बचपन में गाहे-बगाहे हमने तरला दलाल का नाम तो जरूर सुना होगा. तरला जी हमारी रोजमर्रा की जिंदगी से ऐसी जुड़ चुकी थीं मानो वो हमारे किचन का ही कोई अहम हिस्सा हो. तरला की कुकिंग स्किल से तो हम सभी वाकिफ हैं लेकिन निजी जिंदगी में भी उनको जानना दिलचस्प होगा.
कहानी
पुणे की रहने वाली तरला(हुमा कुरैशी) जब कॉलेज में पढ़ाई कर रही होती है, तो क्लास में लेक्चर लेतीं प्रोफेसर की चाल व कॉन्फिडेंस देखकर इस कदर इंप्रेस होती हैं कि उसे भी अपनी जिंदगी में कुछ करने की ख्वाहिश जगती है. हालांकि उनका यह कुछ क्या है, उन्हें खुद भी इसका पता नहीं है. वहीं दूसरी ओर एक मिडिल क्लास परिवार से ताल्लुक रखने वाली तरला के परिवार की चाहत है कि वो जल्द ही शादी कर अपने ससुराल चली जाए. तरला को नलिन दलाल(शारिब हाशमी) देखते ही पसंद कर लेते हैं. शादी हो जाती है, बच्चे हो जाते हैं लेकिन तरला अब तक इस कुछ का पता लगाने में नाकामयाब रहती है.
हार्ड कोर वेजिटेरियन तरला को अपने पति के चुपके से नॉनवेज खाने की आदत का पता चलता है, तो वो ठानती हैं कि उन्हें वेज में ही नॉनवेज खाने का स्वाद परोसेंगी. यहां तीन बच्चों की मां बन चुकी तरला का जीवन उस वक्त एक दिलचस्प मोड़ लेता है, जब उन्हें उनकी कॉलोनी से कई लड़कियां कुकिंग सीखने की मांग करने लगती हैं. यहां से तरला अपनी कुकिंग की दुनिया में प्रवेश करती हैं और आगे कैसे उनका यह कुछ करने का सपना पूरा हो जाता है. वो जानने के लिए पूरी फिल्म देखें.
डायरेक्शन
तरला दलाल की बायोपिक से पीयूष गुप्ता अपना डायरेक्टोरियल डेब्यू करने जा रहे हैं. एक किरदार की जर्नी को पीयूष ने बहुत ही सहजता से दिखाया है. तरला की जिंदगी को पीयूष स्क्रीन पर ऐसे परोसते हैं, जिससे हर एक महिला खुद को रिलेट कर सकती है. फिल्म में तरला की जिंदगी के पर्सनल लाइफ को ज्यादा हाइलाइट किया है. तरला का प्रोफेशनल ग्राफ और उनकी सक्सेस के हिस्से पर उनका फोकस कम था. नतीजतन वो हिस्सा जहां से तरला लाइमलाइट में आईं और उनके प्रोफेशनल ग्रोथ किस तरह के रहे और सक्सेस को कैसे अचीव किया, इन सबको उन्होंने दरकिनार कर दिया. वो हिस्सा मिसिंग सा लगता है.
फिल्म एक कहानी के साथ-साथ हमारे समाज में महिलाओं के सपनों और उनकी ख्वाहिशों की भी बात करती है, जिसे कई महिलाएं जी नहीं पाती हैं. मसलन परिवार के दबाव में अक्सर शादी कर लेना, शादी करने के बाद जो मन करे वो करना, अपने काम में इतनी भी बिजी न हो जाओ कि परिवार पीछे छूट जाए, जैसे डायलॉग्स आज भी पितृसत्तात्मक सोच को जाहिर करती है. सालों से चली आ रही समाज में ये बाय डिफॉल्ट सेटिंग की तरह फिट कर दी गई है कि महिलाएं घर के साथ-साथ परिवार को भी चलाएंगी. यही वजह है अगर कभी महिला अपने परिवार से ज्यादा काम को तवज्जो देने लग जाएं, तो उन्हें खुद ही गिल्ट सा होने लगता है. एक सीन है, जहां तरला अपने काम की वजह से घर पर देर से आती हैं, ऐसे में उनकी सास जब पूछती हैं कि आटा कहां रखा है, तो तरला को इस बात का पता नहीं होना, बड़ा मुद्दा बनाकर उन्हें नीचा दिखाने की कोशिश की जाती है. इस तरह की छोटी-छोटी लेकिन जरूरी इश्यूज को बड़े ही सटल तरीके से फिल्म में दिखाने की कोशिश की गई है.
टेक्निकल एंड म्यूजिक
फिल्म में कलर टोन का खासा ख्याल रखा गया है. बैकग्राउंड और सेट देखकर आप इस बात से कन्विंस हो जाते हैं कि फिल्म 80 के दशक की कहानी कहती है. फिल्म में क्लोज फ्रेम का बहुत ज्यादा इस्तेमाल किया गया है, जिससे यह बात जाहिर होती है कि यहां कहानी से ज्यादा किरदार को तवज्जो दी जाती है. सिनेमैटिकली स्क्रीन पर फिल्म अच्छी लगती है. वहीं बैकग्राउंड म्यूजिक भी फिल्म के इमोशन को सटीक तरीके से इमोट करती जान पड़ती है. ड्रेसिंग और हेयर स्टाइलिंग का भी पूरा ख्याल रखा गया है कि किरदार 80-90 दशक की तरह दिखें. हां, एडिटिंग में पहला भाग थोड़ा खींचा सा है, जिसे एडिट टेबल पर कट कर क्रिस्प किया जा सकता था. गाने कुछ खास नहीं हैं, जो आपको याद रहें.
एक्टिंग
हुमा एक शानदार अदाकारा हैं. उन्होंने तरला के किरदार को अपने में आत्मसात कर लिया है. पूरी फिल्म में हुमा ने तरला के ग्राफ को बखूबी पकड़ा है. किरदार के उम्र में ट्रांजिशन के वक्त हुमा सहज ही दिखती हैं. हुमा कहीं से भी हमें निराश नहीं करती हैं. वे अपने किरदार में इतनी रच बस गई हैं. वहीं शारिब हाशमी भी फिल्म में हुमा को पूरी तरह टक्कर देते नजर आए. शारिब के किरदार को भी इतनी खूबसूरती के साथ लिखा गया है कि वो सपोर्टिंग नहीं बल्कि एक हीरो के तौर पर ही स्क्रीन पर उभरते हैं. अपने से ज्यादा सक्सेसफुल पत्नी के साथ होने वाले कॉम्प्लेक्स इमोशन को भी शारिब सहजता से परदे पर उतारते जाते हैं. भारती आचरेकर भी अपने किरदार में रचती नजर आईं. उन्हें देखकर ऐसा महसूस होता है कि हमारे ही किसी पड़ोस की महिला को स्क्रीन पर लाकर खड़ा कर दिया गया है. ओवरऑल कास्टिंग फिल्म की ऑन पॉइंट रही.
क्यों देखें
अगर आप खाने के शौकीन हैं और तरला दलाल के एक्सपेरिमेंटल फूड स्टाइल से वाकिफ होना चाहते हैं, तो फिल्म को एक मौका दे सकते हैं. साथ ही महिलाओं को यह फिल्म जरूर देखनी चाहिए, जिस माइल्ड टोन में उनके हक की बातें कही गई हैं, उसे देखकर आप खुद को इससे रिलेट कर पाएंगी. एक फैमिली फिल्म है और वीकेंड में ओटीटी पर इस फिल्म का लुत्फ पूरे परिवार के साथ उठाया जा सकता है.