
शाहिद कपूर की वेब सीरीज 'फर्जी' हाल ही में रिलीज हुई. 'द फैमिली मैन' जैसी बेहद पॉपुलर सीरीज बनाने वाले राज एंड डीके ने ये सीरीज डायरेक्ट की है. 'फर्जी' का ट्रेलर देखकर बहुत लोगों को मनोज बाजपेयी स्टारर 'द फैमिली मैन' जैसा फील आया. शायद यही वजह रही कि शाहिद के साथ विजय सेतुपति और केके मेनन जैसे दमदार कलाकार होने के बावजूद 'फर्जी' को लेकर उतना तगड़ा माहौल नहीं बना. लेकिन शो आने के बाद इसकी खूब चर्चा हो रही है.
'फर्जी' एक आर्टिस्ट की कहानी है जो नकली नोट बनाने शुरू कर देता है. इस आर्टिस्ट का किरदार शो में शाहिद निभा रहे हैं. शो की दिलचस्प कहानी और सॉलिड स्टारकास्ट की तो लोग चर्चा कर ही रहे हैं, साथ ही शाहिद की परफॉरमेंस को भी काफी तारीफें मिल रही हैं. नकली नोट बनाने वाले आर्टिस्ट के रोल में लोगों को शाहिद कमाल लग रहे हैं.
शाहिद के काम की वैरायटी देखें तो उन्होंने अपने 20 साल लंबे करियर में अलग-अलग तरह के तमाम किरदार निभाए हैं. मगर जब भी उनके किरदारों में कोई डार्क शेड या नॉर्मल की परिभाषा से अलग ट्विस्ट होता है, तो स्क्रीन पर उन्हें देखने वाले हैरान रह जाते हैं. एक एक्टर का काम ही ईमानदारी से अपने किरदार निभाना होता है. लेकिन शाहिद को मोरल स्केल से हटकर बुने किरदारों में देखकर होने वाला सरप्राइज शायद एक परसेप्शन का खेल है.
चॉकलेटी चेहरा और लवर बॉय
एक एक्टर को किसी भी एक 'टाइप' में बांधना वैसे तो उसके हुनर के साथ नाइंसाफी है. लेकिन सिनेमा तस्वीरों से कहानियां गढ़ने का एक खेल है, और ऑडियंस को इसे खेलते हुए जीतने का स्वाद आना चाहिए. कहानियों के इस खेल को खेलने में परसेप्शन का बहुत बड़ा रोल होता है. ये परसेप्शन अक्सर कलाकारों के साथ चिपक जाता है.
शाहिद कपूर के करियर की शुरुआत में देखें तो अपनी पहली फिल्म 'इश्क विश्क' (2003) में वो एक लव स्टोरी के हीरो बने दिखे. उनके पास वो सबकुछ था जो उस दौर के रोमांटिक हीरोज में जनता देखती थी. लव स्टोरीज में हीरो बनने के लिए एक 'चॉकलेटी चेहरा' चाहिए होता था. 22 साल के उम्र में डेब्यू कर रहे शाहिद हर तरह से इस कसौटी पर एकदम सेट थे.
फिल्म चल निकली और ऑडियंस, खासकर लड़कियों में शाहिद का क्रेज बन गया. उनका ये रोमांटिक अवतार 'फिदा' 'दिल मांगे मोर' 'दीवाने हुए पागल' जैसी फिल्मों में आगे भी जारी रहा. ये फिल्में बॉक्स ऑफिस पर नहीं चल रही थीं, लेकिन शाहिद को लोग लगभग एक ही जोन के स्वीट, रोमांटिक, 'चॉकलेटी फेस' की तरह देख रहे थे.
ऐसा नहीं है कि शाहिद इन फिल्मों में एक्टिंग नहीं कर रहे थे. उनकी ऑनस्क्रीन लव स्टोरीज में ट्विस्ट और टेंशन भी थीं. मगर टेम्पलेट लगभग सेम ही लगता रहा. अपनी इसी ऑनस्क्रीन इमेज के साथ शाहिद को 'चुप चुप के' 'विवाह' 'जब वी मेट' जैसी फिल्में भी मिलीं. लेकिन इन तीनों का पूरा क्रेडिट सिर्फ शाहिद के हिस्से नहीं आता. इसकी वजह शायद यही थी कि उनके किरदार, उनकी इमेज से बहुत 'हट के' नहीं थे.
हीरो के आईडिया से अलग एक हीरो
बड़े पर्दे पर नजर आने वाला 'हीरो' एक आईडिया है. इंडियन सिनेमा में पर्दे पर राज करने वाली एक प्रॉपर एक्शन मसाला फिल्म, उतनी ही चलती है जितने अच्छे से उसका लीड एक्टर इस आईडिया को स्क्रीन पर उतारता हुआ दिखता है. यानी, 'जंजीर' का अमिताभ बच्चन जनता के दिल में इसलिए धंस गया क्योंकि वो इस हीरो के आईडिया को परफेक्ट जी रहा था. हाल ही में यश ने भी KGF में यही किया है.
'हीरो' शब्द बोलते ही एक इमेज क्लिक करती है- लंबा चौड़ा जवान. जो 24 घंटे में डेढ़ मिनट की दर से ही मुस्कुराता हो और बाकी समय निहायत गंभीर हो. आंखों से ऐसे घूरता हो कि सामने वाला घबराकर खुद ही साइड हो जाए. तूफ़ान से पहले के शांत समंदर जैसा उसका चेहरा हो और वो क्या सोच रहा है ये खुद उसके दिमाग को भी न पता हो. अब आप बताइए, शाहिद को देखकर आपको ऐसा फील कभी आता था? मगर 'आर राजकुमार' याद कीजिए, धरतीपुर का रोमियो राजकुमार (शाहिद का किरदार) भले बहुत जबराट सा न लगता हो, मगर उसके गुस्सा पर्याप्त विस्फोटक था!
'कमीने' का कमाल
ऑडियंस ने पहली बार शाहिद के टैलेंट के खजाने को पूरा खुलते देखा 'कमीने' (2009) में. सिनेमा जीनियस विशाल भारद्वाज की फिल्म में शाहिद ने जुड़वा भाइयों का रोल किया. इन दोनों में से गुड्डू लगभग उसी जोन में था जो शाहिद की ऑनस्क्रीन इमेज थी. लेकिन चार्ली में किसी को शाहिद कपूर दिखे ही नहीं. गाली, गुंडई और घपलेबाजी का उस्ताद चार्ली एक बिल्कुल अलग किरदार बन गया. और पर्दे पर एक्टर को पूरी तरह किरदार बन जाते देखना सिनेमा के खेल में बहुत बड़ी जीत होती है.
शाहिद ने 'कमीने' में चार्ली बनकर जो किया, उससे सबसे पहले उनका स्वीट-चार्मिंग-चॉकलेटी फेस वाला खांचा टूट गया. यहां से शाहिद ने अपने किरदार में एक नई चीज गढ़ दी- वो एक डरावने न लगने वाले, लेकिन कतई भयानक कांड कर डालने वाला आदमी बन गए. शाहिद अपने किरदार को निभाने में इन दोनों बिन्दुओं- स्वीट और भयानक के बीच, जितनी ज्यादा लंबी दूरी तय करते हैं, ऑडियंस के दिल में वो उतना ही गहरे उतर जाते हैं. 'आर राजकुमार' में गुंडई करते शाहिद ने यही दूरी तय की. 'हैदर' में तो ये बिंदु धरती के उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव जितनी दूर थे. और इन दोनों बिन्दुओं को दूर करने में उनके लुक का भी बहुत बड़ा रोल था.
'उड़ता पंजाब' में शाहिद ने फिर लुक बदला और वो एक ऐसे अवतार में दिखे, जैसा उन्हें कोई इमेजिन ही नहीं कर सकता. लोगों के मन में कुछ खास तरह के लुक्स में बनने वाली किसी इंसान की इमेज, सिनेमा के खेल को ऐसे ही ट्विस्ट करती है. ऊपर से उनका रॉकस्टार किरदार टॉमी सिंह, जिस तरह नशे में रहता था, उसे यूं भी कहा जा सकता है कि नशा टॉमी सिंह को जी रहा था. अब यहां से 'कबीर सिंह' में शाहिद की परफॉरमेंस की तारीफ को समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है.
हमारी-आपकी नैतिकता की कसौटी पर कबीर सिंह का किरदार दिक्कतों की खान था. लेकिन शाहिद जैसा क्यूट चेहरा, उनके 'अहानिकारक' लगने वाले आउटलुक और डॉक्टर को देवता मानने वाली सोच को सेंटर में रखकर सोचिए... क्या आप सोच सकते थे कि डॉक्टर कबीर सिंह 'ऐसा' बंदा होगा?
'मैच्योर' इमेज में स्ट्रगल
शाहिद की आखिरी फिल्म 'जर्सी' ने कमाई भले जोरदार न की हो, लेकिन एक अच्छी फिल्म थी. इमोशन, ड्रामा, रोमांस का फिल्म में अच्छा कॉम्बिनेशन था. शाहिद कपूर की एक्टिंग लोगों को 'जर्सी' में भी बहुत अच्छी लगी, फिल्म में उन्होंने एक बच्चे के पिता का किरदार निभाया था. लेकिन मुझे 'जर्सी' देखकर थिएटर से निकलते हुए एक लड़के की बात याद आती है कि 'शाहिद ने बहुत अच्छा काम किया है लेकिन वो 'पापा' लगता नहीं है!'
शाहिद का करियर देखें तो ऐसा लगता है जैसे उनका सारा स्ट्रगल ही इस 'लगने' वाली समस्या से रहा है. यानी इस परसेप्शन को तोड़ने में कि अपने चेहरे-अपीयरेंस से वो जितना प्यार भरे शख्स लगते हैं, उसके ठीक उलट किरदार भी पूरी परफेक्शन के साथ निभा सकते हैं. उनकी पर्सनालिटी में एक तुरंत पसंद आ जाने वाली क्वालिटी है. मोहल्ले-पड़ोस के हर दूसरे लड़के की तरह, जो किसी भी अनजान अंकल-आंटी की मदद मुस्कुराते हुए कर देता हो, जिसे सब पसंद करते हों.
इसका फायदा ये है कि अधिकतर लोगों को शाहिद हमेशा उतने ही नए लगते हैं जितने 20 साल पहले 'इश्क विश्क' में लगे थे. और शायद इसका नुकसान ये है कि शाहिद जब सीधे-सादे 'मैच्योर' आदमी के रोल में दिखे तो उन्हें उतना ज्यादा नहीं पसंद किया गया. इसीलिए शाहिद के वो किरदार ज्यादा असर करते हैं जिनमें एक टेढ़ापन होता है.
'पद्मावत' में खिलजी के रोल में रणवीर सिंह को और पद्मावती के किरदार में दीपिका पादुकोण को जितनी तारीफ मिली, शाहिद के हिस्से उसका शायद आधा भी नहीं आया. 'पद्मावत' में महारावल रतन सिंह के किरदार में शाहिद का काम परफॉरमेंस के हर लिहाज से बेहतरीन था. लेकिन बहुत लोगों का रिएक्शन ये था कि इतने सीरियस रोल में शाहिद 'सूट' नहीं कर रहे. इसकी वजह भी वही चेहरे से बनने वाला परसेप्शन ही है. यही मैच्योर रोल वाला पंगा दर्शकों को 'मौसम' 'रंगून' और कुछ हद तक 'पाठशाला' जैसी फिल्मों में भी लगा.
एकदम असली वाला 'फर्जी'
अपनी पहली वेब सीरीज में शाहिद ने एक टेढ़ा ही किरदार निभाया है. शो में सनी एक आर्टिस्ट जो नकली नोट बनाने के काम में लग जाता है और उसका ये हुनर उसे फेक करंसी के इंटरनेशनल धंधे में फंसा देता है. मिडल क्लास वाले संघर्ष देखकर बड़ा हुआ सनी ऊब चुका है और अब किसी भी तरह से इतने पैसे कमाना चाहता है कि 'पैसे की इज्जत ही न करनी पड़े'. उसके नाना की बिमारी का महंगा इलाज उसे फर्जी नोटों के काम की तरफ जाने में और बड़ा पुश देता है.
13 साल पहले 'बदमाश कंपनी' में शाहिद का किरदार करण कपूर भी इसी तरह के हालात देखता है. उसके पिता को हार्ट अटैक आता है और इलाज में पैसे की कमी, करण को बहुत चुभ जाती है. यहीं से वो किसी भी शर्त पर रईस होने की ठान लेता है. मगर 'फर्जी' देखते हुए आपको सनी ही दिखता है, करण नहीं याद आता (याद करने की नीयत से याद करेंगे, तभी याद आएगा). राइटर्स को भी क्रेडिट है कि एक जैसी मोटिवेशन से बिल्कुल अलग डिजाईन वाले किरदार लिखे गए, लेकिन शाहिद को पूरा क्रेडिट इस बात का है कि उनका अंदाज, बॉडी लैंग्वेज,आंखें-बातें-चाल सब दोनों किरदारों में अलग लगते हैं.
शाहिद अपने करियर में बॉक्स ऑफिस पर बहुत भरोसेमंद स्टार नहीं रहे हैं. लेकिन एक सही रोल में वो थिएटर्स भर देने की पूरी क्षमता रखते हैं. उसके साथ एक बहुत पावरफुल बात ये है कि जनता उन्हें इस तरह अलग-अलग किरदारों में, ग्रे शेड में पसंद करती है. जबकि बहुत एक्टर्स को लोग एक्स्परिमेंट करते नहीं देखना चाहते. शाहिद को अपने मासूम से लगने वाले चेहरे से बनने वाले परसेप्शन को काटने के लिए मेहनत करनी पड़ती है, जबकि रणवीर सिंह को शुरुआत में दर्शक और यहां तक कि इंडस्ट्री के बड़े फिल्ममेकर्स तक 'इस चेहरे के साथ' हीरो मानने से इनकार करते हैं.
इस तरह कथित परिभाषाओं में फंसना किसी भी इंसान की मेंटल हेल्थ के लिए हानिकारक चीज होती है, लेकिन एक्टर्स की कलाकारी इसी परसेप्शन से लड़ने में रंग लाती है. अभी तक शाहिद कपूर परसेप्शन तोड़कर अपने किरदारों में टेढ़ेपन के साथ बहुत दिलचस्प लगते आए हैं. आने वाली फिल्मों में वो क्या लाते हैं इसपर तो जनता की नजर रहेगी ही लेकिन अगर उनके अगले किरदारों में कुछ नए किस्म का टेढ़ापन हुआ, तो जनता यकीनन उन्हें बॉक्स ऑफिस का भी किंग बना सकती है.