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Bad Cop Review: अनुराग-गुलशन देवैया हैं मजेदार, दमदार स्टोरी में स्टाइल-स्वैग का खेल

गैंगस्टर्स के माल की डिलीवरी का मामला है. मामले में महकमे के ऑफिसर्स का खुरपेंच है. बीच में जुड़वा भाइयों की कहानी के कुछ पेज हैं. और एक ट्विस्ट है, जो हर जुड़वा भाइयों की कहानी में होता है. सवाल है, शो में कितना कमाल है? जवाब पेश है इस रिव्यू में…

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'बैड कॉप' रिव्यू
'बैड कॉप' रिव्यू
फिल्म:डार्क कॉमेडी-थ्रिलर-गैंगस्टर ड्रामा
2.5/5
  • कलाकार : गुलशन देवैया, अनुराग कश्यप, सौरभ सचदेवा
  • निर्देशक :आदित्य दत्त

गुलशन देवैया, अनुराग कश्यप, सौरभ सचदेवा और ‘कोहरा’ फेम हरलीन सेठी का एक साथ में होना ही किसी प्रोजेक्ट के लिए सिनेमा फैन्स की एक्साइटेड बढ़ा सकता है. ऊपर से ‘डिज्नी प्लस हॉटस्टार’ ने शो का जैसा ट्रेलर काटा, उसे देखकर ही लगा कि ये डार्क कॉमेडी-थ्रिलर-गैंगस्टर ड्रामा टाइप कंटेंट की खान होगा. अब जबकि शो आ चुका है तो साथ में ये बड़ा सवाल भी आएगा कि क्या ‘बैड कॉप’ ऐसा निकला? 

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जवाब खोजने के लिए हमें 8 एपिसोड वाले इस शो के 6 एपिसोड मिले. शो की एक खासियत ये है कि इसके एपिसोड 30 मिनट से ज्यादा लंबे नहीं हैं. कंटेंट की पेस सही है, यानी बोर होने का एक बड़ा चांस तो यहीं कम हो गया. लेकिन बड़े-बड़े सवालों के जवाब, छोटे-छोटे वन लाइनर्स में नहीं समाते साहब!

क्या है कहानी का मामला? 
बिना स्पॉइलर्स की बौछार किए बताएं तो कहानी दो जुड़वा भाइयों की है- करण और अर्जुन (गुलशन देवैया). ट्रेडमार्क जुड़वा किरदारों वाली कहानियों की तरह इन्हें इनके लुक, रंग, हेयरस्टाइल, आवाज बॉडी या चेहरे पर तिल/मस्से जैसी किसी लकीर से अलग नहीं किया गया. गुलशन देवैया के दोनों किरदार इतने सेम हैं कि जब एक फ्रेम में होते हैं तो आपके लिए भी पहचानना मुश्किल होगा. लेकिन अंतर है इनके चाल-चलन-चरित्र में. 

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करण, पुलिस वाला है और उसकी पत्नी देविका (हरलीन सेठी) मुंबई पुलिस में उसकी सीनियर ऑफिसर है. दोनों की शादी में पुलिस महकमे की टेंशन ज्यादा है या आपसी क्लेश, ये भी एक सवाल है. लेकिन उन्हें अबतक साथ बने रहना उनकी बेटी का कमाल है. अर्जुन, चोर है और अपनी गर्लफ्रैंड कम क्राइम पार्टनर किकी (ऐश्वर्या सुष्मिता) के साथ ठगी करता है. ऐसा ही एक कांड करके भागते हुए दोनों एक मर्डर के मामले को छूकर गुजर जाते हैं. 

मर्डर हुआ है जर्नलिस्ट आनंद मिश्रा का, जो ‘कलम से क्रांति टाइप’ वाला कड़ा पत्रकार है. उसका मर्डर क्यों हुआ, ये शो में ही देखें. ये आनंद मिश्रा, एक सीबीआई ऑफिसर (सौरभ सचदेवा) का पक्का दोस्त था. इसलिए पर्सनल इक्वेशन और प्रोफेशनल इन्वेस्टिगेशन करने वाला ये कॉप अर्जुन को ही अपने दोस्त का कातिल मानकर पड़ताल करने लगा है.

पुलिस वाले हैं तो गैंगस्टर भी होगा ही… उसका नाम है कज्बे (अनुराग कश्यप). ये भाईसाहब जेल से ही अपना पूरा नेटवर्क चला रहे हैं, जिसे इनका भांजा बाहर संभालता है. ये भांजा शरीर से जितना भी मजबूत हो, मगर अक्ल से बहुत ढीला. इस कहानी में रायता फैलाने की जिम्मेदारी उसने बखूबी निभाई है. 

गैंगस्टर्स के माल की डिलीवरी का मामला है. मामले में महकमे के ऑफिसर्स का खुरपेंच है. बीच में जुड़वा भाइयों की कहानी के कुछ पेज हैं. और एक ट्विस्ट है, जो हर जुड़वा भाइयों की कहानी में होता है. असल में जुड़वा भाइयों के किरदार एक डिवाइस हैं, जिसके जरिए फिल्ममेकर्स सेम पेरेंट्स से जन्मे, सेम दिखने-बोलने-चलने-उठने-बैठने वाले दो लोगों के चरित्र का एकदम अलग-अलग होना एक्सप्लोर करते हैं. 

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लेकिन ‘बैड कॉप’ की कहानी का ट्विस्ट यही सवाल है कि क्या करण-अर्जुन वाकई अलग हैं? या एक जैसे हैं? जो चोर है, वो कितना पुलिसवाला हो सकता है? और जो पुलिसवाला है, वो कितना चोर? 

मुद्दे की बात
लीड किरदारों के नाम से लेकर, उनके क्रिमिनल-पुलिस वाले एंगल तक, डायरेक्टर आदित्य दत्त और उनके आधा दर्जन राइटर्स का सिनेमा प्रेम तो साफ दिखता है. लेकिन ये थोड़ा ज्यादा ही लगता है क्योंकि शो के सब-प्लॉट, बैकग्राउंड स्कोर, ट्विस्ट और ट्रीटमेंट बहुत ओवर-फिल्मी लगते हैं. शो के ट्विस्ट और आगे की घटनाएं आप पहले से गेस कर लेंगे. 

और ये वैसे हिंट नहीं हैं जो एक डायरेक्टर ऑडियंस की दिलचस्पी बनाए रखने के लिए धीमे से खिसकाता रहता है. बल्कि आपका दिमाग, इस शो के थ्रिलर वाले हिस्से की स्पीड से ज्यादा तेज दौड़ता है. राइटिंग इतनी ऑर्डिनरी है कि पुलिसवाले उतने ही पुलिसवाले हैं और गैंगस्टर वैसे ही गैंगस्टर, जितने ये एक साधारण और औसत से कम इंटेलिजेंट बॉलीवुड थ्रिलर में होते हैं. हां, बेहतर चीज है इसके ह्यूमर का चटपटापन. 

किरदारों के डायलॉग, आपसी तंजबाजी और कमबैक मजेदार हैं जिससे आपका मन लगा रहता है. एक्टर्स का काम एक और चीज है जो इंटरेस्ट बनाए रखती है. हरलीन सेठी अपने एटीट्यूड में पूरी तरह इतनी पावरफुल लगी हैं कि हर आड़े-तिरछे मेल कैरेक्टर को सीधा कर दें. सौरभ सचदेवा एक अच्छे इरादे वाला किरदार निभाते हुए भी जमते हैं. 

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गुलशन देवैया इंटरेस्टिंग हीरो हैं. उन्हें शो ने उतना हीरो बनने का मौका भी दिया है, जो फिल्में नहीं दे पा रहीं. अनुराग कश्यप, एक विलेन वाले वो सारे धतकरम करते दिखते हैं जो अबतक उन्होंने अपनी फिल्मों के विलेन्स से करवाए हैं. और वो मजेदार, माहौल बनाने वाले विलेन लगते हैं. लेकिन अनुराग अपनी बनाई फिल्मों में, इन हरकतों के जरिए विलेन के किरदार को एक डेप्थ देते हैं, जो ये शो उनके साथ नहीं कर पाया.

कुल मिलाकर, अगर ‘बैड कॉप’ की राइटिंग थोड़ी गुड होती तो ये एक्सीलेंट शो हो जाता. हालांकि, अभी भी मन बदलाव के लिए, कम दिमागी लोड देने वाला स्टाइलिश फिल्मी मसाला कंटेंट तो ‘बैड कॉप’ में ठीकठाक है. शो में एक डिफरेंट सी वाइब तो है ही.

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