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टीनएज से जवानी की तरफ जाती हुई मीरा ने, अभी-अभी श्री को किस करने से इनकार किया है. हालांकि, मीरा का दिल भी श्री की तरफ झुक रहा है इसलिए वो उसके गाल पर अपने इस झुकाव की एक छोटी सी छाप दर्ज कर आई है. फिल्म की शुरुआत में आपको दिखाया जा चुका है कि मीरा नियम-कायदों की लकीर पर चलने वाली आदर्श स्टूडेंट, स्कूल टॉपर टाइप है और आचरण का अनुशासन बनाए रखने में काफी यकीन रखती है. मगर अगले ही सीन में ये लड़की बाथरूम में नहाते हुए अपनी कलाई को होठों में चूम रही है.
कलाई पर होठों को दो तीन अलग-अलग तरीकों से रखकर देखती, महसूस करती मीरा को देखकर आपको समझ आता है कि पिछले सीन में वो श्री से बचकर क्यों निकल आई थी. उसके संकोच में, उसकी झिझक में आचरण की कोई दीवार लांघने का डर नहीं था. हिचकिचाहट ये नहीं थी कि वो इस दीवार के उस पार जाने के लिए तैयार नहीं थी. संकोच था तो इस बात का कि उसे दीवार लांघना आता ही नहीं है. बाथरूम का ये सीन देखकर आप समझ जाते हैं कि मीरा अब दीवार की आजमाइश कर चुकी है और अब इसे लांघने के लिए तैयार है. ये शुची तलाटी की फिल्म Girls Will Be Girls है, जो अमेजन प्राइम है रिलीज हुई है.
टीनएज से जवानी की तरफ जाते कदमों में एक अलग सा उछाल होता है. एक नई दुनिया को खोज लेने, उसे समझ लेने और जीत डालने का उत्साह इस टाप को उछाल देता है. मगर उन कदमों में एक संकोच भी होता है, ये संकोच कि आपको कुछ पता ही नहीं है, ये डर कि आप जिंदगी की क्लास में अभी नौसीखिए हैं.
सिनेमा, खासकर इंडियन मेनस्ट्रीम सिनेमा जब टीनएज की दहलीज को लांघते किरदारों को दर्ज करता है तो अक्सर तीन चीजें होती हैं- नायक / नायिका के अल्हड़पन को चीरकर एक हीरो या हीरोइन बना डालने की जल्दबाजी. टीनएज के एडवेंचर (या मिसएडवेंचर!) की सनसनीखेज कुलबुलाहाटों को दिखाकर, दर्शकों में गुदगुदी पैदा करने की कोशिशें. या फिर ट्रेजेडी के बाद वाले दरदरे जीवन का बोझ कन्धों पर ढो रहा किरदार दिखाकर दर्शकों की संवेदना को झकझोर देने का आवेग.
Girls Will Be Girls की सबसे बड़ी अचीवमेंट ये है कि ये टीनएज की दहलीज बैठे संकोच, दुनियावी कायदे-कानून न समझ पाने की झल्लाहट, एक नए संसार में कदम रखने के उल्लास और उसके साथ आए स्ट्रगल को पूरी सुंदरता के साथ दिखाती है. सुंदरता स्टोरीटेलिंग का सबसे महत्वपूर्ण शब्द है.
क्या है फिल्म की कहानी?
Girls Will Be Girls सिर्फ मीरा (प्रीति पानिग्रही) की कहानी नहीं है. ये उसकी मां अनिला (कनी कुसरुती) की भी कहानी है. अनिला जब उम्र के उस दौर में थी, जहां अब मीरा है तो वो एक बागी लड़की थी. फिर अनिला को प्यार हुआ और उसने शादी कर ली. जिससे शादी की वो अब नौकरी के लिए घर से दूर रहने वाला पति है और जब घर आता है तो उसे बेटी के मार्क्स और उसकी स्कर्ट की लंबाई की चिंता रहती है. अपने वक्त की एडवेंचरस, बागी और अल्हड़ लड़की अनिला को अब ये चिंता ज्यादा है कि उसका पति उसकी बेटी की गलत परवरिश या कम मार्क्स के लिए उसे दोष ना देने लगे.
मीरा अपने पिता की तरह बनना चाहती है. वो लगभग वही आदर्श लड़की है जो उसे उसका पिता बनाना चाहता है. वो इतनी आदर्श है कि उसे अपनी मां का खुलापन भी नहीं समझ आता. इन मां-बेटी का रिश्ता, इस रिश्ते की गलतफहमियां और कन्फ्यूजन Girls Will Be Girls की टेंशन है. इस टेंशन की एंट्री कहानी में तब होती है जब मीरा के दिल की खिड़की, श्री (केशव विनय किरण) के लिए खुलने लगती है. और इधर बेटी के लिए खुला दिल दिखाने वाली अनिला अपने घर के दरवाजे श्री के लिए खोल देती है.
श्री, एक डिप्लोमेट का बेटा है और उसकी पढ़ाई विदेशों में हुई है. वो अपनी उम्र के हिसाब से ज्यादा समझदार है और यही बात मां-बेटी दोनों को इम्प्रेस कर रही है. अनिला को वही डर हैं जो 18वें साल की दहलीज पर खड़ी हर बेटी की मां को होते हैं. मीरा को उन्हीं चीजों की चिढ़ है जो 18वें की दहलीज लांघने को तैयार टीनएजर्स को, पेरेंट्स की बंदिशों से होती हैं.
मां-बेटी के इस पर्सनल संसार की कहानी के साथ, फिल्म में समाज की भी कहानी है. मीरा के हॉस्टल की एक वार्डन है जो लड़कियों को उनकी स्कर्ट की लंबाई और लड़कों से उचित दूरी बताने में कभी पीछे नहीं हटती. कुछ लड़के हैं जो लड़कियों की स्कर्ट की लंबाई ऊंची होते ही अपना लेवल गिराने के लिए तैयार बैठे रहते हैं. ऊंची स्कर्ट पहनने वाली लड़कियां हैं, जिन्हें मीरा बहुत जज करती है. यहां देखें फिल्म का ट्रेलर:
बहुत खूबसूरत है फिल्म का ट्रीटमेंट
शुची तलाटी की फिल्म की सबसे बड़ी खूबसूरती इसकी ईमानदारी है. कहानी का अपना एक संसार है, जो अपनी जगह पर बिल्कुल रियल जिंदगी की तरह चल रहा है. स्कूल की असेम्बली हो या टीचर्स डे का मौका, Girls Will Be Girls में सबकुछ इतना रियल है जो आपको अपनी स्कूली जिंदगी में देखा हुआ लगेगा. इस कहानी का संसार एफर्ट लगाकर दर्शकों को इम्प्रेस करने के लिए रचा हुआ नहीं फील होता. इसलिए इमोशंस को महसूस करने की जगह मिलती है.
कैमरा यहां दीवार में बने किसी झरोखे की तरह काम करता है, जिससे आप मीरा का संसार देख रहे हैं. किरदारों के एक्सप्रेशन, उनके जेस्चर और बॉडी लैंग्वेज से आप समझते हैं कि उनके दिमाग में क्या चल रहा है. टीनएजर किरदार की कहानी में उसके सेक्सुअल एडवेंचर भी हैं. मगर ये सनसनी भरी गुदगुदाहट वाले नहीं हैं, बल्कि आप किरदार की वो नजर महसूस कर पाते हैं जिससे वो खुद को नए तरह से देख रहा है.
मीरा और श्री एडवेंचर करते हुए नहीं, इसे महसूस करते दिखते हैं. इस एडवेंचर को महसूस कर रही मीरा का संकोच, घबराहट और बेचैनी आपको दिखती है. इन सीन्स को जेस्चर्स के जरिए बेहद खूबसूरती से फिल्माया गया है. Girls Will Be Girls आपको सबकुछ कहकर नहीं बताती, आपको उस माहौल में छोड़ देती है और आपका दिमाग फिल्म की ले में खुद चलता है. चुप्पियां बोलती हैं और साउंड इतना अच्छा है कि फिल्म देखने का अनुभव ईजी बना रहता है.
एक्टर्स का शानदार काम
प्रीति पानिग्रही ने मीरा के रोल को जैसे उतारा है वो अपने आप में एक देखने लायक चीज है. क्लोज-अप शॉट्स में उनके चेहरे का एक-एक मसल, कहानी का इमोशन आपतक डिलीवर करता है. उनकी स्माइल जितनी प्यारी है, वो सामने आने में उतना ही संकोच करती है क्योंकि मीरा तो एक 'सीरियस' लड़की है न!
अनिला के रोल में कनी कुसरुती ने जादू किया है. जब वो अपनी पुरानी यादों को जीती अधेड़ महिला वाले मोड में हैं, तो आपको उनके अंदर की लड़की की एनर्जी बहुत संक्रामक लगती है. लेकिन मीरा के सामने आते ही वो लड़की जैसे चुटकी बजाते मां के रोल में आ जाती है, वो ट्रांजीशन अद्भुत है. केशव ने श्री के रोल में एक चार्म और सच्चाई भरी है. उनका किरदार जो कुछ कर रहा है, बोल रहा है, उसमें आपको यकीन होता है. और सही मौके पर केशव की आंखों में शैतानी भी पर्याप्त दिखती है.
शुची ने जैसे ये कहानी कही है वो अपने आप में डायरेक्शन की मास्टरक्लास है. ये जिंदगी का एक टुकड़ा उठाकर उसकी कहानी कहती फिल्म है और इसमें दर्शक को बांधकर रखने की कोशिश या एफर्ट नहीं है. लेकिन Girls Will Be Girls के नैरेटिव पर शुची का इतना कंट्रोल है कि आप इस कहानी के साथ-साथ खुद चलने लगेंगे. फिल्म की एडिटिंग, साउंड, लाइटिंग और कैमरा वर्क सब बहुत मजबूत है और ये बतौर दर्शक आपके एक्सपीरियंस को बहुत बेहतर बनाता है. हालांकि, मीरा के पिता के किरदार को थोड़ा और बेहतर दिखाया जा सकता था. कहीं-कहीं पर कुछ कनफ्लिक्ट बड़ी आसानी से हल होते लगते हैं. मगर इसे नैरेटिव की जरूरत मानकर हैंडल किया जा सकता है, इससे आपका एक्सपीरियंस खराब नहीं होता.
Girls Will Be Girls आपके साथ रहने वाली, आपके चहरे पर मुस्कराहट छोड़ने वाली फिल्म है. इसे देखते हुए आपको टीनएज की दहलीज पर जिए हुए अपने कई अनुभव और डर भी याद आएंगे. स्कूल लाइफ की मिठास के साथ, उसकी निर्दयिता को भी फिल्म खूबसूरती से दिखाती है. टीचर्स डे के माहौल में सेट क्लाइमेक्स कमाल का है. और जब फिल्म मां के बालों में तेल लगाती बेटी के सीन पर खत्म होती है तो इमोशंस का एक पूरा सागर आपको उमड़ता महसूस होगा.