बाइबिल से जुड़ी मिथकीय कहानियों में लूसिफर एक डेविल यानी शैतान है. ईश्वर का अपना बेटा जिसे स्वर्ग से निकाल दिया गया है लेकिन वो विनाशक की भूमिका में रहता है. जब पाप बहुत बढ़ जाता है तो विनाश की जिम्मेदारी लूसिफर के हिस्से आती है. 2019 में आई मलयालम फिल्म 'लूसिफर' में लीड रोल में सुपरस्टार मोहनलाल थे. इसके सीक्वल में वो 'एम्पुरान' की भूमिका में हैं.
मलयालम में एम्पुरान का मतलब होता है एक ऐसा शक्तिशाली व्यक्ति जिसकी शक्तियां राजा से ऊपर होती हैं और ईश्वर से कम. यानी इस कहानी में मिथकों की परछाइयां भरपूर हैं. फिल्म के डायरेक्टर पृथ्वीराज सुकुमारन हैं, जो बतौर एक्टर भी महत्वपूर्ण भूमिका में हैं.
मलयालम सिनेमा और इस इंडस्ट्री के स्टार पृथ्वीराज दमदार कंटेंट वाली फिल्मों के लिए जाने जाते हैं. ऐसे में जब उन्होंने थिएटर्स में चलने वाले पॉपुलर मसालों से भरी टिपिकल मास एक्शन एंटरटेनर बनाई है तो क्या 'लूसिफर 2: एम्पुरान' या 'L2E' में वो दम है जो ऐसी फिल्मों में होना चाहिए? इस सवाल का जवाब काफी दिलचस्प है.
किस संसार के 'एम्पुरान' हैं मोहनलाल?
अगर आप 'एम्पुरान' का ट्रेलर वगैरह देखकर इम्प्रेस हैं और आपने 'लूसिफर' नहीं देखी है, तो बेहतर होगा कि इसे देखने के बाद नई फिल्म देखें. 'लूसिफर' देखे बिना 'एम्पुरान' देखने पर शायद कहानी से आप थोड़ा कम कनेक्ट कर पाएं. 'लूसिफर' में केरला के एक आइकॉनिक पॉलिटिशियन और मुख्यमंत्री PKR की मौत के बाद उसकी राजनीतिक विरासत संभालने उतरे उसके बच्चों की कहानी थी.
स्टीफन (मोहनलाल) एक पॉपुलर नेता था जिसे PKR अपने बेटे की तरह मानता था और उसे अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी कहता था. उसकी बेटी प्रियदर्शिनी और छोटा बेटा जतिन, राजनीति से दूर थे. पहली फिल्म की कहानी में, PKR की पार्टी में करप्शन की जड़ प्रियदर्शिनी का दूसरा पति बॉबी (विवेक ओबेरॉय) था. 'लूसिफर' ने केरला की पॉलिटिक्स में कैंसर बने बॉबी का इलाज, अपने अचानक प्रकट हुए साथी जाएद मसूद (पृथ्वीराज सुकुमारन) की मदद से कर दिया था. मगर इसके बाद स्टीफन गायब हो गया था और PKR की राजनीतिक विरासत जतिन ने मुख्यमंत्री बनकर संभाली थी.
'लूसिफर' के अंत में ये रिवील किया गया था कि स्टीफन असल में एक इंटरनेशनल ड्रग सिंडिकेट का बॉस कुरैशी अब्राहम है. इस फिल्म का अंत तीन बड़े सवालों पर हुआ था- PKR जैसे कद्दावर नेता का दत्तक पुत्र स्टीफन उर्फ कुरैशी अब्राहम एक ड्रग सिंडिकेट में क्या कर रहा है और वो कहां गायब हो गया? जाएद मसूद की कहानी क्या है? और क्या राजनीति के ईश्वर PKR का अपना बेटा जतिन, राजनीति में अपने पिता के सिद्धांतों को बरकरार रख पाएगा?
'एम्पुरान' में जतिन का एक राजनीतिक फैसला केरला की पॉलिटिक्स में भूचाल की जड़ बना है. उसके इस फैसले से बलराज पटेल उर्फ बाबा बजरंगी (अभिमन्यु सिंह) को एक बड़ा मंच मिल गया है, जो सामुदायिक हिंसा का चेहरा रह चुका है और धर्म की राजनीति करता है. जतिन का ये फैसला इतना गलत है कि विपक्षी दल भी शॉक में हैं. दूसरी तरफ प्रियदर्शिनी एक सोशल वर्कर के रोल में एक्टिव होने लगी है और वो जतिन के फैसले के विरोध में है.
केरला की पॉलिटिक्स से दूर स्टीफन अपराध के संसार में अपना काम कर रहा है और इंटरपोल उसे खोज रही है. लेकिन 'एम्पुरान' की शुरुआत सीधा जाएद मसूद की ट्रैजिक कहानी से होती है, जो बचपन में सामुदायिक हिंसा में अपना परिवार खत्म होते देख चुका है. अपने-अपने रास्तों पर चल रहे ये किरदार आखिरकार उस मोड़ पर पहुंच जाते हैं जहां सब एक दूसरे के सामने खड़े हैं. और आगे कहानी किस दिशा में जाएगी इसका फैसला फिर से स्टीफन उर्फ लूसिफर के हाथों में जाएगा. पर क्या वो आएगा और कैसे आएगा? अब PKR की राजनीतिक विरासत का क्या होगा? और क्या जाएद मसूद की कहानी पूरी होगी? यहां देखें 'एम्पुरान' का ट्रेलर:
दमदार है 'एम्पुरान' का स्टाइल
पृथ्वीराज शुरू से क्लियर थे कि वो किस तरह की फिल्म बनाना चाह रहे हैं और ये बात 'एम्पुरान' के पहले सीन से नजर आने लगती है. 'लूसिफर' के मुकाबले सीक्वल का स्केल काफी बड़ा है और ये पर्दे पर दिखता है. स्टीफन और जाएद मसूद के इंटरनेशनल सीन्स की प्रोडक्शन वैल्यू इतनी सॉलिड है कि फिल्म से पहले बजट बनाने वाले बॉलीवुड मेकर्स को इससे सीखना चाहिए. मोहनलाल को फिल्म में जिस तरह प्रेजेंट किया गया है वो कमाल है. 'गुलाल' जैसी दमदार फिल्मों में नजर आ चुके अभिमन्यु सिंह कई फिल्मों में विलेन बन चुके हैं, जिसमें 'सिंघम अगेन' भी शामिल है. मगर अभिमन्यु 'एम्पुरान' में जिस तरह विलेन बने हैं, वो देखने लायक है.
स्टाइल, प्रेजेंटेशन, हीरो के बिल्ड-अप और स्वैग के मामले में ये फिल्म बहुत सॉलिड है. हर बड़े किरदार खासकर स्टीफन को जिस तरह का ट्रीटमेंट मिला है, वो मेनस्ट्रीम सिनेमा में हर एक्टर का सपना है. एक्शन सीन्स बहुत स्टाइलिश तरीके से डिजाईन किए गए हैं और फाइट्स का रोमांच तगड़ा है. टेक्निकली फिल्म मजबूत है और कैमरा वर्क से लेकर बैकग्राउंड स्कोर तक सबकुछ दमदार है. एडिटिंग थोड़ी और बेहतर हो सकती थी मगर वो डायरेक्टर के नैरेटिव स्ट्रक्चर की चॉइस ज्यादा लगती है. और बतौर डायरेक्टर पृथ्वीराज ने जिस तरह 'एम्पुरान' को एक बेहतरीन एंटरटेनर बनाया है.
क्या है 'एम्पुरान' की दिक्कतें?
स्टाइल में दमदार 'एम्पुरान' की समस्या भी स्टाइल ही है. कई मौकों पर स्टाइल, स्क्रीनप्ले पर हावी हो जाता है. ऑडियंस में रोमांच पैदा करने की कोशिश में फिल्म की राइटिंग कुछ जगहों पर चूकती नजर आती है. जैसे फिल्म में पॉलिटिकल कनफ्लिक्ट का हल बहुत सपाट तरीके से खोजा गया है. सामुदायिक हिंसा के टॉपिक को फिल्म जिस गहराई से छूते हुए शुरू करती है, कहानी में उसका समाधान उतना गहरा और मैसेज देने वाला नहीं है. कहानी के विलेन बलराज का अंत जिस तरह हुआ, वो इस कनफ्लिक्ट का कोई उद्धार नहीं कर पाता, जो राइटिंग की सबसे निराशाजनक बात है.
क्लाइमेक्स में एक और दिक्कत है- दो हीरोज वाली फिल्मों में सबसे दमदार होता है, उनका विलेन के घर में घुसकर तबाही मचाते हुए उसे निपटा देना. यहां विलेन को हीरो अपने सेटअप में फंसा कर मार रहे हैं. जिस जगह विलेन को बुलाया गया है वो उसके एक भयानक कर्म की याद दिलाता है. मगर उसके पास्ट से जुड़ी कोई बातचीत वहां है ही नहीं. ये पूरा हिस्सा बहुत ढीले तरीके से स्क्रीन पर उतरा है. 'एम्पुरान' का फर्स्ट हाफ लंबा फील होता है. इस हिस्से में दिख रहा पॉलिटिकल ड्रामा तो दमदार है, मगर यहां कुछ सीन कम करने का स्कोप था. फिल्म में जतिन के किरदार को भी जैसे एक किनारे कर दिया गया है, जो कहानी का एक बड़ा खिलाड़ी था.
एक्टिंग के मामले में सॉलिड है 'एम्पुरान'
'लूसिफर' को मोहनलाल के फैन्स एक कल्ट की तरह ट्रीट करते हैं. लेकिन 'एम्पुरान' में उन्हें और भी ज्यादा सॉलिड मौके मिले हैं जिसमें उन्होंने अपना पूरा अनुभव दिखाया है. वो हर तरीके से इस एक्शन ड्रामा के परफेक्ट हीरो हैं. मंजू वरियर हर बार की तरह बेहतरीन हैं. टोवीनो थॉमस कमाल की स्क्रीन प्रेजेंस के साथ, उन सीन्स में सॉलिड लगते हैं जब वो मोहनलाल के सामने हैं. मगर उनके किरदार का ट्रीटमेंट दमदार नहीं है.
पृथ्वीराज के कुछ ही सीन हैं मगर इनमें वो दमदार लगते हैं. बल्कि उनके बचपन का किरदार निभा रहे कार्तिकेय देव बहुत इम्प्रेसिव लगते हैं. किशोर और इन्द्रजीत सुकुमारन ने भी अपने किरदारों में अच्छा काम किया है. मगर सबसे ज्यादा इम्प्रेस किया है अभिमन्यु सिंह ने. फिल्म के विलेन के तौर पर उन्होंने जिस ठहराव के साथ सीन्स को पकड़कर रखा है, वो देखकर लगता है कि कई प्रोजेक्ट्स में उन्हें कितना कम यूज किया गया है.
कुल मिलाकर 'एम्पुरान' वाकई में वो एक्शन ड्रामा एंटरटेनर है जिसका दावा पृथ्वीराज रिलीज से पहले करते आ रहे हैं. एक्टर्स का काम शानदार है और इस कहानी का हीरो बहुत दमदार है. स्केल और स्टाइल के लेवल पर ये फिल्म बहुत इम्प्रेस करती है, बस राइटिंग थोड़ी और बेहतर होती तो 'एम्पुरान' एपिक बन जाती.