हर फिल्म समीक्षक को साल-दो साल में कोई न कोई ऐसी फिल्म टकराती है, जिसे देखने वाला वो थिएटर में अकेला होता है. 'सरफिरा' देखने जाने से पहले भी इस नाचीज के खाते में ऐसी कोई दर्जन फिल्में दर्ज हैं. और ऐसा नहीं है कि ये सभी फिल्में बुरी थीं, उनमें से कुछेक अच्छी भी थीं.
बस, वो शायद इतनी एक्साइटिंग नहीं थीं कि नोएडा के किसी कम पॉपुलर थिएटर में फर्स्ट डे-फर्स्ट शो के लिए दर्जन भर लोग जुट जाएं. लेकिन ये उम्मीद कभी दूर-दूर तक नहीं थी कि थिएटर में अकेले बैठकर कभी बॉलीवुड स्टार अक्षय कुमार की फिल्म देखी जाएगी.
अक्षय के टिपिकल किरदारों से अलग रंग का किरदार
हालांकि, इंटरवल के वक्त थिएटर में अकेले बैठे होने का एक फायदा है कि सोच डिस्टर्ब करने वाला कोई नहीं होता. और तब ध्यान आता है कि अक्षय ने लंबे वक्त बाद जमीन से जुड़ा, लगातार सिस्टम और पावरफुल लोगों से रगड़ा जाता कोई किरदार निभाया है. जहां उन्हें किसी व्यक्ति या किसी गर्व को डिफेंड करने की जरूरत न हो बल्कि अपने लिए लड़ना हो. ऐसा किरदार आखिरी बार उन्होंने शायद 'खट्टा मीठा' (2010) में निभाया था, और स्ट्रगलिंग आदमी के रोल में ऐसी थोड़ी बहुत झलक 'रक्षा बंधन' (2022) में भी दिखी थी.
'सरफिरा' अक्षय को देखने के लिए एक अच्छी डिफरेंट फिल्म है, जिसमें वो सैनिक-स्पेशल एजेंट-देश के रक्षक या स्वयं भगवान के रोल में नहीं हैं. और उनके पास उनके सबसे फेवरेट परफॉरमेंस वाले टूल कॉमेडी को इस्तेमाल करने का ऑप्शन भी नहीं है. ऐसे में अक्षय ने ये तो दिखाया है कि उनका एक्टिंग टैलेंट थोड़ा और भी है, जिसे वो जरूरत पड़ने पर झाड़-पोंछ के बक्से से निकालकर बड़े पर्दे पर दिखा सकते हैं.
कहानी
'सरफिरा' शुरू होती है डेक्कन एयरवेज के एक प्लेन की खतरनाक लैंडिंग से. ये प्लेन अक्षय के किरदार वीर जगन्नाथ म्हात्रे का सपना है. फिल्म फ्लैशबैक में जाकर बताती है कि एयर फोर्स से रिजाइन करके आ रहे कैप्टन वीर ने कम कीमत वाली एयरलाइन का सपना क्यों देखा. वो अपने पिता का घर छोड़ कर एक बंजर जमीन पर झुग्गी बनाकर क्यों रह रहा है और कैसे उसकी लाइफ में उसकी पत्नी, रानी (राधिका मदान) की एंट्री होती है.
आम आदमी को हवाई यात्रा करने के लिए सस्ती एयरलाइन शुरू करना वीर का सपना है और रानी अपनी बेकरी शुरू करना चाहती है. अक्षय से 20 साल छोटी राधिका का होना फिल्म शुरू में ही जस्टिफाई कर देती है. दोनों अपने किस्म के 'येड़े' (सनकी) हैं जिन्हें कोई पार्टनर मिलना लगभग असंभव है. हालांकि इस जस्टिफिकेशन के बावजूद दोनों एक्टर्स की उम्र का अंतर पचा पाने में थोड़ा समय लगता है.
वीर अपने दो साथियों के साथ अपने सपने को पूरा करने में लग जाता है. मगर उसके रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा है परेश गोस्वामी (परेश रावल) जिसने खुद एक छोटे से गांव से आकर देश की सबसे बड़ी एयरलाइन्स में से एक को खड़ा किया है और पूरा सरकारी तंत्र उसकी जेब में है.
पाई-पाई को जूझता वीर, कैसे सपना देखने की जुर्रत करता है और उसके लिए अपनी जान लगा देता है. यही फिल्म की कहानी है. और कहानी में ये भी है कि ऐसा सपना देखने वालों की हिम्मत को ही खा जाने वाले परेश से उबरकर वीर कैसे अपना हवाई सपना पूरा करता है.
फिल्म का खट्टा-मीठा
'सरफिरा' नेशनल अवॉर्ड विनिंग तमिल फिल्म 'सोरारई पोटरू' का हिंदी रीमेक है. लॉकडाउन के बीच रिलीज हुई इस फिल्म को क्रिटिक्स और लोगों की बहुत तारीफ मिली थी. मगर लॉकडाउन सभी के लिए बहुत प्रोडक्टिव नहीं रहा था और ऐसे ही मुझसे ये फिल्म मिस हुई थी. तो 'सरफिरा' मेरे लिए एक बिल्कुल फ्रेश फिल्म की तरह ही है और इसकी स्क्रिप्ट काफी टाइट बुनी हुई है. ऑरिजिनल तमिल फिल्म की डायरेक्टर सुधा कोंगरा ने शालिनी उषा देवी के साथ मिलकर फिल्म लिखी है. स्क्रिप्ट में वीर के एम्बिशन के पीछे वो इमोशनल कारण आपको पूरे दिखते हैं, जो उसे इस कदर स्ट्रगल करने के लिए मोटिवेशन देते हैं.
अकेले दुनिया से लड़ने चले फिल्मी किरदारों में अक्सर एक एंगल उनकी पर्सनल लाइफ स्ट्रगल का होता है. लेकिन रानी के मजबूत किरदार के जरिए, वीर का ये पक्ष मजबूत कर दिया गया है. वो शादी से पहले ही साफ कर देती है कि उसका अपना बिजनेस प्लान है, जिसमें उसे अपने पति का कोई दखल नहीं चाहिए. फिल्म में एक बड़े क्राइसिस के समय रानी, वीर को मदद ही करती है. इस मामले में 'सरफिरा' एक रेयर फिल्म है, जहां अपना सपना पूरा करने चले मेल किरदार की हीरोइक कहानी में, उसकी पत्नी का किरदार मजबूत है.
'सरफिरा' की एक दिक्कत ये है कि ये वीर के सपने में उसके पार्टनर बने, उसके साथ एक्स-एयरफोर्स साथियों को कुछ करने का मौका नहीं देती. एम्बिशन और मोटिवेशन से भरी ऐसी कहानियों में एक कमी ये रहती है कि हीरो की हर नई समस्या एक अच्छे प्लान की बजाय, कुछ अच्छे लोगों के जरिए होती है. 'सरफिरा' में भी कुछ ऐसा ही होता है. जबकि अगर हीरो के प्लान सॉलिड हों तो कहानी में एक अलग ही धार आ जाती है. 'सरफिरा' कम से कम इस मामले में मजबूत जरूर है कि अच्छे लोगों की मदद को भुनाने के ली हीरो के पास एक अच्छा प्लान भी है.
अधिकतर हिंदी फिल्मों की तरह 'सरफिरा' भी एक बड़े मुद्दे को बस दो लाइन में समेटकर चल देती है, जबकि ये कहानी को एक एक्स्ट्रा लेयर दे सकता था. आपने ट्रेलर में भी देखा होगा, अक्षय का डायलॉग है 'मैं कॉस्ट बैरियर के साथ-साथ, कास्ट बैरियर भी तोड़ दूंगा.' मतलब, वीर का लॉजिक ये है कि कीमत सस्ती होगी तो लोगों अपनी जाति की वजह से सोशल और फाइनेंशियल स्ट्रगल कर रहे लोगों को भी बराबरी का एक मौका मिलेगा. उसके लिए काम-धंधे के मौके बढ़ेंगे. लेकिन 'सरफिरा' शुरू से अंत तक इस 'कास्ट बैरियर' को एड्रेस करती ही नहीं है.
फिल्म के विलेन परेश गोस्वामी को 'बाथरूम साफ करने वाले' लोगों को अपने आसपास देखने से परेशानी है, उसे लिटरली किसी भी अनजान आदमी और अपने से 'छोटे' आदमी को देखकर घिन आती है. परेश जमीन से उठकर बड़ा बना है लेकिन वो नहीं चाहता कि और लोग यहां पहुंचें. वो नहीं चाहता कि कोई सफाई करने वाला, उसके या महंगा टिकट खरीदकर उसके प्लेन में बैठे पैसेंजर के पास बैठें. परेश के किरदार में अगर जाति को लेकर इतनी घिन नहीं है तो वीर 'कास्ट बैरियर' तोड़ने की बात कर क्यों रहा है?
परेश के किरदार से फिल्म एक इंटरेस्टिंग एंगल ये देती है कि एक ही तरह के बैकग्राउंड से उठे परेश और वीर, समाज को कुछ देने के मामले में कितने अलग हैं. 'सरफिरा' में फ्लैशबैक भी काफी हैं और कहानी टाइमलाइन में कई बार आगे-पीछे होती है, जो दर्शकों को थोड़ा उलझा सकता है.
सपोर्टिंग किरदारों के आपसी इंटरेक्शन, वीर को लेकर उनकी बातें और सोच कहानी को और जथोड़ा और मजबूत बनाती. मगर 'सरफिरा' अपने हीरो को लगातार फ्रेम में रखनी की कोशिश करती नजर आती है.
एक्टिंग परफॉरमेंस
अक्षय ने वीर के किरदार को उसकी पूरी इमोशनल और सनक भरी ताकत के साथ निभाया है. उन्होंने किरदार के हठी स्वभाव को अच्छे से पकड़ा है और क्लोजअप सीन्स में उनके चेहरे के बदलते एक्सप्रेशन सॉलिड हैं. हालांकि हीरो को लगातार फोकस में रखने की राइटिंग चॉइस की वजह से बात वापस वहीं पहुंच जाती है कि अक्षय का काम तो बहुत दमदार है, मगर वो लगते अक्षय कुमार ही हैं. उन्हें पूरी तरह एक किरदार की तरह देखने का मौका नहीं मिलता.
राधिका मदान को इस बार एक बहुत दमदार राइटिंग वाला किरदार मिला है जिसके साथ उन्होंने पूरा न्याय किया है. वो अपनी एक्टिंग ही नहीं, अपनी प्रेजेंस से भी अटेंशन होल्ड करती हैं. फिल्म में सपोर्टिंग एक्टर्स का भी काम अच्छा है. और सबसे दमदार, असरदार परेश रावल लगते हैं. उन्होंने परेश गोस्वामी को इतना धारदार और इरिटेटिंग बना दिया है कि ऑडियंस को अपने आप हीरो के लिए सहानुभूति महसूस होने लगती है.
कुल मिलाकर 'सरफिरा' एक ऐसी फिल्म है जिसे देखते हुए आपका अटेंशन बना रहता है. आप हीरो को सपोर्ट करेंगे. आप अक्षय कुमार को सपोर्ट करेंगे जो स्क्रीन पर मेहनत करते दिखते हैं. लेकिन सपने को पूरा करने के स्ट्रगल की कहानी एक ऐसा प्लॉट है जिसपर फिल्मों की भरमार है. ऐसे में दिलचस्पी उसी को होगी जो या तो अक्षय को देखना चाहेगा, या वो किरदार अपने सपने पूरा करता कैसे है.
इसलिए 'सरफिरा' उस तरह की फिल्म बन जाती है, जो आपके सामने चल रही हो तो आप अपने परिवार के साथ मन लगाकर देख सकते हैं. मगर इसे देखने के लिए आप पैसे और वक्त खर्च करके थिएटर तक जाना चाहेंगे या नहीं, ये पूरी तरह आपकी चॉइस से तय होगा.