आज के यूथ ने सोशल मीडिया को ही अपनी जिंदगी मान ली है. अक्सर हम किसी के वीडियो वायरल या MMS लीक होने जैसी खबरों का सामना करते रहते हैं. 'सजनी शिंदे का वायरल वीडियो' की कहानी भी एक ऐसी लड़की की बात करती है, जिसका एमएमएस लीक हो गया है.
कहानी
पुणे शहर के एक स्कूल में साइंस टीचर सजनी शिंदे (राधिका मदान) अपने स्कूल की कुछ कलिग के साथ ऑफिशियल ट्रिप पर सिंगापुर जाती है. संयोग से सजनी का जन्मदिन भी उसी वक्त पड़ता है, जिसे सेलिब्रेट करने सभी क्लब जाते हैं. इसी बीच क्लब में किए सजनी के एक डांस का वीडियो वायरल हो जाता है. वीडियो के वायरल होने के बाद सजनी की जिंदगी में भूचाल आ गया है. स्कूल से निकाल दी गई सजनी को परिवार और मंगेतर का भी सपोर्ट नहीं मिलता है. ऐसे में सजनी अचानक से सोशल मीडिया पर एक पोस्ट लिख कर गायब हो जाती है, जिसमें वो अपने पिता और मंगेतर को इसका जिम्मेदार ठहराती है. फिल्म यहीं से दिलचस्प मोड़ लेती है. पुलिस के इस जांच में कई नाम सामने आते हैं. कौन असली गुनहगार है, बस इसी तर्ज पर कहानी आगे बढ़ती जाती है.
डायरेक्शन
फिल्म के डायरेक्शन की जिम्मेदारी मिखिल मुसाले ने संभाली है. मिखिल वहीं हैं जिन्हे अपनी डेब्यू फिल्म 'रॉन्ग साइड राजू' के लिए नैशनल अवार्ड मिल चुका है. मिखिल इस फिल्म के जरिए समाज की एक बहुत बड़ी सच्चाई का आइना दिखा जाते हैं. एक जरूरी मुद्दे को मिखिल सस्पेंस का रूप देकर उसे दिलचस्प बना देते हैं. फिल्म का स्क्रीनप्ले टू द प्वाइंट है, जो इसका मजबूत पक्ष है.फर्स्ट हाफ से लेकर क्लाइमैक्स तक फिल्म कसी हुई नजर आती है.आखिर सजनी के साथ क्या हुआ जानने की उत्सुकता अंत तक बनी रहती है.
फिल्म के जरिए समाज में चल रहे कई मुद्दे को एक धागे में पिरोने की कोशिश सफल नजर आती है. मसलन पितृसत्तात्मकता सोच, खोखला फेमिनिसिज्म, सोशल मीडिया को अपनी जिंदगी समझने वाले यूथ, स्कूलों में प्रतिष्ठा का बिना वजह वाला दबाव, एक थिएटर आर्टिस्ट का कमर्शियल प्रोजेक्ट्स को लेकर अप्रोच, इमेज को कैसे पॉलिश किया जाए उसमें मीडिया का सहयोग, इन तमाम पहलुओं को एक कहानी में समेटा गया है. चूंकि कहानी पुणे में बेस्ड है, तो इसमें मराठी भाषा की अधिकता शायद दर्शकों के लिए बोझिल हो सकती है. ओवरऑल डायरेक्शन में मिखिल सौ प्रतिशत खरे उतरते हैं.
टेक्निकल
पुणे शहर और उसके मिजाज को फिल्म पूरी तरह जस्टिफाई करती है. कुछ शॉट्स स्क्रीन पर खूबसूरत लगते हैं. सिनेमेटोग्राफर फिल्म का फ्लेवर स्क्रीन पर सटीक तरीके से परोसते हैं. एडिटिंग भी कसी हुई है. हां, फिल्म का टोन थोड़ा डार्क रखा गया है, जो इसके सस्पेंस थ्रिल को जस्टिफाई करता है. बैकग्राउंड स्कोर भी कहानी के थ्रिल को इमोट करने में फ्यूल का काम करते हैं. फिल्म के डायलॉग पर मेहनत भी पूरी दिखती है. मसलन औरत कोई आधार कार्ड नहीं कि कहीं भी इस्तेमाल कर लो जैसे कई वन लाइनर्स फिल्म में बखूबी इस्तेमाल किए गए हैं.
एक्टिंग
फिल्म की कास्टिंग के लिए इसे फुल मार्क्स मिलने चाहिए. उम्दा कास्टिंग, एक लंबे समय के बाद इतने बेहतरीन एक्टर्स का समायोजन इस फिल्म को स्पेशल बनाता है. पुलिस इंस्पेक्टर के रोल में निम्रत कौर का काम उभर कर नजर आता है. एक आघाती टीचर के रूप में राधिका मदान ने किरदार में अपनी जान डाल दी है. पिता और थिएटर आर्टिस्ट के रूप में सुबोध भावे का काम एक्सेप्शनल रहा है, कई फ्रेम में वो गुरुदत्त की याद दिला जाते हैं. सब इंस्पेक्टर के रूप में चिन्मय मंडेलकर का काम सटीक है. यहां वकील के रूप में किरण कर्माकर भले काम वक्त के लिए नजर आते हैं लेकिन छा जाते हैं. प्रिंसिपल बनी भाग्यश्री भी अपने किरदार के साथ पूरा न्याय करती नजर आती हैं. मंगेतर बने सोहम मजूमदार का किरदार प्रभाव छोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ता है.
क्यों देखें
एक बेहतरीन फिल्म है, जो समाज का आइना बनकर आपको खुद के अंदर झांकने पर मजबूर करती है. इसके साथ ही इसमें सस्पेंस थ्रिलर का बोनस डोज मिलता है. फिल्म को एक मौका जरूर देना चाहिए.