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Maidaan Review: जोश-जज्बे और बहुत सारे इमोशन्स से भरी है 'मैदान', बेमिसाल हैं अजय देवगन

हमारे देश के इतिहास में ऐसे कई लोग रहे हैं, जिन्होंने हमारे देश को ऐसे मुकाम पर पहुंचाया, जिसकी उम्मीद किसी ने कभी की ही नहीं थी. ऐसे ही एक शख्स थे सैयद अब्दुल रहीम. अब रहीम की कहानी को सुपरस्टार अजय देवगन अपनी फिल्म 'मैदान' के साथ पर्दे पर लाए हैं. फिल्म देखने से पहले पढ़िए हमारा रिव्यू.

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मैदान के पोस्टर में अजय देवगन
मैदान के पोस्टर में अजय देवगन
फिल्म:मैदान
4/5
  • कलाकार : अजय देवगन, गजराज राव, प्रियमणि, चैतन्य शर्मा
  • निर्देशक :अमित शर्मा

हम सभी को सुपरहीरोज की कहानियां पसंद होती हैं. सुपरमैन, बैटमैन, स्पाइडर-मैन... सुपरहीरो हमारे बीच रहने वाले आम दिखने वाले लोग ही तो होते हैं, जिनके पास हमसे थोड़ी ज्यादा ताकत होती है. जो हर मुश्किल का सामना करने के लिए सबसे आगे होते हैं. जिनके लिए मुश्किल से मुश्किल चीज मुमकिन होती है. जिंदगी की भागदौड़ में हम काल्पनिक कहानियों में इतना खो जाते हैं कि असल जिंदगी के 'सुपरहीरोज' पर हमारा ध्यान ही नहीं जाता. ऐसे ही एक अनजाने 'सुपरहीरो' की कहानी को फिल्म 'मैदान' के साथ लेकर अजय देवगन बड़े पर्दे पर आए हैं.

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क्या है फिल्म की कहानी?

हमारे देश के इतिहास में ऐसे कई लोग रहे हैं, जिन्होंने हमें दुनिया की नजरों में जगह दी. एक ऐसे मुकाम पर पहुंचाया, जिसकी उम्मीद किसी ने कभी की ही नहीं थी. ऐसे ही एक शख्स थे सैयद अब्दुल रहीम. रहीम साहब ही वो शख्स हैं जिन्होंने भारत की कई फुटबॉल टीम को एशियन गेम्स में उसका पहला गोल्ड मेडल दिलवाया था. उनकी हिम्मत और जज्बे पर बनी फिल्म 'मैदान' काफी धमाकेदार है. इस फिल्म में फुटबॉल के साथ-साथ पॉलिटिक्स, रोमांच और इमोशन्स भी हैं.

फिल्म की कहानी की शुरुआत होती है साल 1952 से, फुटबॉल के मैच को भारत के खिलाड़ी नंगे पैर खेल रहे हैं. किसी के पैर में चोट लगती है तो कोई दूसरे खिलाड़ी को टैकल करने में पीछे रह जाता है. इसी तरह भारतीय टीम मैच हार जाती है. कलकत्ता के फेडरेशन ऑफिस में भारतीय फुटबॉल टीम की हार का ठीकरा सैयद अब्दुल रहीम (अजय देवगन) के सिर फोड़ा जाता है. रहीम कहते हैं कि अगर हार की जिम्मेदारी उनकी है तो अपनी टीम का चुनाव भी वो खुद करेंगे. इसके बाद वो निकल पड़ते हैं देशभर में अपनी टीम के लिए बेस्ट खिलाड़ियों की तलाश करने.

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कलकत्ता से लेकर सिकंदराबाद, केरल और यहां तक की पंजाब तक घूम-घूमकर रहीम अपनी टीम तैयार करते हैं. इस टीम में पीके बनर्जी (चैतन्य शर्मा), चुनी गोस्वामी (अमर्त्य रे), जरनैल सिंह (दविंदर गिल), तुलसीदास बलराम (सुशांत वेदांडे) और पीटर थंगराज (तेजस रविशंकर) संग कई बढ़िया खिलाड़ी शामिल हैं. यही वो टीम है जिनके साथ खून पसीने की मेहनत कर रहीम एशियन गेम्स स्वर्ण पदक जीतना चाहते हैं. 

फेडरेशन में बैठे शुभांकर सेनगुप्ता, रहीम साहब को पसंद नहीं करते और टॉप न्यूजपेपर के सीनियर जर्नलिस्ट रॉय चौधरी (गजराज राव) रहीम को भारतीय फुटबॉल टीम के कोच की पोजीशन से बेदखल करने के लिए ऐड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं. इस मंजिल में ढेरों कांटे हैं, एक से बढ़कर एक चुनौती है और दुश्मन जब घर के अंदर ही बैठा हो, तो मंजिल तक पहुंचना और मुश्किल हो जाता है. ऐसे में किस तरह सैयद अब्दुल रहीम और उनकी फुटबॉल टीम एशियन गेम्स 1962 के स्वर्ण पदक तक पहुंचेगी, यही फिल्म में देखने वाली बात है.

फिल्म मैदान से कुछ सीन

हंसाती-रुलाती है फिल्म

बीते कुछ वक्त में हमने बहुत-सी स्पोर्ट्स ड्रामा और स्पोर्ट्स बायोपिक फिल्में देखी हैं. लेकिन किसी में भी वो बात नहीं थी, जो आपके रोंगटे खड़े कर दे. लेकिन वो फिल्म आ गई है. 'मैदान' में वो सबकुछ है, जो एक बढ़िया, दिल-खुश करने वाली और रुला देने वाली स्पोर्ट्स बायोपिक मूवी में होता है. ये पिक्चर पहले कुछ सीन्स से ही आपको अपने साथ बांध लेती है. फिर आप रहीम साहब के और रहीम साहब आपके हो जाते हैं. वो अपनी टीम जोड़ते रहते हैं और आप उनके सफर में उनके साथी बने सबकुछ देखते हो. उनका हंसता-खेलता परिवार, उनकी नौकरी की चुनौतियां और खिलाफ होने वाली साजिश, सब आपके अंदर अलग-अलग इमोशन्स उजागर करती हैं. खिलाड़ियों के गोल पर आप तालियां बजाते हैं, तो उन्हें चोट लगने पर परेशान होते हैं. रहीम की बेबसी देखकर आपका दिल दुखता है और उनका दर्द आपकी आंखों में आंसू लाता है.

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परफॉरमेंस

परफॉरमेंस की बात करें तो मैं सबसे पहले बात गजराज राव की करूंगी. उनका किरदार इतना खराब है कि आपको उसे देखकर उससे नफरत हो जाएगी. मन करेगा कि 'बट्टे से इस आदमी का मुंह कूच दिया जाए' (ये लाइन मेरी मां यूज करती है जब उन्हें किसी की कोई बात पसंद नहीं आती). और यही दिखाता है कि गजराज कितने बढ़िया एक्टर हैं. उन्होंने अपने किरदार को इतने कमाल तरीके से पकड़ा है कि आपको हर सीन में उनसे नफरत होगी. उनका किरदार रहीम को किसी तरह चैन नहीं लेने देता, लेकिन जब उसे उसका सबक मिलता है, तो माशाल्लाह मजा आ जाता है.

फुटबॉल टीम के खिलाड़ियों के रोल में चैतन्य शर्मा, अमर्त्य रे, दविंदर गिल, सुशांत वेदांडे, तेजस रविशंकर, ऋषभ जोशी, अमनदीप ठाकुर, मधुर मित्तल, मननदीप सिंह संग सभी एक्टर्स ने कमाल का प्रदर्शन किया है. अपने खेल से वो हर सीन को जोश से भरा बनाते हैं. पर्दे पर फुटबॉल खेलते दिखने के लिए सभी ने बहुत मेहनत की है और ये बात आप उनकी परफॉरमेंस में साफ देख सकते हैं. इसी के साथ कास्टिंग डायरेक्टर्स की तारीफ करनी भी बनती है. रवि आहूजा और उनकी टीम ने एक से बढ़कर एक एक्टर को खिलाड़ी के रूप में लिया है. कुछ नए और कुछ जाने-माने चेहरों को इस फिल्म में देखना काफी रिफ्रेशिंग था. रहीम की पत्नी के रोल में प्रियमणि का काम अच्छा है. उन्होंने अपने छोटे से रोल को बखूबी निभाया है. इसके अलावा फिल्म से जुड़े अन्य एक्टर्स ने भी अपने किरदारों के साथ काफी हद तक न्याय किया है.

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बेमिसाल हैं अजय देवगन

अब बात आती है हमारी फिल्म के हीरो की. अजय देवगन बढ़िया एक्टर हैं ये बात सभी जानते हैं. उन्होंने कई अलग-अलग किरदारों को निभाया है. वो सिंघम का रोल भी आसानी से कर लेते हैं और गोपाल बनकर दर्शकों को हंसा भी लेते हैं. लेकिन शायद बहुत लंबे वक्त के बाद उन्हें किसी ऐसे सीरियस और इमोशन्स से भरे रोल में देखा गया है. सैयद अब्दुल रहीम के रोल के साथ उन्होंने पूरा न्याय किया है. पर्दे पर अजय को देखते हुए आपको लगेगा कि अगर रहीम साहब को कभी सामने से देखने का मौका मिलता, तो वो ऐसे ही होते. फिल्म के पहले हाफ में आप रहीम बने अजय देवगन को खुशी और जोश में देखते हैं. इंटरवल के बाद जो होता है उसमें वो एकदम अलग इंसान बन जाते हैं. उनका जुनून, उनका दर्द, उनका हौसला-हिम्मत, सब आपको अपने अंदर महसूस होता है. ये वही अजय देवगन है, जो बीते कई सालों से हमने पर्दे पर नहीं देखा है. फिल्म के क्लाइमैक्स सीन तक आपकी धड़कनें तेज होती चली जाती हैं और के अंत में अजय आपको रुला ही देते हैं. ऐसा ना जाने कितने सालों में नहीं हुआ. ये बहुत आसानी से अजय देवगन की बेस्ट परफॉरमेंस में से एक कही जा सकती है.

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फिल्म मैदान के एक सीन में अजय देवगन

डायरेक्शन और म्यूजिक

अजय देवगन की तरह डायरेक्टर अमित रवीन्द्रनाथ शर्मा ने भी साबित कर दिया कि वो 'बधाई हो' जैसी फिल्म से आपको हंसाना और 'मैदान' जैसी फिल्म से रुलाना और गर्व महसूस करवाना जानते हैं. फिल्म की राइटिंग टीम आकाश चावला, सिद्धांत मगो, अरुणाव जॉय, रितेश शाह ने बहुत रिसर्च करके इस कहानी को लिखा है. टीम की लिखाई के साथ पूरा न्याय करते हुए अमित शर्मा ने पूरी पिक्चर को फ्रेम टू फ्रेम बुना है. सिनेमेटोग्राफर तुषार कांति रे और अंशुमान सिंह ठाकुर का काम बढ़िया है. स्पोर्ट्स सेगमेंट्स की सिनेमेटोग्राफी Andrey Valentsov ने बेमिसाल तरीके से की है. तीन घंटे लंबी इस फिल्म को देखते हुए आप थकते नहीं हैं, बल्कि इसे और देखना चाहते हैं. इस फिल्म को देखते हुए वैसी ही फीलिंग आती है, जैसी पहली बार 'चक दे इंडिया' देखकर आई थी.

ए आर रहमान का म्यूजिक भी कमाल का है. 'मिर्जा' से लेकर 'दिल नहीं तोड़ेंगे' तक सभी गाने स्क्रीनप्ले में परफेक्ट फिट होते हैं. लेकिन ए आर रहमान की आवाज में 'जाने दो' गाना, आपकी आंखें नम करेगा. फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर भी काफी बढ़िया है. सालों से इस फिल्म का इंतजार किया जा रहा है और इसे देखने के बाद कहा जा सकता है- 'देर आए, दुरुस्त आए'. 

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