Mrs Undercover Review: घर पर पत्नी का सम्मान न करना, उसे यह कहना कि 'तुम सिर्फ एक हाउसवाइफ' हो, आपकी नजर में ये दोनों बातें आखिर कितनी सही है? क्या हमारे जहन में उनकी कोई वैल्यू नहीं जो घर संभालती हैं, घर में मौजूद हर व्यक्ति का ध्यान रखती हैं, हर किसी के नखरे उठाती हैं और फिर दिन के अंत में अगर वह खुद के लिए कुछ करना भी चाहती हैं तो पति उन्हें रोक देते हैं. क्यों, उनका मन नहीं? वह अपने सपने नहीं पूरे कर सकतीं? क्या उन्हें इतना हक नहीं कि वह वो चीज कर सकें, जिन्हें करके उन्हें खुशी मिल सकती है? ऐसे कई सवाल आपके भी मन में आएंगे 'मिसेस अंडरकवर' देखते हुए. टाइटल से ही जैसे की पता लगा रहा है कि एक हाउसवाइफ है और वह अंडरकवर एजेंट है. तो आपको बता दें कि कहानी भी बस इतनी ही है.
क्या है कहानी?
कहानी की शुरुआत होती है उस कॉमन मैन (सुमीत व्यास उर्फ अजय) से जो लड़कियों को डेट करता है और फिर उनकी अचीवमेंट्स के बारे में जानकर जल-भुन जाता है. उन्हें मौत के घाट उतार देता है. देश के कई शहरों में वह यह काम करके आ चुका होता है पर उसे न तो पुलिस पकड़ पाती है और न ही कोई एजेंट. चौंकाने वाली बात यह होती है कि यह कॉमन मैन दिखता कॉमन है, रहता कॉमन मैन की तरह है, पर इरादे इसके नेक नहीं होते. शुरू में तो यह गिनता है कि इसने कितनी लड़कियों का खून किया है, पर बाद में यह कुछ बड़ा प्लान करता है. कोलकाता की मुख्यमंत्री को बम से उड़ाने का और शॉकिंग बात ये होती है कि इस काम में एक महिला इनका साथ दे रही होती है.
इसी के पैरलल चलती है राधिका आप्टे (दुर्गा) की कहानी जो एक हाउसवाइफ हैं. सास- ससुर, पति, बच्चे को संभालने के साथ घर का सारा काम करती हैं. अनाथ होती हैं, अपना कोई नहीं होता तो स्पेशल फोर्स ज्वॉइन करके देश के लिए कुछ अलग करने का सपना बुनती है. यही स्पेशल फोर्स इनकी शादी कर देती है. चार साल तक बच्चा पैदा न करने की जिद लगाकर रखती हैं और फिर हारकर बच्चा कर लेती हैं. इसी तरह 10 साल गुजर जाते हैं. एक हिम्मती अंडरकवर एजेंट से यह नॉर्मल हाउसवाइफ बन जाती हैं.
और फिर एक दिन आता है इन्हें कॉन्टैक्ट करने का. कॉमन मैन को पकड़ने में इनकी मदद लेने का. स्पेशल फोर्स के चीफ कोलकाता आकर इन्हें हुलिया बदल- बदलकर मनाने की कोशिश करते हैं. वह 'सिर्फ एक हाउसवाइफ' नहीं, इसके बारे में समझाते हैं. घर पर राधिका खुद ट्रेनिंग लेती हैं और जासूसी करके किस तरह कॉमन मैन को पकड़वाती हैं, यह कहानी है.
डायरेक्शन
इस कहानी को लिखा और डायरेक्ट जो किया है, वह अनुश्री मेहता ने किया है. कहानी के प्वॉइंट ऑफ यू की बात करें तो फिल्म देखते- देखते आप अंदाजा लगाते रहेंगे कि आगे क्या होने वाला है. कुछ खास राधिका का इन्होंने एक्शन नहीं दिखाया है, जिस तरह से अंडरकवर एजेंट्स का दिखाना बनता था. रही बात किरदारों की तो वह भी कुछ बड़े पैमाने पर कास्ट नहीं किए गए. बहुत आसानी से पूरी कहानी को एक घंटे 45 मिनट में निपटा दिया गया. फिल्म है तो सस्पेंसिव पर न तो आपको इसमें थ्रिलर दिखेगा और न ही सस्पेंस. इतना जरूर दिखेगा कि एक हाउसवाइफ कितनी आसानी से कॉमन मैन तक पहुंच जाती है जो पुलिस और स्पेशल फोर्स नहीं पहुंच पाती.
म्यूजिक
फिल्म में केवल एक गाना है, वह भी एकदम आखिर में. जिसमें राधिका स्टेज पर डांस करते- करते अपने मिशन की ओर मुड़ जाती हैं. कॉमन मैन को आसानी से मारकर जीत हासिल कर लेती हैं. और जिस बम से कोलकाता की मुख्यमंत्री को उड़ाने का कॉमन मैन प्लान बनाता है, उस बम को राधिका डिफ्यूज भी कर देती हैं. तो इसलिए म्यूजिक के प्वॉइंट ऑफ व्यू से कुछ खास उम्मीद मत लगाइएगा.
एक्टिंग कैसी दिखी?
राधिका ने अपने रोल के साथ जस्टिफाई किया है. हाउसवाइफ के गेटअप में एक्ट्रेस सिम्पल और सोबर लगी हैं. वहीं, एक्शन जो किया है, वह भी ठीक- ठाक नजर आया है. पर एक प्वॉइंट फिल्म को देखते हुए ऐसा जरूर आ जाएगा कि आप बोर हो जाएंगे. शायद बीच में इस फिल्म को बंद करके आप कोई और फिल्म देखने लगें. सुमीत व्यास का रोल काफी इंटेंस दिखाने की कोशिश की है, पर वह अपने रोल को जस्टिफाई नहीं कर पाए. विलेन वो भी सुमीत व्यास, शायद गलत चुनाव रहा.
क्यों देखें?
अगर आप राधिका आप्टे के काम को पसंद करते हैं या उनके बहुत बड़े फैन हैं, तभी इस फिल्म को देखें. वरना हम तो आपको यही कहेंगे कि हल्की- फुल्की कॉमेडी के लिए और भी अच्छी फिल्में हैं.