जाने वाला है.
इस घटना के करीब 2 साल बाद आज के ही दिन यानि 3 मई 1913 को भारत की पहली फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' रिलीज होती है. जिस धुंडिराज नाम के शख्स का हमने शुरुआत में जिक्र किया, उनका पूरा नाम था धुंडिराज गोविंद फाल्के, जिन्हें हम भारतीय फिल्मों के पितामह दादा साहेब फाल्के के नाम से जानते हैं.
इस फिल्म को बनाने में दादा साहेब फाल्के को कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ा, इस बात से आज भी बहुत सारे लोग अनजान हैं. आज जब फिल्मों के VFX या उसकी कहानी और किरदार को लेकर सोशल मीडिया पर बहस छिड़ जाती है, ऐसे समय में उस दौर की कल्पना करना भी मुश्किल है जब संसाधन बहुत सीमित थे. तो आज भारत की पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र की रिलीज के 110 साल पूरे होने के मौके पर हम आपको इस फिल्म के बनने से लेकर रिलीज होने तक के पूरे सफर के बारे में बताएंगे.
फिल्म देखकर आया फिल्में बनाने का आइडिया:
नासिक के एक पारंपरिक ब्राह्मण परिवार में 30 अप्रैल 1870 को दादा साहेब फाल्के का जन्म हुआ. शुरुआती पढ़ाई जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स में हुई. इसके बाद उन्होंने बड़ोदा के कला भवन में दाखिला लिया और अपने लिए एक सही राह तलाशनी शुरू कर दी. लेकिन उनका मन किसी एक पेशे में टिक नहीं पाता था.
उस वक्त के मशहूर चित्रकार राजा रवि वर्मा से प्रभावित होकर दादा साहेब ने उनका प्रेस जॉइन कर लिया. इस बीच किसी ने उन्हें खुद का प्रेस शुरू करने की सलाह दी. दादा साहेब ने बात मान ली और लक्ष्मी आर्ट प्रिंटिग वर्क्स नाम से प्रेस शुरू कर दिया. इस प्रिटिंग प्रेस में नई मशीने लाने के लिए दादा साहेब फाल्के 1909 में जर्मनी गए तो वापस आने पर बिजनेस पार्टनर से अनबन हो गई. मजबूरन उन्हें प्रेस छोड़ना पड़ा.
कहते हैं कि इसके बाद फाल्के वैरागी हो गए और सब छोड़कर बनारस चले गए. लेकिन किसे पता था कि आने वाला साल उनकी जिंदगी की नई इबारत लिखने वाला है. साल 1911 में दादा साहेब अपने बेटे के साथ अमेरिका-इंडिया पिक्चर पैलेस में 'अमेजिंग एनिमल्स' नाम की फिल्म देखने पहुंचते हैं. स्क्रीन पर जानवरों को देखकर फाल्के का बेटा अचंभित हो जाता है और घर आकर अपनी मां को सारी बातें बताता है.
क्योंकि तब के दौर के लिए ये सब कुछ कल्पना जैसा था इसलिए बच्चे की बात पर कोई यकीन नहीं करता. इसलिए अगले दिन दादा साहेब पूरी फैमिली के साथ वहीं फिल्म देखने पहुंचते हैं. लेकिन यहां पर एक ट्विस्ट आ जाता है और यही ट्विस्ट दादा साहेब फाल्के की पूरी जिंदगी बदल देता है. दरअसल होता ये है कि जिस दिन फाल्के फैमिली फिल्म देखने पहुंचती है, उस दिन ईस्टर था. इसलिए थियेटर में जानवरों वाली फिल्म की जगह ईसामसीह के जीवन पर आधारित फिल्म 'द लाइफ ऑफ क्राइस्ट' दिखाई जाती है. इस फिल्म को एक फ्रेंच डायरेक्टर ने बनाया था.
जब थियेटर में बैठकर दादा साहेब फाल्के ने द लाइफ ऑफ क्राइस्ट देखी तो उनके मन में फिल्मों को लेकर कई कौतूहल जागे. फाल्के ने सोचा कि ऐसी फिल्म तो भारतीय परिदृश्य पर भी बनाई जा सकती है. इसलिए वापस आते ही उन्होंने फिल्म बनाने के तरीकों पर रिसर्च शुरू कर दी. जहां से भी हो सकता था, उन्होंने फिल्मों ने जुड़ी किताबें, कैटालॉग, इक्विपमेंट्स इकठ्ठे करने शुरू कर दिए.
वो हर शाम 4-5 घंटे बैठकर फिल्म देखा करते थे. इस वजह से उनकी नींद भी पूरी नहीं होती थी. नतीजा ये हुआ कि उन्हें दिखाई देना लगभग बंद हो गया. हालांकि डॉक्टर के इलाज की बदौलत रोशनी वापस भी आ गई. इसके बाद दादा साहेब फाल्के ने लंदन जाने का विचार किया ताकि फिल्म बनाने से जुड़ी तकनीकि जानकारियां हासिल की जा सकें. लेकिन उसके लिए पैसे कहां से आते? अब तक फाल्के अपनी सारी जमापूंजी स्वाहा कर चुके थे. इसलिए उन्होंने किसी तरह अपनी इंश्योरेंस पॉलिसी गिरवी रखकर 10 हजार रुपये का जुगाड़ किया और 1 फरवरी 1912 को लंदन के लिए रवाना हो गए.
लंदन में उन्होंने Bioscope Cine-Weekly नाम की साप्ताहिक मैग्जीन के एडिटर Mr. Cabourn से मुलाकात की. फाल्के इस मैगजीन के सब्सक्राइबर थे, लिहाजा Cabourn से उनकी अच्छी दोस्ती हो गई. शुरूआत में तो Cabourn ने फिल्म बनाने का आइडिया छोड़ देने का कहा लेकिन दादा साहेब फाल्के की डेडिकेशन के आगे उन्हें झुकना पड़ा. Cabourn ने ही फाल्के की मुलाकात मशहूर ब्रिटिश डायरेक्टर और प्रोड्यूसर सेसिल हेपवर्थ (Cecil Milton Hepworth) से करवाई जिन्होंने दादा साहेब को फिल्में बनाने से जुड़े कई गुर सिखाए.
इसके करीब दो महीने बाद कैमरे और बाकि जरूरी एक्विपमेंट्स के साथ दादा साहेब फाल्के भारत लौट आए. फिल्म बनाने की तकनीक तो मिल गई थी लेकिन पैसे अब भी नहीं थे. इसलिए फाइनेंसर्स को यकीन दिलाने के लिए उन्होंने 'मटर के पौधे का विकास' नाम से एक शॉर्ट फिल्म बनाई. इस 1 मिनट की शॉर्ट फिल्म में मटर के दाने से पौधा बनने तक की पूरी प्रक्रिया दिखाई गई थी. ये तरकीब काम कर गई और उन्हें फिल्म बनाने के लिए एक छोटी रकम लोन के तौर पर मिल गई.
फिल्म में काम करने का नहीं तैयार थी कोई महिला:
यहां से भारत की पहली फीचर फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' बनाने का सफर तो शुरू हो गया लेकिन मुश्किलें कम नहीं हुईं. इस पूरे वाकये को पढ़ते समय आपको ये नहीं भूलना है कि ये दौर भारत में अंग्रेजों के शासन का था. उस समय अंग्रेजों की दमनकारी नीतियां अपने चरम पर थीं और भारतीयों के लिए संसाधनों की भारी कमी थी.
खैर, फिल्म की स्क्रिप्ट तैयार हो गई और कास्टिंग के लिए अखबारों में विज्ञापन दे दिए गए. इसके बाद अभिनय के लिए पुरुष कलाकार तो मिल गए लेकिन फिल्म के लिए एक भी महिला तैयार नहीं हुई. कहा जाता है कि इसके लिए दादा साहेब फाल्के मुंबई के रेड लाइट एरिया में भी गए लेकिन कोई महिला फिल्म में काम करने को तैयार नहीं थी. बाद में एक तवायफ राजी तो हुई लेकिन ऐन मौके पर उसके मालिक ने धोखा दे दिया.
हताश और परेशान फाल्के एक ईरानी रेस्त्रां में चाय पीने पहुंचे तो उनकी नजर एक गोरे और दुबले-पतले रसोइये पर पड़ी. उसका नाम था अण्णा हरी सालुंके. दादा साहेब फाल्के ने उससे बात कर फिल्म में काम करने के लिए मना लिया. सालुंके की दाढ़ी-मूंछ कटवा दी गई और इस तरह भारतीय सिनेमा को उसकी पहली एक्ट्रेस मिली.
फिल्म के निर्माण में दादा साहेब फाल्के की पत्नी सरस्वती बाई का भी अतुलनीय योगदान रहा. जब पैसे कम पड़े तो उन्होंने अपने जेवरात बेच दिए. फिल्म की शूटिंग के दौरान सरस्वती बाई अकेले 500 लोगों का खाना बनाती थीं. इतना ही नहीं, कास्ट के कपड़े भी वो खुद धुलती थीं. कई बार तो सीन के वक्त वो सफेद शीट लेकर घंटों खड़े रहती थीं.
बहरहाल 15 हजार रुपये की लागत और 6 महीने 27 दिन के अथक प्रयास के बाद 'राजा हरिश्चंद्र' की शूटिंग पूरी हुई और 21 अप्रैल 1913 को बॉम्बे के ओलंपिया थियेटर में कुछ खास लोगों के लिए फिल्म की स्क्रीनिंग रखी गई. ये वो लोग थे जिन्हें फिल्मों की अच्छी समझ थी. इस स्क्रीनिंग में मिली प्रशंसा के बाद दादा साहेब ने फिल्म को आम लोगों के सामने लाने का फैसला किया.
3 मई 1913 वो ऐतिहासिक दिन था, जब बॉम्बे के कॉरोनेशन सिनेमाहॉल में भारत की पहली फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' रिलीज की गई. फिल्म सुपरहिट साबित हुई और इसके साथ ही ये तारीख और दादा साहेब फाल्के का नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया.
इतनी हिट हुई फिल्म कि बैलगाड़ी में भरकर ले जाने पड़े थे पैसे:
इसके बाद दादा साहेब फाल्के ने कुछ महीनों के अंतराल पर ही बैक टू बैक दो फिल्में बना डालीं. ये फिल्में थीं मोहिनी भस्मासुर और सत्यवान सावित्री. मोहिनी भस्मासुर के जरिए ही भारत को कमला गोखले के रूप में पहली महिला एक्ट्रेस मिली. राजा हरिश्चंद्र, मोहिनी भस्मासुर और सत्यवान सावित्री, फाल्के की ये तीनों फिल्में ब्लॉकबस्टर रहीं.
अब तक दादा साहेब फाल्के के सारे कर्जे उतर चुके थे. ऐसें में उन्होंने लंदन जाकर कुछ और जरूरी मशीनरी खरीदने का सोचा. इस दौरान लंदन में उनकी फिल्मों की स्क्रीनिंग भी हुई. फाल्के के काम से लोग इतना प्रभावित थे कि उन्हें इंग्लैंड में ही रहकर फिल्में बनाने के ऑफर मिलने लगे. यहां तक कि खाने-पीने, रहने और फिल्म की शूटिंग का सारा खर्च भी फाइनेंसर्स खुद उठाने को तैयार थे. लेकिन फाल्के को भारत में ही रहकर फिल्में बनानी थीं इसलिए उन्होंने ये सारे ऑफर ठुकरा दिए और वापस वतन लौट आए.
लेकिन मुश्किलें अभी खत्म नहीं हुई थीं. फर्स्ट वर्ल्ड वॉर शुरू हो चुका था और फाल्के के लिए तंगी का दौर भी. सारे फाइनेंसर्स ने अपने हाथ पीछे खींच लिए थे. कुछ कर्ज लेकर एक फिल्म की शूटिंग तो हुई लेकिन किन्हीं वजहों से उसे भी बीच में रोकना पड़ गया. थक-हारकर फाल्के ने कई जगहों पर जा-जाकर अपनी फिल्मों की स्क्रीनिंग की. मेहनत रंग लाई और उन्हें कुछ राजघरानों से धनराशि मिल गई.
इसके बाद फिल्म 'लंका दहन' की शूटिंग शुरू हुई और इसे 17 सितंबर 1917 को सिनेमाघर में रिलीज कर दिया गया. आपको वो अण्णा सालुंके नाम का रसोईगा याद होगा जिसने 'राजा हरिश्चंद्र' में महिला का किरदार निभाया था. उसी सालुंके ने 'लंका दहन' में राम और सीता दोनों का रोल निभाया और इतिहास के पन्नों में अपना नाम भारतीय सिनेमा में डबल रोल करने वाल पहले व्यक्ति के रूप में दर्ज कर लिया.
'लंका दहन' इतनी हिट हुई कि शो की स्क्रीनिंग सुबह 7 बजे (7 AM) से अगले दिन के सुबह 3 बजे (3 AM) तक करनी पड़ी. कहते हैं कि इस दौरान टिकट काउंटर से बैलगाड़ियों में भर-भरकर सिक्के ले जाने पड़े थे. इस सफलता ने न सिर्फ फाल्के के सारे कर्जे उतार दिए बल्कि उन्हें एक दूर-दूर तक विख्यात कर दिया.
फिल्म जगत से दादा साहेब फाल्के का संन्यास:
दादा साहेब फाल्के की फिल्में पौराणिक घटनाओं पर आधारित होती थीं. इन फिल्मों में संवाद भले नहीं होते थे लेकिन धर्म में आस्था रखने वाले भारतीय समाज को ये फिल्में काफी सुखद अनुभव देती थीं. मगर समस्या ये थी कि जब फाल्के ऐसी साइलेंट फिल्में बना रहे थे तब टेक्नोलॉजी तेजी से बदल रही थी. साल 1931 में भारत की पहली बोलती फिल्म 'आलम आरा' रिलीज हुई.
'राजा हरिश्चंद्र' के बाद से शुरू अपने 19 साल के सफर में दादा साहेब फाल्के ने 95 फिल्में और 26 से ज्यादा शॉर्ट फिल्में बनाई. उनकी आखिरी फिल्म गंगावतरण थी. समय के साथ फाल्के समझ गए थे कि फिल्म मेकिंग का उनका स्टाइल अब अप्रचलित हो गया है. लिहाजा उन्होंने फिल्म जगत से संन्यास ले लिया. 16 फरवरी 1950 को नासिक में उन्होंने अंतिम सांस ली.
फिल्मों में योगदान देने वालों के लिए दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड की शुरूआत:
दादा साहेब फाल्के ने भले ही बाद में फिल्म मेकिंग को अलविदा कह दिया हो, लेकिन फिल्म जगत में उनका योगदान अतुलनीय रहा. इसीलिए साल 1969 में उनकी जन्म शताब्दी के अवसर पर भारत सरकार ने फिल्मों में उत्कृष्ठ कार्य करने वालों के लिए दादा साहेब फाल्के पुरस्कार (Dadasaheb Phalke Award) की घोषणा की.
ये भारतीय सिनेमा का सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार है. पुरस्कार पाने वाले को 10 लाख रुपये, शॉल और स्वर्ण कमल (Golden Lotus) दिया जाता है. 1969 में सबसे पहले ये पुरस्कार अभिनेत्री देविका रानी को दिया गया था. अब तक कुल 52 लोगों को इस पुरस्कार से नवाजा जा चुका है. सबसे हाल में साल 2020 में अभिनेत्री आशा पारेख को ये पुरस्कार मिला.