इस शुक्रवार 19 मई को एक फिल्म रिलीज होने वाली है, जिसका नाम है 8Am मेट्रो. शायद ही कुछ दर्शकों को इस फिल्म के रिलीज, कास्टिंग की जानकारी हो, लेकिन दावा है यह फिल्म किसी न किसी मायनों पर आपको हैरान करेगी. फिल्म देखते वक्त कई ऐसे मोड़ भी होंगे, जहां आप खुद को इससे रिलेट भी करेंगे.
कहानी
महाराष्ट्र में अपने पति और बच्चों संग एक साधारण सी जिंदगी गुजार रही इरावती (सैयामी खेर) को लिखने का शौक है. परिवार की जिम्मेदारियों को निभाते हुए इरा अपने लिए कुछ वक्त चुराती है, जहां वो फिल्टर कॉफी की चुस्कियों के साथ अपनी कविताओं की दुनिया में खो जाती है. इसी बीच इरा की छोटी बहन जो हैदराबाद में है, कॉल कर अपनी डिलीवरी में मदद के लिए बुलाती है. एक मीडिल क्लास फैमिली से आई इरा अपने पैसे बचाने के चक्कर में ट्रेन से हैदराबाद का सफर कर पहुंचती हैं. हालांकि ट्रेन के नाम से इरा के चेहरे के भाव बदलते हैं और वो पूरे सफर के दौरान बेचैन रहती है. हैदराबाद पहुंची इरा रोजाना अपनी बहन के लिए टिफिन लेकर अस्पताल जाती है, जिसके लिए वो सुबह के 8 बजे की मेट्रो पकड़ती हैं. मेट्रो में पहुंचते वक्त भी इरा का चेहरा पसीने से तर-बतर हो जाता है. अब इरा को ऐसी हालत में देखते हुए एक अजनबी उसकी ओर हाथ बढ़ाता है और उसे मेट्रो में चढ़ने में मदद करता है. इस अजनबी का नाम है प्रीतम (गुलशन देवैया). एक बैंक में मैनेजर की नौकरी में कार्यरत प्रीतम, इरा के इस रोजाना के सफर का साथी बनता है. प्रीतम को किताबों का शौक है और वो अपनी तमाम नॉलेज इरा से शेयर करता है. उसकी कविताओं को सुनता है. इरा और प्रीतम की बॉन्डिंग आखिर क्या मोड़ लेती है. कहानी इसी पर आधारित है. इसे जानने के लिए सिनेमा थिएटर की ओर रुख करें.
डायरेक्शन
हैदराबाद के फिल्म स्टूडेंट राज ने इस फिल्म को डायरेक्ट किया है. एक नॉवेल पर आधारित इस कहानी को राज ने एक फिल्म का रूप दिया है. अमूमन किताबों से उठाई गई कहानियां कई बार इतनी ड्रामा और अतिशयोक्ति से लबरेज होती हैं कि वो अपनी आत्मा खो बैठती हैं. लेकिन राज ने इसका पूरा ख्याल रखा है कि वो इसकी कहानी को ठीक वैसे ही पेश करेंगे, जैसे वो किताबों के पन्नों पर अंकित की गई है. राज की यह कोशिश काफी हद तक सफल भी नजर आती है. कहानी कई लेयरों पर हैं, जिसकी हर लेयर और उसके इमोशन का पूरा ख्याल रखा गया है. मसलन कहानी डिप्रेशन, एंजाइटी जैसी मेंटल समस्याओं पर भी बड़े सेंसिबल तरीके से बात करती है. जिस कन्विक्शन के साथ इसपर बात कही गई है, वो आपको हतप्रभ करती है. फिल्म का पेस थोड़ा स्लो है, शायद यही इसकी खूबसूरती भी हो, तो कुछ दर्शकों को खींची भी लग सकती है. फिल्म के कई हुक पॉइंट्स हैं, जो आपको बांधे रखते हैं. सेकेंड हाफ में एक ट्विस्ट भी है, जो कहानी को और रोचक बनाता है. फर्स्ट हाफ थोड़ा खिंचा हुआ लगता है, जिसे राज एडिट कर थोड़ा और क्रिस्प कर सकते थे. कुछ गैर जरूरी सीन्स भी हैं, जो फिल्म में न भी होते, तो इससे कुछ खास फर्क नहीं पड़ता. ओवरऑल एक कम बजट पर एक बेहद उम्दा कहानी वाली यह फिल्म आपका दिल जीत लेती है. खासकर गुलजार साहब की लिखी कविता और कुछ गानें इस फिल्म में और जान डाल जाते हैं.
टेक्निकल
कहानी जब दमदार हो, तो इसके टेक्निकल में कुछ ऊंच-नीच हो, तो भी उसे नजरअंदाज किया जा सकता है. सिनेमैटिकली फिल्म का रिप्रेजेंटेशन काफी शानदार रहा है. स्क्रीन के जरिए आप खुद को हैदराबाद में महसूस करते हैं. चाहे वो मेट्रो का लिया एरियल शॉट हो या फिर झील के किनारे बैठे एक्टर्स का क्लोजअप शॉट, सिनेमैटोग्राफर सनी कुरापति ने हर एंगल का ख्याल रखा है. फर्स्ट हाफ के कुछ सीन्स को अगर अनिल अलायम एडिट कर क्रिस्प करते, तो स्टोरी और भी ऑन पॉइंट हो जाती. निर्वान अथर्य का म्यूजिक भी कमाल का है. सभी गाने कहानी में मिश्री की तरह घुलते लगते हैं.
एक्टिंग
गुलशन देवैया ने प्रीतम के किरदार को जिया है. वो इसमें इतने सहज लगे हैं कि आप एक्टर गुलशन को पूरी तरह से भूल जाते हैं. उन्होंने अपने इमोशन का ग्राफ बखूबी पकड़ा है. सैयामी खेर मराठी मुलगी के किरदार को परफेक्ट तरीके से निभा गई हैं. किरदार का सूनापन उनकी आंखों में झलकता है. मराठी डायलेक्ट और हिंदी के ब्लेंड को वो बखूबी निभा जाती हैं. ओवरऑल इन दोनों एक्टर्स का काम सहज और सटीक रहा है. पति के रूप में उमेश कामत भी परफेक्ट रहे हैं. वहीं मृदुला बनीं कल्पिका गणेश कम समय के लिए लेकिन अपना काम सही से निभा जाती हैं. बहन बनीं निमिशा नायर के काम को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है.
क्यों देखें
फिल्म आज के दौर के लिए महत्वपूर्ण है. डिप्रेशन और एंजाइटी जैसी मानसिक बीमारी को लेकर बेशक बहुत-सी फिल्में बनी होंगी लेकिन इस फिल्म में जिस एंपेथी के साथ इसे प्रेजेंट किया गया है, वो काबिल ऐ तारीफ है. छोटे बजट की फिल्म है, लेकिन आप पर असर जरूर छोड़ेगी. फिल्म को एक मौका देना, तो जरूर बनता है.