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Liger Review: विजय देवरकोंडा की जबरदस्त परफॉर्मेंस, लेकिन स्टोरी की लगा दी 'वाट'

लाइगर की रिलीज से पहले इसका एक स्पोर्ट्स एंथम रिलीज किया गया था, जिसके बोल हैं वाट लगा देंगे. लगता है फिल्म की पूरी टीम ने इस एंथम को कुछ ज्यादा ही सीरियसली ले लिया है और कहानी की वाट लगा दी है. तभी एक स्पोर्ट्स ड्रामा के जॉनर में बनी यह फिल्म बुरी तरह से निराश करती है.

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विजय देवरकोंडा
विजय देवरकोंडा
फिल्म:लाइगर
2/5
  • कलाकार : विजय देवरकोंडा, अनन्या पांडे, राम्या, रोनित रॉय, चंकी पांडे, माइक टायसन
  • निर्देशक :पुरी जगन्नाथ

अर्जुन रेड्डी, गीता गोविंदम, डियर कॉमरेड जैसी फिल्मों में अपनी पावरपैक्ड परफॉर्मेंस के बाद से विजय देवरकोंडा ने न केवल साउथ बल्कि नॉर्थ बेल्ट ऑडियंस को अपना दीवाना बना दिया. एक लंबे समय से हिंदी दर्शक विजय के बॉलीवुड डेब्यू का इंतजार कर रहे थे. वहीं विजय ने भी अपने फैंस की ओर कदम बढ़ाते हुए पैन इंडिया फिल्म लाइगर से अपने ग्रैंड डेब्यू का मन बनाया. अब दर्शक उनके लिए कितने वेलकमिंग होने वाले हैं, ये तो बॉक्स ऑफिस पर हुई कमाई ही तय करेगी. लेकिन उससे पहले पढ़ें ये रिव्यू...

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कहानी
बनारस से मुंबई शहर में बसे लाइगर (विजय देवरकोंडा) और उसकी मां बालमणि (राम्या कृष्णन) अपने मरे हुए पिता व पति की आखिरी ख्वाहिश को पूरा करना चाहते हैं. बालमणि चाहती है कि उसका बेटा एमएमए (मार्शल आर्ट्स) की दुनिया में नाम कमाए. चाय बेचकर अपनी जीविका चला रहे मां-बेटे की बॉन्डिंग अलग है. यहां मां स्ट्रॉन्ग है और बेटे को रफ एंड टफ बनाना चाहती है. लाइगर के हकलेपन की वजह से अक्सर उसका मजाक बनाया जाता रहा है. लाइगर देश के बेस्ट कोच (रोनित रॉय) से फाइटिंग सीखना चाहता है, लेकिन पैसे नहीं हैं. ऐसे में वो उनके इंस्टीट्यूट में झाड़ू-पोछा कर उनके साये में रहना चाहता है. इस दौरान अपनी हिम्मत और बेहतरीन फाइटिंग स्किल से कोच का दिल जीतने में कामयाब होता है. लाइगर को ट्रेनिंग के दौरान एक ही वॉर्निंग दी जाती है कि वो अपना सारा फोकस फाइटिंग पर रखे और लड़कियों से दूर रहे. हालांकि किस्मत उसे सोशल मीडिया सेलिब्रिटी तान्या (अनन्या पांडे) के करीब ले आती है. अब लाइगर अपने करियर या लड़की किसे चुनता है? 2 घंटे 20 मिनट की कहानी कैसे आगे बढ़ती है? ये जानने के लिए आपको थिएटर जाना होगा.

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डायरेक्शन
पैन इंडिया के तर्ज पर बनाई गई इस फिल्म में आपको साउथ फ्लेवर ज्यादा मिलने वाला है. हालांकि हिंदी दर्शकों के बीच पैन इंडिया को स्टैबलिश करने के लिए जबरदस्ती बनारस शहर के नाम को ठूंसा जरूर गया है, जो कहीं से भी कन्विंसिंग नहीं लगता है. डायरेक्शन और स्टोरी राइटिंग के मामले में फिल्म औसत से भी खराब है. साउथ में अपनी एक्शन भरी फिल्मों के लिए पहचाने जाने वाले डायरेक्टर पुरी जगन्नाथ यहां भी अपने उसी अंदाज में नजर आते हैं. एक्शन सीक्वेंस को उन्होंने फिल्म में खूबसूरती से पिरोया है, लेकिन स्क्रिप्टिंग के मामले में राइटर के रूप में फेल हो गए हैं. कहानी की नींव इतनी कमजोर है कि फिल्म में मौजूद आई कैचिंग एक्शन सीन्स, एक्सॉटिक लोकेशन, विजय की दमदार परफॉर्मेंस भी इसे बचा नहीं पाते हैं और एक समय के बाद फिल्म ऊबाऊ सी लगने लगती है. कहानी के मामले में फिल्म कमजोर तो है ही, लेकिन इस फिल्म में विजय अपनी पुरानी गलती दोहराते हुए नजर आते हैं. अर्जुन रेड्डी फिल्म में सेक्सिज्म को जस्टिफाई करने वाले विजय ने वही भूल यहां भी कर दी है. मसलन कई ऐसे सीन्स हैं, जो महिलाओं के लिए ऑफेंसिव हो सकते हैं. एक सीन के दौरान रोनित रॉय विजय को फोकस होने का मतलब समझाते हुए कहते हैं कि लड़कियों से दूर रहो. मानो लड़कियां ही लड़कों की करियर के बीच रोड़ा हों. गर्लफ्रेंड को चुड़ैल का टैग देना, एक और सीन जहां तान्या का भाई स्टैमर करते लाइगर से आई लव यू बोलने की शर्त पर बहन को ले जाने की बात कहता है, जैसे कि बहन नहीं कोई ट्रॉफी या सामान हो. हालांकि सेकेंड हाफ के दौरान कार चलाती तान्या द्वारा बोले गए मोनोलॉग में सेक्सिज्म के डैमेज को कंट्रोल करने की पूरी कोशिश होती है, लेकिन उसका खास असर नहीं पड़ता दिखता है. हां, क्लाइमैक्स के पहले कुछ मिनट वाले सीन्स जहां इंटरनैशनल स्टार माइक टायसन की फाइटिंग का सीक्वेंस है, आपको सीटी बजाने पर मजबूर कर सकते हैं लेकिन उन्हीं कुछ मिनटों में आपको मजा आता है.

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टेक्निकल
टेक्निकली फिल्म बहुत खूबसूरत लगती है. सिनेमैटोग्राफर विष्णु शर्मा ने अपना काम उम्दा किया है. मुंबई शहर हो या लॉस वेगास कैमरे में बहुत खूबसूरत लगता है. शॉट दर शॉट फ्रेम किए गए सीन्स लार्जर दैन लाइफ वाली फीलिंग देते हैं. जुनैद सिद्दीकी की एडिटिंग भी कमाल की रही. इस फिल्म में फाइट मास्टर्स के काम को सराहना चाहिए. पूरी फिल्म में एक्शन सीन्स बहुत ही स्मूथ और दमदार लगे हैं. फिल्म में सुनील कश्यप का बैकग्राउंड स्कोर जबरदस्त है. बैकग्राउंड स्कोर की मदद से एक्टर्स के इमोशन व एक्शन और भी दमदार जान पड़ते हैं. हां, ओवरऑल म्यूजिक  की बात करें, तो खूबसूरत लोकेशन और स्टाइलिश कपड़े ही अच्छे लगते हैं आप उसमें इतना खो जाते हो कि गाना नोटिस नहीं कर पाते हैं. गाने ऊबाऊ लगते हैं, किसी तरह के इमोशन जगा पाने में म्यूजिक बुरी तरह से असफल रहा है. हिंदी डबिंग विजय ने खुद की है, जो कहीं से भी एक मुंबई में पले बढ़े बनारसी लड़के से मेल नहीं खाती है, यहां टेक्निकल फॉल्ट साफ नजर आता है.

एक्टिंग
लाइगर के किरदार में विजय देवरकोंडा जमे हैं. उनकी परफॉर्मेंस बेस्ट रही है. एक्शन सीन्स करते वक्त विजय काफी स्टाइलिश भी नजर आते हैं. एक हकले लड़के के मिजाज को उन्होंने खूबसूरती से पकड़ा है, पूरी फिल्म के दौरान विजय की एक्टिंग का बार ऊपर ही गया है. अनन्या पांडे के किरदार को ऐसा ही दिखाया जाना था, एक बिना दिमाग के इंफ्लूएंसर के हाव-भाव को उन्होंने बखूबी पकड़ा है. हालांकि उनके किरदार की स्क्रिप्टिंग पूअर रही है, जिसे समझने में दर्शक कंफ्यूज हो सकते हैं और अनन्या के किरदार के सुर को पकड़ नहीं सकते हैं. टफ मां के रूप में राम्या कृष्णन स्ट्रॉन्ग लगी हैं लेकिन कई जगहों पर उनके एक्सप्रेशन बाहुबली की शिवगामी की याद दिला जाते हैं. ऐसा लगा कि बाहुबली के किरदार को यहां लाकर रख दिया हो. कोच के रूप में रोनित रॉय की परफॉर्मेंस परफेक्ट रही है, उन्होंने अपने किरदार को पूरी ईमानदारी से जिया है. यहां अनन्या के स्क्रीन पिता बने चंकी पांडे फैंस के लिए सरप्राइज एलिमेंट का काम करते हैं. चंकी फिल्म में बहुत ही हैंडसम लगे हैं. माइक टायसन इस फिल्म के आखिरी कुछ मिनट में आते हैं और सारा लाइमलाइट ले जाते हैं.

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क्यों देखें
इंटरनैशनल रेसलर द माइक टायसन के साथ इंडियन हीरो की फाइट कौन एक्शन लवर मिस करना चाहेगा. एक्शन लवर्स इस फिल्म को एक मौका दे सकते हैं. हां अगर आप कहानी ढूंढने के मकसद से फिल्म देखने का मन बना रहे हैं, तो घनघोर निराशा हाथ लगने वाली है. विजय देवरकोंडा के फैंस, जिन्हें एक लंबे समय से उनके बॉलीवुड डेब्यू का इंतजार था, वो जरूर जाएं क्योंकि विजय ने अपना काम पूरी ईमानदारी के साथ किया है. अगर कहानी के पार्ट को इग्नोर करें, तो ओवरऑल फिल्म वन टाइम वॉच है.

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