एक आम युवा की तरह इंजीनियर बनने का सपना था. इंजीनियरिंग में हुआ. पर मनचाहा ‘कंप्यूटर’ का ब्रांच नहीं मिला. तो मन बहुत ही व्याकुल हुआ. तब बड़े भाई शहान अयूब ने उसका हौसला अफजाई करते हुए समझाया कि फिर तैयारी करो, हो जाएगा.
वो युवा मजबूरी बस दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कॉलेज में बीएससी में दाखिला लिया. वहां क्लास सुबह 9 बजे 1 दोपहर बजे तक चलता. लेकिन उसे घर जल्दी जाना बुरा लगता था.
एक दिन कॉलेज के नोटिस बोर्ड पर थियेटर ऑडिशन का सूचना पत्र लगा देखा. यूं ही इसके बारे में जानकारी लेने गया तो पता चला उसकी तारीख 3 जून थी, जो बीत गई. फिर जुलाई से वर्कशॉप शुरू होने वाली है. उसे समझ में नहीं आ रहा था कि ये ‘थियेटर और वर्कशॉप’ क्या होता है?
पिता ने कही थी ये बात
इसी उधेड़बुन फंसा रहा, घर जाकर अपने वालिद से पूछा तो बताए- “बेटा थियेटर एक बेहतर इंसान बनाएगा, ज्वॉइन कर लो.” फिर क्या अगले दिन ही ज्वॉइन कर लिया जो 15 दिन तक चला. यहीं से उसके जीवन की दिशा बदल गयी! ‘वो महसूस किया कि अभी तक ऐसा कुछ किया ही नहीं, अब जरूर करना चाहिए.’
वो युवा कोई और नहीं चर्चित वेब सीरीज ‘तांडव’ में छात्रनेता ‘शिवा शेखर’ का किरदार निभाने वाले एक्टर मोहम्मद जीशान अयूब हैं.
आसान नहीं था जीशान का सफर
दिल्ली से मुबंई तक का जीशान का सफर आसान नहीं था. जीशान का जन्म 1984 में दिल्ली के ओखला में हुआ. वालिद मोहम्मद अयूब सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल में शिक्षक थे. और शौकिया तौर पर थियेटर से भी जुड़े थे. जीशान की शुरुआती शिक्षा स्थानीय और केन्द्रीय विद्यालय में हुई. वे बचपन से ही पढ़ने में बहुत कुशाग्र और मेधावी थे. जिससे हमेशा आल राउंड फर्स्ट क्लास आते रहे.
कॉलेज में फ्रेशर्स टैलेंट शो के दौरान एक नाटक में जीशान को छोटा-सा रोल मिला. जिसमे दो षब्द बोलना था. पहली बार मंच पर चढ़ें. इतनी अच्छी एक्टिंग किये कि खूब तालियाँ बजी और वाहवाही मिली. फिर तो थियेटर की तरफ खींचते ही चले गए.
जीशान पर थियेटर का ऐसा जुनून सवार हुआ कि पढ़ाई पीछे छूट गई. कॉलेज पहुंचने पर सीधे रिहर्सल में ही पहुंचते. किसी का भी रिर्हसल हो या रीडिंग हो चुपचाप देखते रहते और समझनें की कोशिश करते. एक साल वहां ऐसे ही बिता दिये. जिसका फायदा भी हुआ.
क्योंकि वहां साहित्यिक, सामाजिक, रंगकर्म, राजनीतिक आदि की बातें व बहसें चलती रहती थी. जिससे जीशान बहुत प्रभावित हुए. उनका मानना है कि ‘यहीं से उनकी सोच बदल गई’. बताते है कि- जैसें मैं ‘कम्युनिस्ट को गाली देता था कि देश को बर्बाद कर रहे हैं!’ नहीं, कम्युनिस्ट के बारे में सच पता चला कि ‘एक बहुत अच्छी विचारधारा है जो भाईचारा और बराबरी की बात कहती है.’
जीशान कॉलेज के सालाना समारोह में नाटक ‘धप्पा’ में मुख्य किरदार निभाये. जिसके लिए बेस्ट एक्टर का पुरस्कार मिला. फिर कॉलेज के ड्रामाटिक सोसायटी में शामिल हो गए.
इसके बाद तो मानो जीशान को पंख लग गए. खुद पर एतबार हुआ हौसला भी बढ़ा आंस जगी और कुछ अच्छा करने की उम्मीद दिखी. नाटक के अलावा नुक्कड़ नाटक भी किये.
वही दूसरी तरफ पहले फर्स्ट क्लास पास होते थे. अब सेकेंड डिवीजन पर आ गए. सबसे मजेदार है कि “इन्हें किताब के बारे में परीक्षा से एक दिन पहले रात में पता चलता. वे गणित को भी नावेल की तरह पढ़ते और अगले दिन परीक्षा दे देते.”
जब थिएटर में रम गए थे जीशान अयूब
जीशान दिलो जान से थियेटर में रम गए. जिसका परिणाम काबिले तारीफ रहा. उन्हें दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेज स्तरीय कम्पटीशन में बेस्ट एक्टर, डायरेक्टर, स्क्रिप्ट अडाप्टेशन के कई अवार्ड मिलें. इस तरह के कुल 17 अवॉर्ड मिलें. इतना पुस्कार डीयू में किसी को नहीं मिला है. ये रिकार्ड अब तक जीशान के नाम है.
जीशान बीएससी करने के बाद राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) का परीक्षा दिये. लेकिन पास नहीं हुए. वजह दिमाग सात वे आसमान पर चला गया कि वे थियेटर के बारे में सब कुछ जानते हैं, एडमीशन न होने से एनएसडी का नुकान होगा.
फिर क्या 2003 में मुंबई आ गए. उन्हें लगता था कि लोंग खुद बुलाकर काम देगें. ऑडिशन भी नहीं देने जाते थे. एक दिन टीवी पर ‘अक्स’ फिल्म आ रही थी. जिसमे मनोज वाजपेयी की दमदार एक्टिंग देखकर भावविभोर हो गए.
तब समझ में आया कि एक्टिंग के तौर पर पूर्ण नहीं हैं. और डेढ़ महीने बाद बैरंग दिल्ली लौट गए. बहुत निराश हुए.
जीशान कहते हैं कि ‘उस उक्त उम्र कम थी तकरीबन कोई 20 साल रही होगी, जिससे गलतफहमी आ गयी.’
उन्हें बहुत निराशा हुई लगा कि अब एक्टिंग में भविष्य नहीं है. उस वक्त दोस्तों ने बहुत साथ दिया. जबरदस्ती दोस्तों ने ही पुनः एनएसडी का फार्म भरवाया. वे धीरज व शान्त मन से परीक्षा दिये और पास हो गए.
2004 एनएनएसडी में दाखिला मिल गया. शुरू के छह महीने बहुत परेशान रहे. क्योंकि वॉयस, म्यूजिक आदि में कमजोर थे. फिर समझ में आया कि “हारने के लिए कुछ नहीं है और इससे नीचे नहीं जा सकते हैं. फिर खुद ब खुद सीखना शुरू किये. तो कला से बेहतर इंसान एवं कालाकार बनने का फलसफा समझ में आ गया.”
जीशान यहां भी अपना परचम बुलन्द किये और तीसरे साल में बेस्ट स्टूडेंट बन गए. वे कहते हैं- ‘कि कला से मोहब्बत करने पर लोग जरूर सम्मान देगें’.
विदेश छोड़ आए जीशान
एनएसडी से पास आउट होने के बाद दुबई चले गए. वहां एक एक्टिंग स्कूल शुरू होने वाला था. जिसमे नौकरी लग गई. एक नाटक का रिहर्सल शुरू कर दिये जो कामर्शियल था. लेकिन वहां के ढ़ेर सारे नियम कानून और बंधन पसंद नहीं आये. लगा कि अपनी आज़ादी छिन गई है. ढ़ाई माह बाद अपनी सरज़मीं पर वापस आ गए.
जीशान तल्ख़ी के साथ बोलते हैं कि ‘जो हमें बात-बात पर देश छोड़ने की नसीहत देते हैं उन्हें मालूम होना चाहिए, कि हमें देश प्यारा है, यहां की मिट्टी प्यारी है तभी तो विदेश छोड़ कर आये.”
फिर दिल्ली में दो साल थियेटर किये. यहीं एक टीवी सीरियल में भी काम किये. जिसका नाम ‘क्योंकि जीना इसी का नाम है’ था. जीशान इसमे लीड रोल निभाये. ये यूनिसेफ का था और दूरदर्शन पर प्रसारित हुआ. न्यूयार्क का लिस्ट्रास वर्ग स्कूल दिल्ली में अपनी शाखा खोल रहा था. उसमे जीशान की नौकरी लग गई. लेकिन ट्रेनिंग के लिए 3 माह न्यूयार्क जाना था. उसके पहले अपनी पत्नी रसिका अगाशे को मुंबई में सेटल करने के लिए चले गए. इसलिए कि वे मराठी हैं और बंबई रहना चाहती थी.
तभी एक रोज फिल्म ‘नो वन किल्ड जेसिका’ में ऑडिशन के लिए फोन आया. ऑडिशन दिये और काम मिल गया. फिर फिल्म ‘मेरे ब्रदर की दुल्हन’ मिली. और इस तरह न्यूयार्क जाना कैंसिल हो गया. फिर तो फिल्मों के ही होकर रह गए.
देश की राजधानी दिल्ली के औसतन पिछड़े इलाके का रहने वाला ये लड़का मशहूर हो गया. लोग इसका आटोग्राफ और साथ में सेल्फी लेने में इज्ज़त समझने लगे.
23 फिल्में कर चुके हैं जीशान अयूब
अब तक जीशान ने 23 फिल्में की हैं. लेकिन पहचान बनीं फिल्म ‘तनु वेड्स मनु’ के किरदार चिंटू से, ये रोल बहुत पसन्द किया गया. रांझणा फिल्म में ठेठ बनारसी मुरारी उर्फ पंडित का किरदार भी दर्शकों के दिल में बस गया. जीशान का ओटीटी प्लेटफार्म हाटस्टार पर वेब सीरीज ‘गिल्ट’ जल्दी ही आने वाला है. जीशान एक्टिंग के साथ साथ शाहीन बाग धरने से लेकर किसान आंदोलन का बड़े बेबाकी के साथ सर्मथन किये. जिसकी आलोचना भी हुई पर वे डिगे नहीं.
जीशान अफसोस के साथ बताते हैं कि “बीतें कुछ साल बहुत व्यस्त रहा. जिसके वजह से अपनी मासूम बेटी को वक्त नहीं दे पाया.” अब जीशान सुकून के साथ में रहना और जीना चाहते हैं, इसलिए कई फिल्मों को छोड़ दिये. अपनी माँ, पत्नी और बेटी के साथ कुछ खुशी का पल गुजारना चाहते हैं. वे बड़े ही बेबाकी से कहते हैं कि ‘इंडस्ट्री के भेड़ चाल का हिस्सा नहीं बनना चाहता, वर्ना नौकरी ही क्या बुरी थी!’
जीशान को थियेटर की पहली सीख देने वाले उनके वालिद मोहम्मद अयूब अब इस दुनिया में नहीं है. लेकिन उनके कामयाबी से वालिद की रूह को जरूर सुकून मिला होगा.
इनपुट - प्रवीण कुमार सिंह