बॉलीवुड सेलेब्स के पास दर्शकों को इंप्रेस करने का एक सिंपल फंडा है. चॉकलेटी बॉय वाली इमेज तोड़नी है तो अचानक से विलेन बन गए, अभिनेत्री हैं तो कोई फेमिनिस्ट वाला रोल प्ले कर लिया. ऐसा करते ही सक्सेस की चांसेस बढ़ जाते हैं क्योंकि दर्शकों को कुछ नया देखने को मिलता है, अब परिणीति चोपड़ा ने भी The Girl On the Train में एक डॉर्क रोल प्ले किया है. उन्हें और उनकी वजह से मेकर्स को कितनी सफलता मिली है, ये जानते हैं.
कहानी
एक बात पहले ही बता दें कि ये फिल्म एक किताब की कहानी पर आधारित है और उसी किताब पर हॉलीवुड में फिल्म भी बन चुकी है. ऐसे में कई चीजें सेम या प्रिडिक्टेबल लग सकती हैं. ये कहानी सिर्फ और सिर्फ मीरा देव (परिणीति चोपड़ा) के बारे में है जो पेशे से वकील है लेकिन पिछले एक साल से बहरूपिया की तरह इधर-उधर भटक रही है. शादी जरूर हुई है लेकिन वहां भी अलग ही सयापा हैं. एक एक्सीडेंट की वजह से मीरा का मिसकैरेज हो जाता है. वो मिसकैरेज उसे भूलने की बीमारी देता है और हर कोई उसका फायदा उठाने लगता है.
इन सवालों पर टिकी परिणीति की फिल्म
अब यहां देखने को मिलता है कहानी का दूसरा सेगमेंट जहां पर एंट्री होती है नुसरत (अदिति राव हैदरी) की जिसका बीच जंगल में मर्डर हो जाता है. उसके मर्डर के तार कहने को कई लोगों से जुड़ते हैं, लेकिन एक तार मीरा से भी जुड़ जाता है. वहीं क्योंकि मीरा को भूलने की बीमारी है, ऐसे में उसे इस मर्डर या फिर उस घटना से जुड़ा कुछ याद नहीं है. अब कहानी के इन दो सेगमेंट से ही कई सारे सवाल उठते हैं. पहला- मीरा का एक्सीडेंट किसने करवाया था? दूसरा- मीरा का नुसरत के मर्डर से क्या कनेक्शन? तीसरा- मीरा गुनहगार या फिर उसकी भूलने की बीमारी का उठाया जा रहा फायदा? रिभु दासगुप्ता निर्देशित The Girl On the Train देख इन सवालों के जवाब मिल जाएंगे.
फिल्म का सबसे बड़ा प्लस प्वाइंट
कई फिल्में ऐसी देखने को मिलती हैं जहां पर हो सकता है कि कहानी में कमी रह गई हो, डायरेक्शन में भी कमी होगी, लेकिन फिर भी क्योंकि एक्टिंग डिपार्टमेंट बढ़िया रहता है, इसलिए वो फिल्म पसंद आ जाती है. रिभू दासगुप्ता ने हमेंं जो The Girl On the Train का देसी वर्जन परोसा, वहां भी यही देखने को मिला है. परिणीति चोपड़ा ने इस फिल्म के लिए अलग ही लेवल पर मेहनत की है. परफेक्ट तो नहीं रहीं, लेकिन क्योंकि अपने कंफर्ट जोन से बाहर आईं, इसलिए तारीफ बनती है. परिणीति ने अपने दम पर ही इस ट्रेन को सही मंजिल तक पहुंचा दिया है. वहीं उस मंजिल तक की जर्नी में भी दर्शकों के लिए इतना कुछ तो रखा ही गया है कि वो बंधा रहे. कहानी स्लो हो जाती है, लेकिन आपका कनेक्शन टूटने नहीं दिया जाता. ये फिल्म का एक प्लस प्वाइंट है.
बाकी स्टार्स ने कैसा काम किया?
परिणीति के अलावा पुलिस ऑफिसर के रोल में कीर्ति कुल्हारी का काम भी सही कहा जाएगा. एक बार के लिए उनके गेट अप पर सवाल खड़े किए जा सकते हैं ( पता नहीं मेकर्स ने उन्हें पूरे समय सिर पर टर्बन पहना रखा था) लेकिन हमेशा की तरह उनकी एक्टिंग सधी रही है. मीरा के पति के रोल में अविनाष तिवारी ने भी नपा-तुला काम किया है. वहीं छोटा लेकिन जरूरी किरदार निभाने वालीं अदिति राव हैदरी भी अपने किरदार के साथ न्याय कर गई हैं. ज्यादा कुछ नहीं किया उन्होंने, लेकिन एक्टिंग Effortless लगी है.
120 मिनट बैठ फिल्म देखनी है या नहीं?
वैसे एक्टिंग के अलावा परिणीति की इस फिल्म का डायरेक्शन भी मजबूत रहा है. वहीं वाली बात रिपीट है- कहानी घुमावदार है, लेकिन कनेक्शन नहीं टूटा. मेकर्स ने एक साथ कई सीन चलाए हैं, कभी कुछ हो रहा होगा तो कभी कही और पहुंच जाएंगे. इतना घुमावदार रहने के बावजूद भी अंत में सबकुछ आराम से घुल-मिल जाता है. आप खुद ही कहानी के हर तार को जोड़ पाते हैं. अब जब-जब आपको फिल्म देख ऐसी फीलिंग आए, समझ जाएं कि मेकर्स ने सही दिशा में मेहनत की है. परिणीति चोपड़ा की इस फिल्म में ड्रामा है, सस्पेंस हैं और कई इंटेंस मोमेंट भी हैं, तो अपने 120 मिनट देकर ये फिल्म देख डालिए, निराश नहीं होंगे.