अनुभव सिन्हा की फिल्म भीड़ ट्रेलर रिलीज के बाद से ही विवादों में घिर गई थी. बताते चलें फिल्म के पहले ट्रेलर में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आवाज और एक डायलॉग जहां कोरोना के कहर से पैदा हुई स्थिति को 1947 के दौरान के विभाजन से कंपेयर किया गया था. इन दो चीजों को लेकर लोगों ने आपत्ति जताई थी, जिसे लेकर खूब बवाल हुआ. यहां तक की सिल्वर स्क्रीन पर रिलीज होने से पहले ही फिल्म को 'भारत विरोधी' करार दे दिया गया था. बढ़ते विवाद को देखते हुए आखिरकार मेकर्स को न केवल ट्रेलर, बल्कि फिल्म में बहुत से बदलाव करने पड़े. अब इन बदलावों का असर क्या फिल्म पर पड़ा है? पढ़ें ये रिव्यू...
कहानी
फिल्म 'भीड़' के जरिए कोरोना के दौरान हो रहे पलायन से जूझ रहे लोगों की अलग-अलग कहानियों को समेटने की कोशिश की गई है. गरीब-बेबस मजदूरों का एक तबका है, जो इस आपदा में अपने घर-गांव व अपने लोगों के बीच जाना चाहता है. एक पुलिस फोर्स डिपार्टमेंट है, जो सिस्टम और इन पलायित मजदूरों की जिद्द के बीच फंसा हुआ है. इसके अलावा एक रिपोर्टर और उसकी टीम है, जो दुनिया को सच दिखाने की पुरजोर कोशिश में है. और एक हाई सोसायटी से आती मां है, जो हॉस्टल में फंसी अपनी बेटी को लेने निकली है. इन सभी वर्ग के लोगों के बीच जो बात कॉमन है, वो है अनदेखी-अनसुनी बीमारी का खौफ और सिस्टम के सामने बेबसी.
डायरेक्शन
कोरोना जैसी त्रासदी को सब्जेक्ट बनाकर कईयों ने उसे एक्स्प्लोर किया है. कुछ समय पहले ही मधुर भंडारकर की सीरीज रिलीज हुई थी, जो चार कहानियों को समेटे हुई थी. इसके अलावा कुछ शॉर्ट फिल्म्स भी बने हैं. अनुभव सिन्हा ने इसमें कोई जल्दबाजी न करते हुए अपना वक्त लेकर 'भीड़' फिल्म बनाई है. बिना किसी शुगर कोटिंग के सच को हमेशा दर्शाने वाले अनुभव का साहस इस फिल्म में भी दिखता है. सिस्टम के प्रति अपनी नाराजगी, लाचारी, अफसोस, हर उस इमोशन को डायरेक्टर ने कहानी के धागों में पिरो दिया है. कमाल की बात यह भी है कि उन्होंने किसी मुद्दे व सिचुएशन को अति करने की कोशिश नहीं की है. जो कुछ भी घटनाएं घटी हैं, उन सबको दर्शकों के सामने परोस दिया है.
साथ ही अनुभव ने कहानी के लेयर में समाज की कुछ ऐसी कुरीतियों पर भी फोकस किया है, जिससे हम आज भी जुझ रहे हैं. कास्ट-क्लास डिफरेंस ईश्यू को प्रॉमिनेंट तरीके से हाईलाइट किया है. फिल्म की शुरुआत ही बहुत मार्मिक तरीके से होती है. जो आपको डिस्टर्ब कर देती है. इसके बाद जैसे कहानी बढ़ती जाती है, कोरोना काल से जुड़ी यादें आपके जहन में भी ताजा होने लगती है. फिल्म फर्स्ट हाफ से लेकर सेकेंड हाफ तक आपको बांधे रखती है.
कुछ सीन्स देखकर आपके रौंगटे खड़े होते हैं, खासकर जब सीमेंट वाली मशीन से निकलते हुए मजदूरों को दिखाया जाता है, इसके अलावा ट्रेन की पटरी पर सोए कुछ मजदूरों के समूह पर ट्रेन का गुजरना, भूख से बिलखते बच्चे, और साइकिल पर अपने पिता को घर ले जाती एक लड़की, हर फ्रेम में एक नई कहानी सी दिखती है.
टेक्निकल
अमूमन फिल्मों में इंटेंस या जटिल सीन दिखाने के दौरान स्क्रीन के कलर पैलेट के साथ एक्स्पेरिमेंट होते रहे हैं. अनुराग कश्यप, विशाल भारद्वाज जैसे कुछ डायरेक्टर्स हैं, जिनकी ज्यादातर फिल्में डार्क ब्लू, ग्रीन या फिर रेड टोन के पैलेट में दर्शायी गई हैं.
वहीं भीड़ में भी पूरी फिल्म को ब्लैक ऐंड वॉइट में दिखाने के पीछे डायरेक्टर की मंशा साफ नजर आती है. अनुभव पूरी फिल्म को बेरंग कर यह मैसेज देना चाहते हैं कि जिंदगी से अगर आपके रंग उड़ जाए, तो क्या होगा. फिल्म देखने के दौरान आप इस एक्स्पेरिमेंट संग सहज होते जाते हैं. फिल्म में केवल दो गाने हैं और वो कहीं से भी कंटीन्यूटी में खलल नहीं डालते बल्कि उस वक्त के इमोशन को और ज्यादा कॉन्ट्रास्ट करते हैं.
सौमिक मुखर्जी की सिनेमैटोग्राफी बेमिसाल रही, स्क्रीन पर कोरोना के दौरान हुए पलायन को पूरी तरह जस्टिफाई करती है. दिल्ली के बस स्टैंड पर लिए गए कुछेक एरियल शॉट्स फिल्म की खूबसूरती को बयां करते हैं. फिल्म में बैकग्राउंड स्कोर काफी कम लेकिन सटीक जगहों पर इस्तेमाल किया गया है, जिसने इमोशन को जगाने में फ्यूल का काम किया है. ओवरऑल फिल्म आपको परेशान तो जरूर करती है लेकिन इसकी ऐंडिंग देखकर आपको थोड़ी सी राहत तो जरूर मिलेगी.
एक्टिंग
फिल्म की कास्टिंग इसका एक मजबूत पक्ष है. दमदार एक्टर्स को देखकर ऐसा लगता है मानों अनुभव सिन्हा ने आधी जंग पहले ही जीत ली हो. पंकज कपूर, वीरेंद्र सक्सेना, आशुतोष राणा जैसे दिग्गजों का एक्स्पीरियंस और राजकुमार राव, भूमि पेडणेकर, कृतिका कामरा जैसे स्टार्स की फ्रेशनेस फिल्म को बखूबी ब्लेंड करती है. राजकुमार राव ने कमाल का काम किया है, उन्होंने समाज के उस कंडीशनिंग को बहुत ही सटीक तरीके से दिखाया है कि अगर दलित समाज का लड़का सिस्टम में ऑफिसर बन भी जाए, तो कैसे उसे ऑर्डर देने में हिचक होती है.
सिक्योरिटी गार्ड बने पंकज कपूर और वीरेंद्र सक्सेना अपने किरदार में बहुत ही सहज लगते हैं. भूमि पेडनेकर और दीया मिर्जा की परफॉर्मेंस भी परफेक्ट रही. यहां आशुतोष राणा के बारे में यह कहना गलत नहीं होगा. वो जिस भी किरदार में होते हैं, उसे शानदार करते हैं. रिपोर्टर के रूप में कृतिका कामरा सरप्राइज करती हैं. इतने बड़े एक्टर्स के बीच भी वो अपनी मौजूदगी दर्ज करा जाती हैं. पुलिस अधिकारी बने आदित्य श्रीवास्तव ने भी अपने किरदार के साथ पूरा न्याय किया है.
क्यों देखें
कोरोना सब्जेक्ट पर अनुभव सिन्हा की भीड़ एक बेहतरीन व सटीक फिल्म है. फिल्म आपको इमोशनल कर देगी और मजदूरों संग क्या गुजरी है, उसे और करीब से बताती है. सशक्त अभिनेताओं की मौजूदगी से बनी इस फिल्म को एक मौका जरूर दिया जा सकता है. दावा है निराशा हाथ नहीं लगेगी.