कति जहर है जहर है जहर है.... इस जाट नेता गंगा राम चौधरी के ये जो बोल हैं वो हरियाणवी में भले ही पॉजिटिव मतलब रखते हों, पर फिल्म को नंबर देने के लिहाज से तो दिल में जहर उतर आता है. एक बार को अभिषेक बच्चन, निम्रत कौर और यामी गौतम के अभिनय के बारे में सोचकर दसवीं को पासिंग मार्क्स दे भी दें, पर जब कहानी ही डांवा डोल हो तो नय्या पार कैसे लगेगी. डायरेक्टर तुषार जलोटा के लिए 'दसवीं' की परीक्षा पास करना इतना मुश्किल क्यों हुआ? आइए जानें.
फिल्म की कहानी
दसवीं फिल्म की मूल कहानी शिक्षा की महत्ता पर है. फिल्म में शिक्षा को ही मुख्य विषय लेते हुए एक कहानी बुनी गई है, जिसके जरिए इसकी जरूरत और अहमियत को दिखाया गया है. आठवीं पास गंगा राम चौधरी, हरित प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं. वह शिक्षा घोटाले के आरोप में जेल चले जाते हैं. सजा मिलने के बाद गंगा अपनी पत्नी विमला (निम्रत कौर) को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठा देते हैं. विमला भी ठहरी देसी और कम पढ़ी लिखी पर किसी तरह वह मुख्यमंत्री के पद को संभाल लेती है.
उधर जेल में गंगा का सामना रफ एंड टफ जेल सुप्रीटेंडेंट ज्योती देसवाल (यामी गौतम) से होती है. ज्योति के लिए गंगा कोई मुख्यमंत्री नहीं बल्कि दूसरे कैदियों जैसा ही एक कैदी है. उसके सख्त बर्ताव और अनुशासन से परेशान गंगा जेल से बाहर निकलने के उपाय ढूंढने लगता है. बीमारी का बहाना काम नहीं आने पर वह लाइब्रेरी में जाकर दसवीं की परीक्षा देने के बहाने वहां जाकर पढ़ने लगता है. लेकिन जब कोई तरकीब काम नहीं आती तब वह पढ़ाई को गंभीरता से लेने लगता है. उसके अंदर पढ़ने की ललक देख, ज्योति उसे पढ़ने में मदद करती है.
इधर मुख्यमंत्री का पद संभालते-संभालते विमला को वह कुर्सी भा जाती है और अब वह नहीं चाहती कि उसकी ये कुर्सी कोई भी उससे छीने, यहां तक कि उसका पति गंगा भी. गंगा को विमला की चालाकियां समझ आने लगती है, वह मन लगाकर पढ़ता है. गंगा ऐलान कर देता है कि अगर वह दसवीं की परीक्षा पास करेगा तभी वह मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठेगा. विमला अब इस कोशिश में लग जाती है कि गंगा परीक्षा में पास ना हो पाए. अब देखना ये है कि आठवीं पास गंगा, जिसे राजनीति की पढ़ाई के अलावा किसी में रुचि नहीं, वो दसवीं की परीक्षा कैसे पास करेगा, वह वापस हरित प्रदेश का मुख्यमंत्री बन पाएगा या नहीं. क्या विमला के साथ गंगा का रिश्ता कुर्सी की वजह से टूट जाएगा?
कहां खटकती है कहानी?
फिल्म बनाने के लिए तुषार जलोटा ने विषय तो अच्छा चुना पर इसे थोड़ा इंटरेस्टिंग बनाने के बजाय उन्होंने कहानी को शुरुआत से ही बड़ा फ्लैट रखा. सिर्फ सब्जेक्ट के भरोसे कहानी को जबरदस्ती खींचने की कोशिश नजर आई.
बिल्कुल देसी-देहाती-लालची लगीं निम्रत कौर
दसवीं में अभिषेक बच्चन ने अपने हरियाणवी टोन से गंगा के किरदार में अच्छा काम किया है. जाटों की तरह रे, सुण, उंच्चा बोल जैसी बोली, ठाट-बाट वाली चाल, चौड़ में ताने सीना और मूंछों का रौब उनपर काफी जंच रहा था. कैरेक्टर के हिसाब से अभिषेक ने बढ़िया काम किया है. यामी गौतम की एक्टिंग ठीक-ठाक थी. उन्होंने ज्योति के किरदार के साथ न्याय किया है. आते हैं निम्रत कौर के कैरेक्टर विमला के पास. विमला के रोल में निम्रत कति जहर लगीं. उन्होंने देसी देहाती होने का गजब अभिनय किया है. कहना गलत नहीं होगा कि दसवीं अगर किसी ने अच्छे नंबरों से पास की तो वो है निम्रत कौर. बाकी मनु ऋषि चड्ढा ने भी अपनी हरकतों से गुदगुदाया.
फिल्म लंबी नहीं पर एक्साइटमेंट भी नहीं बढ़ाती
दसवीं 2 घंटे की फिल्म है, लेकिन इन दो घंटों में गंगा का भोलापन लोगों को कुछ ही हद तक हंसाने में कामयाब रही. फर्स्ट हाफ स्टोरी काफी खींची हुई लगती है. ऐसा लगता है फिल्म को लंबा बनाने के चक्कर में जबरदस्ती के सीन्स डाले गए हैं. सेकेंड हाफ फर्स्ट से बेहतर जरूर है पर बहुत खास भी नहीं. अच्छे मैसेज वाली दसवीं में स्ट्रॉन्ग बेस नहीं दिखी.
कुल मिलाकर कहें तो दसवीं ने उम्मीदों को कुछ ज्यादा ही चौड़ दे दी थी. अभिषेक की पिछली कुछ फिल्मों में उनके अभिनय ने दर्शकों को होप दिया था, पर दसवीं ने उनकी सारी मेहनत पर पानी फेर दिया. फिल्म में स्ट्रॉन्ग स्टार्स होने के बावजूद कमजोर पटकथा ने दसवीं को फेल कर दिया.