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Bade Miyan Chote Miyan Review: अक्षय-टाइगर की जोड़ी मिलकर करेगी बोर, मनोरंजन के नाम पर मिलेगा धोखा

एक अच्छी मसाला एक्शन फिल्म में सिर्फ तीन चीजें चाहिए होती हैं- ठीकठाक प्लॉट, नया-क्रिएटिव एक्शन और स्वैग-ह्यूमर को मजबूती से संभाल लेने वाला हीरो. मगर 'बड़े मियां छोटे मियां' इन तीनों में से कुछ भी नहीं दे पाती. स्क्रीनप्ले से लेकर डायलॉग्स तक की कमजोर राइटिंग, महंगे बजट की इस शिप में बहुत बड़ा छेद साबित हुई है.

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'बड़े मियां छोटे मियां' में अक्षय कुमार, टाइगर श्रॉफ
'बड़े मियां छोटे मियां' में अक्षय कुमार, टाइगर श्रॉफ
फिल्म:बड़े मियां छोटे मियां
1/5
  • कलाकार : अक्षय कुमार, टाइगर श्रॉफ, सोनाक्षी सिन्हा, मानुषी छिल्लर, अलाया एफ
  • निर्देशक :अली अब्बास जफर

फिल्म देखने जाते हुए हर व्यक्ति के मन में एक शक रहता है- पता नहीं एंटरटेनिंग होगी या नहीं. लेकिन एक्शन मसाला एंटरटेनर फिल्मों के मामले में ये सवाल थोड़ा हल्का होकर एक बात पर पहुंच जाता है- ‘कितनी ही खराब बनी होगी?!’

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लेकिन ‘बड़े मियां छोटे मियां’ इस हल्के सवाल का भी बेहद कमजोर जवाब है. फिल्मी एंटरटेनमेंट की गरीबी रेखा से भी काफी नीचे छूट जाने वाली फिल्म है. बॉलीवुड की दो अलग जेनरेशन से, दो बेहतरीन एक्शन स्टार्स- अक्षय कुमार और टाइगर श्रॉफ; को साथ लेकर आई ये फिल्म लगभग हर मामले में बोर करने के नए स्टैंडर्ड सेट करती है. 

कहानीनुमा कुछ
फिल्म शुरू होती है एक आर्मी कॉन्वॉय पर अटैक से, जिसमें एक मास्कधारी, बैटमैन स्टाइल विलेन (पृथ्वीराज चौहान) भारत की सुरक्षा से जुड़ा, एक सबसे महत्वपूर्ण पैकेज कब्जा लेता है. ये एक पासवर्ड है, जिससे ‘करण कवच’ कंट्रोल होता है. और करण कवच पूरे भारत को एक शील्ड की तरह कवर करने वाला एंटी-मिसाइल सिस्टम है. 

इस बेहद महत्वपूर्ण पैकेज को तीन दिन के अंदर वापस लाने का काम सौंपा जाता है, कोर्ट मार्शल किए जा चुके दो एक्स आर्मी ऑफिसर्स को- कैप्टन फिरोज उर्फ फ्रेडी (अक्षय) और कैप्टन राकेश (टाइगर) को. इस टास्क में इन दोनों के साथ है एक आर्मी ऑफिसर कम स्पेशल एजेंट मीशा (मानुषी छिल्लर). और एक एनालिस्ट (अलाया एफ), जो प्रति सेकंड 72 शब्द की दर से सोशल मीडिया टर्म्स उगलती है, ताकि लग सके कि वो जेन जी से है. सोनाक्षी सिन्हा भी फिल्म में एक महत्वपूर्ण रोल कर रही हैं. मगर उनके ये रोल किसी हार्ड ड्राइव से ज्यादा नहीं है, जो ऐसी फिल्मों में बस एक हाथ से दूसरे हाथ डोलती रहती हैं और इस चक्कर में सारा बवाल होता रहता है.

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ये हार्ड ड्राइव कैसे बचाई जाएगी, इसी में सारा खेल है. इसके बीच छोटे सब प्लॉट में विलेन का इन ऑफिसर्स से पुराना कनेक्शन, सोनाक्षी और अक्षय के किरदारों के कनेक्शन वगैरह शामिल हैं. एक छोटे से फ्लैशबैक के जरिए आपको फिल्म के टाइटल का किस्सा बताया जाता है. एक पुराने मिशन पर अक्षय और टाइगर, अफगानिस्तान में घुसकर आतंकवादियों के कब्जे से एक परिवार को छुड़ाते हैं. आतंकियों को डिस्ट्रैक्ट करने के लिए वो बॉलीवुड फिल्म 'बड़े मियां छोटे मियां' का सहारा लेते हैं और फिर इनके नाम भी बड़े मियां-छोटे मियां पड़ जाते हैं.

फिल्म का स्कैन
देश की सुरक्षा में खतरा बनता, पहले आर्मी से जुड़ा रहा एक विलेन. चीन-पाकिस्तान का खतरा. और देश की रक्षा करते हीरो. कभी एंटरटेनमेंट का जिन उगलने वाला ये प्लॉटनुमा चिराग इतना घिसा जा चुका है कि अगर इसमें सच का आज्ञापालक जिन होता, तो एक और बार घिसने पर वो भी निकलने से इनकार कर देता और विद्रोह करके वापस निकल लेता. मगर मेकर्स हैं कि इस निचुड़ के भरभरे हो चुके गन्ने जैसे प्लॉट में, मॉडर्न-टेक और AI का नींबू-पुदीना फंसाकर रस निकालना चाह रहे हैं. और वो भी तब जब हीरो शाहरुख-सलमान नहीं हैं. जबकि ये दोनों खुद भी ऐसी कहानी लेकर 'टाइगर 3' जैसा धक्का खा चुके हैं. 

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एक अच्छी मसाला एक्शन फिल्म में सिर्फ तीन चीजें चाहिए होती हैं- ठीकठाक प्लॉट, नया-क्रिएटिव एक्शन और स्वैग-ह्यूमर को मजबूती से संभाल लेने वाला हीरो (चाहे एक या कितने भी). मगर 'बड़े मियां छोटे मियां' इन तीनों में से कुछ भी नहीं दे पाती. स्क्रीनप्ले से लेकर डायलॉग्स तक की कमजोर राइटिंग, महंगे बजट की इस शिप में बहुत बड़ा छेद साबित हुए. कॉमेडी के किंग रहे अक्षय कुमार से आपको कोई ऐसा पंच नहीं सुनने को मिलता जो थोड़ी देर दिमाग में ठहरकर हंसी दिला दे. टाइगर श्रॉफ का किरदार फिल्म में नॉन-सीरियस बातें करने वाला है. मगर उनसे भी 'टेररिज्म में नेपोटिज्म' जैसा रूखा-सूखा पंच ही निकल पाया. 

एक्शन में 108 बार, धमाके के आगे टहलते हीरो हैं. ड्राइविंग सीट पर दो लोगों की फाइट में डोलती गाड़ी, स्लोप पर बाइक चढ़ाकर हेलिकॉप्टर, गुंडों के साथ क्लोज फाइट में एक हाथ से चाकू छोड़कर, दूसरे हाथ में लपककर घोंप देना ही शायद अब एक्शन फिल्मों की नियति बची है. कितनी हताशा की बात है कि टाइगर और अक्षय जैसे, अपना शरीर दांव पर लगाकर एक्शन करने वाले हीरोज के होते हुए भी, दर्शक से सीटी निकलवा देने वाला एक एक्शन सीन नहीं कोरियोग्राफ कर पा रहे लोग. और फिल्म का जो "धमाकेदार" ट्विस्ट है, वो जनता ने पहली बार 'शक्तिमान' में देख लिया था. ये आपको फिल्म देखने पर समझ आएगा. मगर इसे समझने भर के लिए फिल्म देखने का निर्णय अपने रिस्क पर लें. और गाने? छोड़ ही देते हैं! 

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कुल मिलाकर देखा जाए तो 'बड़े मियां छोटे मियां' को 'सबसे बड़े बजट में, सबसे बोरिंग फिल्म' के किसी कॉम्पिटीशन में दावेदारी पेश करनी चाहिए. इस फिल्म के साथ यहीं पर न्याय हो सकता है. वरना, बड़े औसत दाम के टिकट वाले, ऑलमोस्ट आधे भरे थिएटर में, किसी एक दर्शक से भी हूटिंग-सीटी-ताली न निकलवा पाने वाली फिल्म किसी भी तरह से 'एक्शन एंटरटेनर' कहलाना नहीं डिजर्व करती.  

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