जाह्नवी कपूर स्टारर फिल्म गुंजन सक्सेना पिछले काफी वक्त से विवादों में है. फिल्म क्योंकि एक बायोपिक बताई जा रही है इसलिए इसमें तथ्यों के साथ की गई छेड़छाड़ को लेकर विरोध के स्वर ऊंचे किए जा रहे हैं. हिंदी सिनेमा में बायोपिक काफी वक्त से बनती आ रही हैं. जब भी कोई बायोपिक आती है तब कोई न कोई विवाद होता ही है.
संजय दत्त की बायोपिक संजू हो या मिल्खा सिंह की भाग मिल्खा भाग, महेंद्र सिंह धोनी की एमएस धोनी द अनटोल्ड स्टोरी हो या गुंजन सक्सेना, विवाद तो तकरीबन हर बार हुआ है. कई बार कम कई बार ज्यादा. लेकिन बायोपिक फिल्मों में ऐसा क्या है कि मेकर्स का रुझान इनकी तरफ बना रहता है? आज हम आपको यही बताने जा रहे हैं.
1. बायोपिक बनाने का एक बड़ा फायदा जो मेकर्स को मिलता है वो ये है कि किसी मशहूर शख्सियत की बायोपिक बनाने पर मार्केटिंग और बज क्रिएट करने में ज्यादा मेहनत नहीं लगती है. क्योंकि जिस पर फिल्म बन रही है वो पहले से ही एक जाना पहचाना चेहरा है इसलिए दर्शक कनेक्ट कर जाते हैं और फिल्म के प्रति अटेंशन बना रहता है.
2. मेकर्स के लिए एक अच्छी स्क्रिप्ट ढूंढना बहुत बड़ी चुनौती होती है. लेकिन जब बायोपिक बनानी हो तो खास मेहनत नहीं करनी पड़ती. जिस पर बायोपिक बन रही है उसके बारे में पहले से ही बहुत कुछ लिखा पढ़ा जा चुका होता है. यदि वो व्यक्ति जीवित है तो वो खुद मौजूद होता है अपने बारे में खुलकर बताने के लिए.
3. यूं तो किसी फिल्म फिल्म के लिए स्पॉन्सर्स ढूंढना एक चुनौती भरा काम नहीं होता है. लेकिन बायोपिक के केस में चीजें और आसान हो जाती हैं. अच्छे और महंगे स्पॉन्सर मिल जाते हैं जिससे फि्सलम बनाने वालों का भी फायदा होता है और स्पॉन्सर्स को भी विज्ञापन का मौका मिल जाता है.
4. बायोपिक बनाने की एक और बड़ी वजह ये है कि इसमें लॉस की संभावना काफी कम होती है. क्योंकि मेकर्स जिस शख्स पर बायोपिक बना रहे होते हैं उसके चाहने वालों की तादात पहने से इतनी होती है कि फिल्म के पर्याप्त टिकट बिक जाते हैं.
5. फिल्म को हमेशा के लिए यूनिक और इतिहास का हिस्सा बना देना भी एक बड़ी उपलब्धि होती है. मेकर्स जब किसी पर बायोपिक बनाते हैं तो उसका ये भी बड़ा फायदा होता है कि फिल्म हमेशा के लिए इतिहास हो जाती है. उदाहरण के लिए धोनी के फैन्स हमेशा धोनी की फिल्म देखते रहेंगे. भविष्य में जब भी कोई धोनी के बारे में जानना चाहेगा तो वह उनकी फिल्म देखेगा.