विद्युत जामवाल की पहचान एक्शन हीरो के रूप में होती है. जामवाल की भुजाओं पर निर्भर कमांडो सीरीज की फिल्में सफल भी रही हैं. इनमें बदले की आग में जलते हुए जामवाल को देखा गया है. प्रेम की अभिव्यक्ति में वो वैसे तो कम ही फिट बैठते हैं लेकिन 'खुदा हाफिज' में यह रिस्क लिया गया है. हालांकि, डायरेक्टर असमंजस की डोर से बंधे रहे हैं कि एक्शन ज्यादा दिखाना है कि प्रेमी का रूप. लेकिन जामवाल का एक्शन और लोकेशंस आकर्षित करते हैं.
खुदा हाफिज की कहानी पुरानी है लेकिन तड़के नए तलाशे जाने की कोशिश की गई है. फिल्म की खासियत ये है कि आप देखना शुरू करेंगे तो देखते ही जाएंगे. लेकिन आखिरी तक जाते-जाते फिल्म इतने सवाल छोड़ जाएगी जिसके जवाब फिल्म बनाने वाले ही दे पाएंगे. हां, फिल्म में नायिका का रोल करने वाली लड़की आपको याद रहेगी. खास तौर से उसकी खूबसूरती, उसकी आंखें, उसकी हंसी, उसका दर्द, उसकी तड़प.
खुदा हाफिज की ये है स्टोरी
खुदा हाफिज में डायरेक्टर दिखाना क्या चाहता है यही इस फिल्म का सबसे बड़ा सस्पेंस है. लखनऊ में एक हिंदू लड़के की मुस्लिम लड़की से अरेंज मैरिज हो रही है. जिस लड़की के हिंदू पिता ने मुस्लिम लड़की से बड़ी लड़ाइयों के बाद शादी की थी. समीर और नरगिस की शादी में कुबूल है, कुबूल है, कुबूल है...भी होता है और सात फेरे भी. 2007-08 का वो मंदी का दौर होता है और समीर व उनकी शरीक-ए हयात दोनों की नौकरी चली जाती है. 3 महीने घर बैठने के बाद दोनों खाड़ी देशों में नौकरी के लिए एक एजेंट के माध्यम से अप्लाई करते हैं. नरगिस की नौकरी पहले लग जाती है नोमान में. नोमान वैसे तो सऊदी अरब का एक आईलैंड है लेकिन वहां पर इतनी आबादी और इतने लोग भी हैं यह शायद फिक्शन की देन है.
जो लड़की कभी लखनऊ से बाहर नहीं निकली है वह अकेले नोमान जाने के लिए तैयार हो जाती है. समीर उसे जाने भी देता है. इन मसलों में परिवार कहीं नहीं आता. न मायके का न ससुराल पक्ष का.
नोमान में जाकर नरगिस गायब हो जाती है. समीर को उसकी आखिरी कॉल तब मिलती है जब वह गुलाब के फूलों को पानी दे रहा है. यह कौन सा बिंब या प्रतीक है समझ में नहीं आता. पुलिस के साथ समीर एजेंट के पास पहुंचता है. एजेंट बताता है कि नरगिस तो मिली ही नहीं नोमान में. इसके बाद समीर नोमान पहुंच जाता है. वहां उसे टैक्सी ड्राइवर उस्मान मिलता है. इसके बाद शुरू होती है नरगिस को खोजने की समीर की जंग.
समीर का मिशन इम्पॉसिबल
जिस नंबर से नरगिस ने आखिरी बार कॉल की थी वह नंबर बंद आता है. समीर नंबर के आधार पर एड्रेस का पता कर वहां तक पहुंचने में सफल रहता है जहां नरगिस को जिस्मफरोशी के लिए रखा गया है. इससे पहले वह इंडियन एंबेसी से मिल चुका है. लेकिन अफसर बाहर हैं और उसे कोई मदद नहीं मिल पाती. फिल्म में एक सीन आता है जिसमें समीर को उस्मान का साथी बताता है कि नरगिस जिस्म का धंधा करने वालों के चंगुल में फंस गई है. जामवाल की बेबसी यहां देखी जा सकती है लेकिन चेहरे और आंखों में दर्द, आक्रोश और पीड़ा का जो भाव आना चाहिए उसमें कमी दिखाई देती है. इसके बाद नरगिस का पता लगाने के बाद भी यही हाल होता है. शरीर के दूसरे हिस्से चेहरे से ज्यादा प्रतिक्रियां दे रहे होते हैं. यहां चेहरे और आंखों के एक्सप्रेशन की कमी को दूसरे हिस्से से पूरा करने की कोशिश की गई है. समीर बेहोश नरगिस को लेकर निकलता है लेकिन गुंडे उसके अरमानों पर पानी फेर देते हैं और नरगिस उनके चंगुल में ही रह जाती है. यानी मिशन इम्पॉसिबल रह जाता है.
नरगिस को छुड़ाने में जामवाल का एक्शन तो दिखता है लेकिन कुछ ऐसा नहीं है जिसे यादगार माना जाए. इसके बाद पुलिस समीर को अरेस्ट कर लेती है. यह कहानी का फ्लैशबैक होता है. इसके बाद कहानी आगे बढ़ती है. इंडियन एंबेसी दखल दे चुकी होती है. फिक्शनल देश में जांच की कमान सेना के दो अफसरों को सौंपी जाती है. गैंग को यह पता चल जाता है और वो एक लड़की की लाश जला कर फेंक देते हैं जिसकी पहचान समीर नरगिस के रूप में करता है. यहां भी एक्सप्रेशन की कमी झलकती है. समीर जिससे मुहब्बत करता है उसकी जान जाने पर न चीत्कार है, न रुदन है, न पीड़ा की अभिव्यक्ति है, समीर को काठ मार गया है. यह स्क्रिप्ट का हिस्सा भी हो सकता है और अभिनेता के अभिनय को ढकने की कोशिश भी. समीर को मुआवजे की रकम मिलती है और इंडिया का रिटर्न टिकट लेकिन वह एयरपोर्ट से भाग जाता है. वह धंधा कराने वाले दरिंदे तक पहुंचता है और नरगिस ही नहीं कई लड़कियों को बचाने में सफल होता है. फिल्म का अंत सुखद है लेकिन सस्पेंस ऐसे रखे गए हैं जो दर्शक को पहले से ही पता रहते हैं.
फिल्म बहुत सारे सवाल छोड़ जाती है. एक हिंदू लड़के की मुस्लिम लड़की से अरेंज मैरिज होती है. यह क्या सोचकर दिखाया गया है समझ में नहीं आता. हां इसके बाद परिवार कहीं दिखाई नहीं देता, सुख के दिन तो आए नहीं, दुख में भी नहीं. समीर नोमान में नरगिस की तलाश में भटक रहा है लेकिन एक बार भी परिवार से बात नहीं होती. ऐसा कौन सा देश है जहां हर तीसरा आदमी हिंदी बोलता है. हालांकि टोन अरबी होती है. यह ऐसी मूवी है जिसके एक चौथाई संवाद न हिंदी में हैं न अग्रेंजी में, कई जगहों पर अंग्रेजी सब टाइटल से काम चलाना पड़ता है.
फिल्म के दो गाने 'आप हमारी जान बन गए' और 'आखिरी कदम तक' उतनी देर ही जुबां पर चढ़ते हैं जितनी देर आप फिल्म देख रहे होते हैं. ऐसा लगता है कि विद्युत जामवाल को एक प्रेमी के रूप में दिखाने का प्लान बना लेकिन बाद में उनके एक्शन का मोह नहीं छोड़ पाए. प्रेम में वह डूब नहीं पाए और एक्शन का बड़ा स्कोप बन नहीं पाया.
जामवाल कमांडों सीरीज की फिल्मों में अपनी शर्ट उतारते रहे हैं लेकिन इस फिल्म में उसका मौका भी नहीं मिला. हालांकि जितनी देर भी एक्शन का मौका मिला जामवाल ने ठीक-ठाक किया है. फिल्म की लोकेशंस भी ठीक-ठाक हैं. अन्नू कपूर ने पठान के रोल में अच्छा करने की कोशिश की है लेकिन शुरूआत में वह बुजुर्ग से लगते रहे बाद में बीमार. नरगिस के रूप में शिवालिका ओबेरॉय बहुत कम समय तक पर्दे पर रहीं लेकिन जितनी देर भी रहीं उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सका. अपने से दोगुने उम्र के नायक के साथ काम करके वह हाजिरी दर्ज कराने में सफल रही हैं. अच्छे अवसर मिलें तो वो यादगार रोल कर सकती हैं.