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'जवान' में शाहरुख खान के दोनों किरदारों में से एक, विक्रम राठौर पर्दे पर गुंडों की ताबड़तोड़ कुटाई कर रहा है. सुपर स्टाइलिश बैकग्राउंड स्कोर के साथ, बड़े पर्दे पर अपने सबसे एक्शनबाज अवतार में नजर आ रहे शाहरुख का यहां पर कुछ सेकंड का एक सीन है. विक्रम राठौर ने इस सीक्वेंस में जब एंट्री मारी थी तभी से उसके मुंह में एक सिगार था. फाइट करते-करते एक मोमेंट में विक्रम, उस सुलगते हुए सिगार को मुंह में पूरा निगल जाता है.
गुंडे की हड्डियों का चूरा बनाने के बाद, विक्रम उस निगले हुए सिगार को वापस उगलता है और अपने होंठों से धुंए का एक कश छोड़ता है. हवा में घुलते धुंए के बीच आंखों में अंगारे लिए खड़े उस हीरो को देखकर जनता के शोर और तालियों की ऐसी गड़गड़ाहट होती है मानो थिएटर फट जाएगा. ये शाहरुख खान का मास अवतार है!
शाहरुख, स्मोकिंग और सिनेमा!
सिनेमा के शब्दकोष में फुटफॉल वो आंकड़ा है जो बताता है कि कितने लोगों ने फिल्म का टिकट खरीदा है. इस आंकड़े की मानें तो अबतक 3 करोड़ लोग 'जवान' देख चुके हैं. सबने दो-दो बार भी टिकट खरीद कर देखी हो तो भी कम से कम देश करोड़ लोग शाहरुख का मास अवतार देख चुके हैं. और इन सभी की याददाश्त में शाहरुख का सिगार निगलकर उगलने वाला ये स्वैग दर्ज हो चुका है. लेकिन शाहरुख का ये सीन देखकर शाहरुख की ही कही एक बात याद आती है.
2002 में शाहरुख खान ने एक इंटरव्यू में कहा था कि उन्हें नहीं लगता स्मोकिंग किसी भी किरदार का अटूट हिस्सा होनी चाहिए. शाहरुख का कहना था, 'ये एकदम रुटीन टाइप होना चाहिए, जैसे सेट पर कहीं एक चेयर पड़ी होती है या बेड पर बेडशीट. पूरी फिल्म इसके आसपास डिजाइन नहीं होनी चाहिए.' हालांकि शाहरुख ने ये भी कहा था कि बिना स्मोकिंग के कुछ किरदारों के इमोशन दर्शाने में दिक्कत भी होगी.
उदाहरण देते हुए शाहरुख ने कहा, 'अगर आप विंस्टन चर्चिल को दर्शा रहे हैं, तो उन्हें उनके ट्रेडमार्क सिगार के बिना कैसे दर्शा सकते हैं? अंडरवर्ल्ड के किरदारों को बिना सिगरेट के दिखाना मुश्किल होगा. वरना तो बड़े पर्दे पर स्मोकिंग करने की ऐसी कौन सी जरूरत है?' जिन्होंने 'जवान' देखी है, वो जानते हैं कि इसमें शाहरुख न तो विंस्टन चर्चिल थे, न ही गैंगस्टर! बल्कि उनका ये किरदार, विक्रम राठौर अपनी जवानी के दिनों में भी कैजुअल स्मोकिंग नहीं कर रहा था. लेकिन फिर भी उम्र ढलने के बाद उसका सिगार, उसके स्वैग को चमकाने वाली एक डिवाइस बन गया. इस मोमेंट में स्मोकिंग, शाहरुख के किरदार का ग्लैमर बन गई.
हीरोज के हाथों में सुलगता रहा है सुट्टा!
हीरो की उंगलियों के बीच दबी सिगरेट का दर्शनशास्त्र तो बाकायदा एक आइकॉनिक गाने में लिखा गया है- 'मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया, हर फ़िक्र को धुंए में उड़ाता चला गया.' देव आनंद पर फिल्माया गया ये गाना 1961 में आई फिल्म 'हम दोनों' से है. यानी बड़ी स्क्रीन पर हीरो के होठों से उठता धुंए का बादल नई चीज नहीं है.
खुद देव आनंद ही अपनी कई फिल्मों में कैजुअली सिगरेट के साथ नजर आ जाते थे. पर्दे पर उनका कैजुअल सुट्टा मारना, 1954 में आई फिल्म 'टैक्सी ड्राईवर' में भी था. 50 और 60 के दशक में गुरुदत्त कई फिल्मों में धुम्रपान करते दिखते हैं. एक दशक और पीछे जाएं तो 'किस्मत' (1943) में अशोक कुमार ने ऐसे हीरो का किरदार निभाया था जिसके किरदार में ग्रे शेड्स थे. ये हीरो, शेखर बड़े स्वैग में स्मोकिंग करता था. उस दौर में सिगरेट, पश्चिम के कल्चर से मर्दों को मिली एक एलीट 'अदा' के तौर पर ट्रीट हो रही थी.
बाद के सालों में धुंआ उड़ाना कामगारों और लोअर मिडल क्लास से आने वाले 'एंग्री यंगमैन' हीरो के साथ भी जुड़ गया. आपको 'दीवार' (1975) में मजदूरी करते अमिताभ बच्चन, मुंह में बीड़ी दबाए दिख जाएंगे. जब वो 'साहब' बन जाते हैं तो बीड़ी की जगह सिगरेट आ जाती है. इधर 70-80 के दशक में अमिताभ बच्चन कई फिल्मों में सिगरेट फूंकते दिख रहे थे, तो उधर साउथ में एक ऐसा सुपरस्टार आया जिसके पास बीड़ी-सिगरेट पीने के इतने अलग-अलग स्टाइल थे कि लोग मुंह बाए देखते रह जाते- रजनीकांत.
बीड़ी-सिगरेट-सिगार को एक्शन के साथ जितनी तरह से रजनीकांत ने दिखाया है, उसे इकठ्ठा कर दें तो एक अलग एक्शन फिल्म बन जाएगी. 90s में 'बाजीगर' के शाहरुख, 'खलनायक' के संजय दत्त जैसे कई किरदारों के साथ सिगरेट स्क्रीन पर चमकती रही.
हीरोज के साथ बड़े पर्दे पर उनकी पावरफुल पोजीशन, गुस्से, स्वैग, अकेलेपन और टशन को बढ़ाकर दिखाने वाली पार्टनर बनकर आती रही स्मोकिंग का एक और असर भी है. लंबे समय तक महिलाओं को बड़े पर्दे पर किसी भी नशे के साथ दिखाना एक टैबू माना जाता रहा. लेकिन धीरे-धीरे फिल्मों में लीड महिला किरदारों को 'पावरफुल' और 'खुद को सबसे ऊपर रखने वाला' दिखाने के लिए भी, उन्हें स्मोकिंग करते दिखाना नॉर्मल हो गया. पिछले दो दशक में करीना कपूर, प्रियंका चोपड़ा, विद्या बालन, कंगना रनौत, दीपिका पादुकोण जैसी लीडिंग एक्ट्रेसज भी फिल्मों में स्मोकिंग करती नजर आ चुकी हैं. और अगर सवाल फीमेल कैरेक्टर्स में स्मोकिंग को ग्लोरिफाई करने का है तो 'धुनकी' गाने में बीड़ी पीती कटरीना कैफ को ही याद कर लीजिए!
बड़े पर्दे पर धुंआ उड़ाने पर बवाल
ये पहली बार नहीं है जब शाहरुख पर्दे पर धूम्रपान करते दिखे हों. बाजीगर, डर, देवदास, स्वदेस जैसी फिल्मों में भी उनके हाथ में सिगरेट थी. 'डॉन' में तो सिगरेट का फ़िल्टर फेंकने का उनका एक स्वैग भरा स्टाइल था. मगर वो बात 2006 की है. ये वही साल है जब 'ओमकारा' का 'बीड़ी जलईले' शोर मचा रहा था. लेकिन उसी दौर में बड़े पर्दे पर स्मोकिंग को लेकर तगड़ी डिबेट भी शुरू हुई. और इसकी शुरुआत हुई 2003 में आई WHO (वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाईजेशन) की एक रिपोर्ट से. इस रिपोर्ट ने ये बात हाईलाइट की कि भारतीय फिल्मों में तम्बाकू उत्पादों का सेवन अत्यधिक दिखाया जाता है और इसमें सबसे ज्यादा हिस्सा धूम्रपान का है.
1991 से 2002 तक, 500 से ज्यादा फिल्मों की रिसर्च के बाद बनाई गई इस रिपोर्ट में दो बहुत चिंताजनक बातें थीं. फिल्मों में, टेंशन वाली सिचुएशन में सिगरेट जला लेने वाले सीन्स 1991 में 9% थे जो 2001 तक बढ़कर 29% हो गए. और 1991 तक फिल्मों में सिगरेट जलाने वाले पॉजिटिव किरदार या अच्छे लोग 22% थे, जो 2002 तक बढ़कर 53% हो गए. रिपोर्ट के ये नतीजे इसलिए चौंकाने वाले थे क्योंकि फिल्में अब स्मोकिंग को एक नॉर्मल एक्टिविटी की तरह दिखाने लगी थीं. इस रिपोर्ट की शोध में ये भी पाया गया कि जो फिल्में देखी गईं, उनमें स्मोकिंग के सबसे ज्यादा इंसिडेंट शाहरुख खान के थे. उनके बाद रजनीकांत, गुलशन ग्रोवर, अजय देवगन और चिरंजीवी फिल्मों में सबसे ज्यादा सिगरेट पीते देखे गए थे.
जब ऑनस्क्रीन स्मोकिंग पर लगा बैन
इस रिपोर्ट और इससे शुरू हुई बहस का नतीजा यूं निकला कि 2005 में भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने फिल्मों में धूम्रपान के सीन्स पर बैन लगा दिया. जैसी उम्मीद थी, भारत की सभी फिल्म इंडस्ट्रीज से फिल्ममेकर्स और कलाकारों ने इस बैन का खूब विरोध किया. इस बैन के खिलाफ फिल्ममेकर महेश भट्ट कोर्ट भी गए. 2009 में दिल्ली हाई कोर्ट ने, सरकार के बैन लगाने के फैसले को पलट दिया. जस्टिस संजय किशन कौल ने कहा कि फिल्मों और टीवी पर स्मोकिंग को बैन करना गैर जरूरी है और ये फिल्ममेकर्स की आजादी पर अंकुश लगाता है. इस बीच 2008 में सरकार ने सार्वजनिक जगहों पर धूम्रपान करने पर बैन लगा दिया.
स्वास्थ्य मंत्री अंबुमणि रामदास ने एक इंटरव्यू में शाहरुख खान, अमिताभ बच्चन और अन्य एक्टर्स से अपील की कि वो फिल्मों में स्मोकिंग न करें. रामदास ने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा कि सरकार के पास डाटा है, जो कहता है कि '52% बच्चे किसी फिल्म सेलेब्रिटी की वजह से पहली बार सिगरेट जलाते हैं.' स्वास्थ्य पर काम करने वाले दो NGO की, 2010 में आई रिसर्च भी यही कहती है.
2005 में, फिल्मों में धूम्रपान पर छिड़ी बहस से ही वो एंटी-स्मोकिंग मैसेज और वार्निंग देने की शुरुआत हुई, जो आज आपको फिल्में शुरू होने पर और फिल्म में स्मोकिंग के सीन्स आने पर दिखते हैं. इन वार्निंग का भी फिल्म इंडस्ट्री की तरफ से विरोध होता रहा है. डायरेक्टर अनुराग कश्यप की फिल्म 'अग्ली' में कई किरदार कई जगह स्मोकिंग कर रहे थे. सेंसरबोर्ड ने कहा कि उन्हें फिल्म के हर ऐसे सीन पर 'धूम्रपान सेहत के लिए हानिकारक है' वार्निंग लगानी होगी.
अनुराग ने ऐसा करने से ये कहते हुए इनकार किया कि इससे फिल्म की एस्थेटिक्स खराब होती है और आखिर उन्होंने इसके खिलाफ बॉम्बे हाई कोर्ट में पिटीशन भी दी. ऐसे विरोध के पीछे तर्क ये है कि अगर फिल्म का किरदार चेन स्मोकर है, तो ऐसी वार्निंग तो आधी फिल्म में सीन्स पर चीपकी नजर आएगी, जो वाकई एस्थेटिक खराब करेगी. एक तरफ ऑनस्क्रीन स्मोकिंग के नुकसान बताने वाले NGO, स्वास्थ्य संगठन और स्वास्थ्य विभाग के तर्क हैं. दूसरी तरफ फिल्ममेकर्स की क्रिएटिव आजादी है. सभी अपनी जगह तर्कसंगत लगते हैं, तो सवाल ये है कि सही-गलत कैसे तय किया जाए?
इसका जवाब भी शाहरुख़ के ही एक बयान में है. शाहरुख ने 2008 में स्वास्थ्य मंत्री अंबुमणि रामदास के बयान पर रिएक्ट करते हुए कहा था- 'किसी भी चीज पर पूरी तरह बैन नहीं लगाया जा सकता. लेकिन हां आप फिल्मों में क्या दिखाते हैं, इसे लेकर आपको जिम्मेदार होना पड़ेगा.' यानी ये तय करना होगा कि आप जब हीरो को धूम्रपान करते दिखाने वाले हैं, तो क्या वो हीरो की कहानी और उसके बैकग्राउंड की सेटिंग की वजह से है? या हीरो के हाथ में सिगरेट को, एक्सेसरीज की तरह, हीरो का स्वैग और स्टाइल बढ़ाने के लिए यूज किया जा रहा है? क्योंकि हर व्यक्ति अपनी लाइफ का 'हीरो' बनना चाहता है और इसीलिए पर्दे के हीरो के तौर-तरीकों की नक़ल लोग रियल लाइफ में खूब करते हैं. ऊपर से टीनेज वो दौर है जब लाइफ में हीरोइज्म की आवश्यकता बहुत ज्यादा होती है.
'धुंआ'धार हीरो की वापसी
2003 से छिड़ी सारी बहस का ही ये असर हुआ कि 2010 के बाद वाले सालों में, फिल्मों में स्मोकिंग को ग्लोरिफाई करने वाले सीन्स कुछ कम हुए. लेकिन बड़े पर्दे पर अल्ट्रा प्रो मर्दानगी वाले एक्शन हीरोज की वापसी के साथ, ये ट्रेंड फिर से वापस आने लगा है. 2018 में पैन इंडिया फिल्म 'KGF'में यश अपने हाथ में सिगरेट लिए, रीना, उसके बॉयफ्रेंड कमल और पूरी गैंग को अपना रौब दिखा रहे हैं. '
कबीर सिंह' (2019) में शाहिद कपूर एक जगह पूरे स्वैग में, साथ दो सिगरेट पीते हुए दिख रहे थे. फिल्म के पोस्टर्स में ही शाहिद का ये किरदार धुंए में डूबा दिखने लगा था. KGF 2 में तो यश के 'रॉकी भाई' ने बन्दूक की तपती नली से सिगरेट जलाकर, सुट्टे का स्वैग ही अलग लेवल पर पहुंचा दिया. अजय देवगन 'रनवे 34' में हाथ में सिगरेट लिए घूमते रहते हैं और जब कोई उन्हें याद दिलाता है कि यहां स्मोकिंग मना है, तो कहते हैं- जलाया तो नहीं न! ये लाइन ट्रेडमार्क अजय देवगन स्वैग में डिलीवर होती है, तो देखकर मजा ही आ जाता है.
अपनी लेटेस्ट पैन इंडिया रिलीज 'जेलर' में, स्मोकिंग को एक्शन ट्रिक्स में बदलने वाले रजनीकांत ने फिर से अपनी ट्रेडमार्क कलाकारियां की हैं. लेकिन 'जवान' में शाहरुख़ का बाइक स्टंट करके उड़ी चिंगारियों से सिगार जलाना और उस सिगार से बाइक की टंकी में आग लगाकर दुश्मनों को उड़ा देना तो मतलब सुट्टे के स्वैग की इन्तेहा था. 'कबीर सिंह' के डायरेक्टर संदीप रेड्डी वांगा, अपनी अगली फिल्म 'एनिमल' में रणबीर कपूर को मास अवतार में लेकर आ रहे हैं.
फिल्म से रणबीर के जो दो पोस्टर आए हैं, दोनों में उनके होठों में सिगरेट दबी है. थलपति विजय की फिल्म 'लियो' से संजय दत्त का लुक आया तो 'बाबा' सुट्टे का स्वैग बढ़ाते दिखे. इन सभी फिल्मों में हीरो के स्मोकिंग करने में जो 'वाओ' फैक्टर है यही तो समस्या है!
ये साफ़ है कि मास-एक्शन अवतार में लौटते हीरोज के साथ, स्मोकिंग को शान से दिखाने वाला ट्रेंड लौट रहा है. ये वक्त है कि फिल्ममेकर्स, यूथ को बर्बाद करने वाले इस ट्रेंड पर ध्यान दें. क्योंकि कुछ बर्बादियों पर शोक मनाना ही सही है. उन बर्बादियों का जश्न बड़े पर्दे पर भले स्वैग भरा लगता हो, लेकिन रियल लाइफ में इससे कई जिंदगियों की पिक्चर खराब हो जाती है!