किसी जादूगर के शो से ज्यादा दिलचस्प वो शो लगता है जिसमें एक आदमी जादू के ट्रिक्स का राज खोलता है. फिल्मों के मामले में ये क्राइम थ्रिलर का नीरज पांडे स्टाइल है. 'अ वेडनसडे', 'स्पेशल 26' और 'बेबी' जैसे प्रोजेक्ट्स बनाने वाले नीरज पांडे, जो अब नेटफ्लिक्स पर 'सिकंदर का मुकद्दर' फिल्म लेकर आए हैं. उनकी फिल्म की कहानी में सबसे दिलचस्प चीज सिर्फ प्लॉट का मेन इवेंट नहीं होता, बल्कि उस इवेंट की प्लानिंग सबसे ज्यादा दिलचस्प होती है.
'स्पेशल 26' में नकली सीबीआई रेड का पता असली सीबीआई को लग जाता है, फिर भी नकली रेड होती है. आपको सबसे दिलचस्प हिस्सा वो लगता है जब फिल्म बताती है कि अक्षय कुमार और उनकी नकली टीम ने, मनोज बाजपेयी और उनकी रियल टीम को छकाया कैसे. जबकि एक दर्शक के तौर पर आपका ध्यान भी उसी रेड पर लगा हुआ था, जिसमें नकली सीबीआई को दबोचने के लिए असली सीबीआई तैयार बैठी थी. नीरज पांडे आपको छकाते हैं और फिर टेबल पर बिठाकर कहते हैं, आइए मैं दिखाता हूं ये कैसे हुआ.
इसी तरह 'बेबी' में आपका सारा ध्यान विदेशी धरती पर हो रहे उस सीक्रेट ऑपरेशन पर लगा रहता है, जिसकी तैयारी शुरू से आप कहानी में देख रहे होते हैं. मगर सरप्राइज बनकर देश का सबसे बड़ा दुश्मन सामने खड़ा होता है. दर्शक हैरान बैठा है कि अब क्या? नीरज पांडे फिर कहते हैं, मैं दिखाता हूं आइए.
'सिकंदर का मुकद्दर' में भी नीरज एक क्राइम थ्रिलर लेकर आए हैं. यहां भी कहानी को दो एलिमेंट की जरूरत थी. एक जो आपको स्क्रीन पर दिखता रहना चाहिए, दूसरा वो आपकी नजरों से परे बैकग्राउंड में हो गया और नीरज पांडे आपके सामने रिवील करेंगे. क्या नीरज इस बार अपना ही स्टाइल, पूरी ईमानदारी से फॉलो कर पाए? इस सवाल का जवाब ही 'सिकंदर का मुकद्दर' का रिव्यू है....
क्या है प्लॉट?
मुंबई के एक बड़े ज्यूलरी इवेंट में रॉबरी होने की इंटेल पुलिस को मिलती है. पुलिस सारे लोगों को झट से एक सुरक्षित जगह जमा करती है और रॉबरी करने आए चार लोग ढेर कर दी जाते हैं. सब निपटने के बाद अपने ज्यूलरी स्टॉल पर वापस लौटे कामिनी सिंह (तमन्ना भाटिया) और मंगेश देसाई (राजीव मेहता) देखते हैं कि 50-60 करोड़ के 5 हीरे गायब हैं. एंट्री होती है 100% केस सुलझाने वाले रिकॉर्डधारी ऑफिसर जसविंदर सिंह (जिम्मी शेरगिल) की.
जसविंदर को को सबसे ज्यादा भरोसा अपनी मूल-वृत्ति यानी इंस्टिंक्ट पर है. उसे यकीन है कि हीरे गायब होने में कामिनी और मंगेश का हाथ है. फिर उसकी नजर सिकंदर शर्मा पर पड़ती है जिसका बिहेवियर थोड़ा अफरातफरी भरा है और वो एक आईटी प्रोफेशनल भी है. सिकंदर का कहना है कि उसकी मां बीमार है और वो लेट हो रहा है इसलिए घबरा रहा है. मगर जसविंदर को सबसे ज्यादा शक उसी पर है.
पुलिस का रूटीन प्रोसीजर शुरू हो जाता है. सिकंदर की रिमांड, पुलिस कुटाई, कोर्ट केस और बाकी सारी जांच होने लगती है. इसकी वजह से उसकी लाइफ तबाह होने लगती है, लोग चोर समझते हैं, कोई पैसों की मदद नहीं कर रहा. मामले में सिकंदर के साथी आरोपी मंगेश और कामिनी उसकी मदद करने लगते हैं. कामिनी और सिकंदर का प्रेम प्रसंग भी शुरू होता है.
इधर जांच में कुछ भी ना मिलने के बावजूद जसविंदर उसके पीछे पड़ा रहता है. फिर भी सिकंदर वापस पैर पर खड़े होने में कामयाब होता है और 15 साल में एक नई जिंदगी बना लेता है. इधर जसविंदर ने अपनी सनक में खुद की लाइफ, शादीशुदा जिंदगी खराब कर ली है. सवाल ये है कि क्या जसविंदर को अपनी गलती का एहसास होगा? और सबसे बड़ी बात ये कि अगर सिकंदर ने वो हीरे नहीं चुराए, तो चुराए किसने और कैसे? ये नीरज पांडे को रिवील करना था.
स्क्रीनप्ले में हुई गड़बड़
जसविंदर की वजह से सिकंदर की लाइफ में जो मुश्किलें आईं, वो आपको स्क्रीनप्ले में दिखाई जातीं, तो कहानी में एक इमोशनल कनेक्ट आता. लेकिन ये चीजें दिखती नहीं, बताई जाती हैं. जसविंदर माफी मांगने बैठा है तो सिकंदर बता रहा है कि उसके साथ क्या-क्या बीती. और अगर वो मुंह से बता ही रहा है, तो फिर इसे सीन्स में दिखाने की जरूरत खत्म हो जाती है. ये स्क्रीनप्ले की पहली हार है.
ऊपर से ये इतने भागते हुए अंदाज में दिखाया गया है कि आप इससे कनेक्ट ही नहीं कर पाते. सिकंदर और जसविंदर की 15 साल बाद वाली मुलाकात के बिल्ड-अप में स्क्रीनप्ले ने जरूरत से ज्यादा समय खर्च हुआ. जिस वजह से वो खोल स्क्रीनपर सही से तैयर नहीं हुआ जो सिकंदर की कहानी को करना था. फिर इस खोल में से रियल रॉबरी का रहस्य निकाला जाना था. मगर ये रहस्य खुद बहुत ढीले तरीके से बुना गया है, इसलिए जब ये खुलता है तो मजा नहीं आता.
जब कहानी में जसविंदर एक लूजर साबित हो चुका था, तो रहस्य खोलने का मौका उसे मिलना चाहिए था. मगर असली मास्टरमाइंड को सुपर-स्मार्ट दिखाने के चक्कर में स्क्रीनप्ले के साथ एक और बड़ा समझौता कर दिया गया. जब कैमरा आपके सामने खिलाड़ी का खेल रिवील करता है, तो उतना मजा नहीं आता. क्योंकि इसका सीधा मतलब है कि डायरेक्टर आपको वो दिखा रहा है. जबकि रियल खेल यही तो था ना कि असली गेम हमसे छुपाया जाना था, नकली खेल दिखाया जाना था और बड़ा पर्दाफाश होना था.
इस पर्दाफाश मोमेंट की कमी फिल्म में सबसे ज्यादा खलती है. नकली खेल इतना इमोशनल या एंगेजिंग नहीं है कि ध्यान बांध के रखे. मास्टरमाइंड के पास इतनी बड़ी रॉबरी की वजह ना तो पैशनेट थी, न इमोशनल और ना सिर्फ मजेदार. जैसे 'स्पेशल 26' में अक्षय का किरदार बस रियल सीबीआई से बदला ले रहा था क्योंकि उसे रिजेक्ट कर दिया गया था. और सबसे बड़ी बात, इस बार नीरज पांडे के पुलिस ऑफिसर में वो कैरेक्टर नहीं है जो उनके लिखे पिछले कैरेक्टर्स में रहा है. इसलिए 'सिकंदर का मुकद्दर' उठाने का सारा बोझ एक्टर्स पर आ जाता है.
एक्टर्स ने किया दमदार काम
नीरज पांडे ने अपनी पहली ही फिल्म 'अ वेडनसडे' (2008) से जिमी शेरगिल को अलग-अलग दिलचस्प किरदारों में दिखाया है. इस बार भी जिमी का काम आपको इम्प्रेस करेगा और उनके काम में एक कमाल का ठहराव है, जो आपको उनके किरदार के इमोशन तक असरदार तरीके से ले जाता है.
अविनाश तिवारी के एक्सप्रेशन, उनकी इमोशनल रेंज एक बार फिर आपको इम्प्रेस करेगी. जिमी शेरगिल के सामने अविनाश को देखने में मजा आता है. दोनों के किरदार थोड़े और दमदार लिखे गए होते तो इनकी एक्टिंग से अलग लेवल का माहौल बन जाता. तमन्ना भाटिया ने भी अपना किरदार असरदार तरीके से निभाया है.
कुल मिलकर 'सिकंदर का मुकद्दर' एक ऐसी क्राइम थ्रिलर है, जो दिखाने से ज्यादा बताती है. बस इसी वजह से इसकी धार कम होती है. और ये लंबी भी काफी लगती है. अगर आपमें धैर्य है तो कहानी का फाइनल ट्विस्ट आपको अच्छा लगेगा.