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घिसी-पिटी कहानी और महा कमजोर एक्टिंग से रुला रुलाकर मारा कंगना रनोट की 'रज्जो' ने

अगर आपको लगता है कि आपमें धैर्य कूट कूट कर भरा है और इस यौगिक दैवीय गुण का इम्तिहान लेना चाहते हैं, तो रज्जो जरूर देखिए. फिल्म को आधा स्टार दिया गया है उस विकट साहस और धैर्य के लिए जिसके साथ इत्ते सारे लोगों ने ये फिल्म बनाई.

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फिल्म समीक्षा: रज्जो
एक्टर: कंगना रनोट, पारस अरोड़ा, महेश मांजरेकर, प्रकाश राज
डायरेक्टर: विश्वास पाटिल
ड्यूरेशन: 2 घंटा 17 मिनट
पांच में आधा स्टार

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अस्सी के दशक में किन्हीं दुर्जन को फिल्मी कहानी लिखने का फितूर सवार हुआ. उन्होंने तय किया कि एक दुखियारी तवायफ की जिंदगी को दिखाया जाए. फिर उसकी लाइफ में एक कुंवारा कम उम्र आशिक आए और दोनों दुनिया की तमाम बुरी ताकतों और यकीनों से लड़ते हुए अपना आशियाना बनाएं और फिर बचाएं. कहानी में और हूल देने के लिए हिजड़ों के कुछ किरदार डाल दिए गए, ताकि मर्दानगी के नाम पर औरत को बाजार में बेचने बैठानों वालों के मुंह पर और तमाचा पड़े. इस तरह कहानी पूरी हुई. भाई साहब के भीतर का सज्जन जागा और उन्हें समझ आया कि इसका कुछ होना जाना नहीं है. वे भूल गए और किस्सा भूत हो गया.

फिर बीस तीस बरस बाद ये भूत विश्वास पाटिल पर सवार हो गया. उन्हें इस कहानी का इल्म हुआ. तय किया कि जी फिल्म बनाई जाए. एक्ट्रेस कंगना रनोट के पास पहुंचे. पर्दे पर तवायफ रज्जो का रोल निभाना खासा चुनौती भरा होता है, इस सीख के साथ कंगना ने हामी भर दी. बताते हैं कि अपने रोल को असल दिखाने के वास्ते उन्होंने कई कोठों में जाकर वेश्याओं और नाचने वालियों को करीब से देखा और समझा. युवा आशिक चंदू के रोल के लिए ऑडिशन हुए और वीर शिवा जी नाम के सीरियल में लीड रोल करने वाले पारस अरोड़ा पर आकर सुई टिकी. हिजड़ों के मुखिया बेगम के रोल में फिल्म वास्तव से वास्तविक संभावनाएं जगाकर फिर गुम हो गए डायरेक्टर और एक्टर महेश मांजरेकर को लिया गया और लीड विलेन भांडे भाई के रोल के लिए आए एक्शन फिल्मों के कॉमिक क्रूर खलनायक प्रकाश राज.

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यहां तक पढ़ने में फिल्म दुरुस्त राह पर बढ़ती लग रही है, मगर यकीन मानिए ये बेहद अझेल और पकाऊ है. इतनी कि जो पूरी फिल्म देखेगा, वो अपना नाम किसी वीरता पुरस्कार के लिए भेज सकता है. फिल्म की कहानी कहानी के नाम पर एक कतल का जी पैदा करने वाला मजाक है. चंदू क्रिकेटर है और हारमोनियम भी अच्छी बचाता है. पिता प्रोफेसर हैं. एक दिन मैच जिताता है अपनी टीम को तो कार गैराज चलाने वाला उसका अधेड़ दोस्त और टीम स्पांसर उसे मजे कराने के लिए कोठे पर ले पहुंचता है. यहां चंदू की मुलाकात होती है रज्जो से जो गजब का नाचती है और हालात के चलते यहां आ फंसी है.

हालात क्या. ये भी सुन ही लीजिए. एक पहाड़ी गांव की प्यारी सी बच्ची थी, जिसे उसकी सगी बहन और जीजा मुंबई ले आए और एक हिजड़े बेगम को बेच दिया कुछ पैसों के लिए, ताकि वे मुंबई में फ्लैट खरीद सकें. बहरहाल, चंदू रज्जो मिलते हैं और प्यार होता है. फिर एक टुंटपुजिए समाजसेवी के विचारों के आवेग में आकर दोनों ब्याह कर लेते हैं. बात बात पर रज्जो को पीटने वाला बेगम इस पर ऐतराज नहीं करता. उधर एक डांस बार के जरिए और पैसे कमाने की आस में रज्जो का मालदार ग्राहक भांडे भाऊ जब उसके लिए कोठे पर पहुंचता है, तो पता चलता है कि रज्जो तो गई ब्याह करके. वो बौखला जाता है. उधर घर वालों से तिरस्कार झेल रहे ये प्यार के पंछी एक ग्रामीण से शहरी इलाके में नए सिरे से जिंदगी संवारने की कोशिश कर रहे हैं. फिर शुरू होती है प्यार की जंग. वैसे लड़ाई आप भी लड़ रहे होते हैं राम राम कर इस फिल्म के पूरे होने के इंतजार में.

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कंगना रनोट बेहद बनावटी और कच्ची लगी हैं रज्जो के रोल में. उनके चेहरे पर भाव इस तेजी से बदलते हैं कि आप संवेदना के बजाय सिटपिटा से जाते हैं. पारस अरोड़ा निरा बालक है और अभी टीवी पर ही जोर आजमाइश करे तो बेहतर. महेश मांजरेकर को बेकार में खरच दिया गया. प्रकाश राज को इस तरह के रोल में देख ऊंघ सी महसूस होती है.

गाने के नाम पर एक जुल्मी रे जुल्मी है, जिसमें कंगना से ऐसे नाच करवाया जा रहा है, कोरस गर्ल्स के साथ, गोया किसी फिल्म अवॉर्ड के शो के मंच पर ठुमके लग रहे हों. बाकी जो हैं, सो हैं और एक भयानक फिल्म में अपने हिस्से का योगदान देते हैं.

अगर आपको लगता है कि आपमें धैर्य कूट कूट कर भरा है और इस यौगिक दैवीय गुण का इम्तिहान लेना चाहते हैं, तो रज्जो जरूर देखिए. फिल्म को आधा स्टार दिया गया है उस विकट साहस और धैर्य के लिए जिसके साथ इत्ते सारे लोगों ने ये फिल्म बनाई.

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