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बैड बॉयज को सेलिब्रेट करते सिनेमा में 'बैड गर्ल' पर क्यों छिड़ा पंगा? बॉलीवुड में भी ऐसी फिल्मों पर हुआ है विवाद

तमिल फिल्म 'बैड गर्ल' का टीजर हाल ही में आया है. ये फिल्म जल्द ही रॉटरडैम फिल्म फेस्टिवल में प्रीमियर होने जा रही है. टीजर का इशारा है कि फिल्म में एक ऐसी लड़की की कहानी है जो अपनी खुशी के हिसाब से जीने चली है. इस टीजर पर काफी विवाद हुआ. क्यों हुआ? आइए बताते हैं.

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'बैड गर्ल' टीजर पर क्यों हुआ विवाद?
'बैड गर्ल' टीजर पर क्यों हुआ विवाद?

'तुम एक लड़के की तरह बात करती हो, लड़के की तरह चलती हो और देखो, अब एक लड़के की तरह फेल भी हो गईं!' ये डायलॉग तमिल फिल्म 'बैड गर्ल' का है, जिसका टीजर हाल ही में आया है. ये फिल्म जल्द ही रॉटरडैम फिल्म फेस्टिवल में प्रीमियर होने जा रही है. 

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फिल्म का टीजर कुछ दिन पहले ही रिलीज हुआ और आते ही सोशल मीडिया पर विवाद की वजह बन गया. डायरेक्टर वर्षा भरत की ये फिल्म एक यंग लड़की की कहानी है, जो सारी बंदिशें तोड़कर अपनी मर्जी से, जैसे मन करे वैसे जीना चाहती है. और जैसा इस तरह की कहानियों के साथ होता रहा है, 'बैड गर्ल' भी विवादों में आने लगी है. 

'बैड गर्ल' में अंजलि शिवरमन (क्रेडिट: यूट्यूब)

'बैड गर्ल' के टीजर में क्या है?
फिल्म के टीजर में अंजलि शिवरमन एक ऐसी यंग लड़की का किरदार निभाती दिख रही हैं, जो बचपन से ही चाहती थी कि उसका एक बॉयफ्रेंड हो. उनके किरदार के हिसाब से 'एक बॉयफ्रेंड होना, क्लास का प्रेजिडेंट होने से ज्यादा कूल है.' टीजर में नजर आता है कि उसे एक लड़का पसंद आने लगता है जिसकी 'बाहों पर उभरी हुई नसें अच्छी लगती हैं.' कुछ सीन के बाद दोनों स्कूल के एक बेकार पड़े कमरे में दोनों करीब आते दिखते हैं और तभी वहां एक टीचर पहुंच जाती है. बात घर तक चली जाती है और फिर आप समझ ही सकते हैं कि क्या-क्या हो सकता है. 

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'बैड गर्ल' में अंजलि शिवरमन (क्रेडिट: यूट्यूब)

मगर इसके बाद टीजर में ये लड़की अपनी मां से कहती है कि वो जो कर रही थी, उससे उसे लाइफ में पहली बार खुशी मिली थी. वो घर छोड़ देती है और अपनी मर्जी से अलग-अलग लड़कों से मिलती हुई, क्लब में डांस करती हुई और ड्रिंक करती नजर आती है. कुल मिलाकर टीजर का इशारा है कि फिल्म में एक ऐसी लड़की की कहानी है जो अपनी खुशी के हिसाब से जीने चली है. जो इस लड़की का मन आता है वो करती है और इसीलिए 'बैड गर्ल' का एक उदाहरण बन गई है. यहां देखिए 'बैड गर्ल' का टीजर:

क्यों हो रहा 'बैड गर्ल' पर विवाद?
फिल्म के टीजर में लड़की के घर और परिवार के सीन्स में नजर आ रहे प्रतीकों से लोगों ने अंदाजा लगा लिया कि फिल्म में जिस लड़की की कहानी दिखाई जा रही है, वो तमिल ब्राह्मण परिवार से है. लड़की की मां ने गले में जो पीला धागा पहना है, घर पर देवताओं की तस्वीरें और किरदारों के माथे पर लगे तिलक से लोगों को ये अंदाजा लग गया. सोशल मीडिया बहुत सारे यूजर्स 'बैड गर्ल' का विरोध इसलिए कर रहे हैं क्योंकि ये कथित रूप से 'तमिल ब्राह्मणों को शर्मसार करने की या उन्हें नीचा दिखाने की कोशिश है'. विवाद तब बढ़ गया जब तमिल डायरेक्टर मोहन जी. क्षत्रियन ने भी अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में यही बात कही. 

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मोहन ने जानेमाने तमिल डायरेक्टर पा रंजीत की पोस्ट शेयर की, जिसमें 'बैड गर्ल' को 'बोल्ड और रिफ्रेशिंग फिल्म' बताया गया है. मोहन ने लिखा, 'ब्राह्मण लड़की की पर्सनल लाइफ इस जमात के लिए हमेशा एक बोल्ड और रिफ्रेशिंग फिल्म बनती है. वेट्रीमारन, अनुराग कश्यप एंड कंपनी से इसके अलावा और क्या उम्मीद की जा सकती है. ब्राह्मण पिता और मां को कोसना अब पुराना हो चुका है और ट्रेंड में नहीं है. अपनी जाति की लड़कियों एक साथ ऐसी कहानी ट्राई कीजिए और उन्हें पहले अपने परिवार को दिखाइए.'

'जमात' से क्या है मतलब?
मोहन जी. क्षत्रियन ने अपनी पोस्ट में 'जमात' शब्द का इस्तेमाल जिस तरह किया, वो तमिल सिनेमा के उन फिल्ममेकर्स की तरफ इशारा करता है जो प्रोग्रेसिव सिनेमा के लिए जाने जाते हैं. वेट्रीमारन, पा रंजित या मारी सेल्वराज तमिल सिनेमा के वो डायरेक्टर्स हैं जिनकी फिल्मों में दलित हीरोज की कहानियां होती हैं. 

ऐसे कई फिल्ममेकर्स तमिल सिनेमा में हैं जिनकी फिल्में पॉपुलर एंटरटेनमेंट के साथ-साथ जाति के नैरेटिव को तोड़ती हैं और दलितों के सम्मान की बात करती हैं. अनुराग कश्यप, बॉलीवुड के प्रोग्रेसिव फिल्ममेकर माने जाते हैं और अब वो साउथ की इंडस्ट्रीज में काफी काम कर रहे हैं. 'बैड गर्ल' की डायरेक्टर वर्षा भरत, वेट्रीमारन की असिस्टेंट रही हैं जो अनुराग कश्यप के साथ फिल्म के प्रोड्यूसर भी हैं. 

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वर्षा भरत का जवाब
द फेडरल से बात करते हुए वर्षा ने बताया कि 'बैड गर्ल' का लीड किरदार ब्राह्मण घर से क्यों है. उन्होंने कहा, 'ये बहुत सिंपल बात है, मैं अपने अनुभवों से जुड़ी एक कहानी कहना चाहती थी. अगर मैं कोई हिस्टोरिकल या पॉलिटिकल फिल्म बनाती तो मैं रिसर्च करती और मेरा किरदार किसी दूसरे समुदाय से होता. ये एक ह्यूमन ड्रामा है इसलिए सेन्स यही बनता है कि मैं इस किरदार को ऐसे संसार में रखूं जिससे मैं खुद परिचित हूं, ताकि मैं एक ऑथेंटिक कहानी कह सकूं.' वर्षा ने अपनी फिल्म के जरिए एक नैरेटिव क्रिएट करने की आलोचना करते हुए कहा, 'मैं ऐसी व्यक्ति नहीं हूं जिसके जरिए कोई एजेंडा चलाया जा सके.' 

बॉलीवुड में भी विवादों की जड़ बनती रही हैं ऐसी फिल्में
बॉलीवुड में भी कई ऐसी फिल्मों और शोज पर विवाद होता रहा है जिनमें बंदिशें तोड़कर सिर्फ अपनी खुशी के लिए कुछ भी करने चली महिलाएं मुख्य किरदार हैं. और ये किरदार कहानी में अपनी इमोशनल या फिजिकल इच्छाओं को जताने में बिल्कुल भी नहीं हिचकते. 

1998 में आई दीपा मेहता की फिल्म 'फायर', मेनस्ट्रीम बॉलीवुड की उन शुरुआती फिल्मों में से एक थी, जिनमें लेस्बियन रिलेशनशिप दिखाया गया. इस फिल्म पर संस्कृति खराब करने का आरोप लगा और विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए, कई जगह इसकी स्क्रीनिंग्स रोकी गईं और फिल्म का बॉयकॉट हुआ. विवाद इतना बढ़ गया कि मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था. दिलचस्प ये है कि 'फायर' इस्मत चुगतई की 1942 में लिखी गई कहानी पर बेस्ड थी. अपने दौर में इस कहानी पर भी 'अश्लीलता' के आरोप लगे थे और मामला कोर्ट तक जा पहुंचा था. 

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महिलाओं पर बनी इन बॉलीवुड फिल्मों पर छिड़ा विवाद

पिछले कुछ सालों की बात करें तो 'लिपस्टिक अंडर माय बुर्का' (2017) को सेंसर बोर्ड ने ऐसा कहते हुए सर्टिफिकेट देने से इनकार कर दिया था कि ये 'महिलाओं पर केंद्रित' फिल्म है जो 'फैन्टेसी को जीवन से ऊपर' रखती है. इस फिल्म का विरोध कई मुस्लिम संगठनों ने भी किया था. करीना कपूर के लीड रोल वाली 'वीरे दी वेडिंग' में एक्ट्रेस स्वरा भास्कर का मास्टरबेशन सीन खूब ट्रोल हुआ था. फिल्म में महिला किरदारों का शराब पीना, गाली देना भी एक्ट्रेसेज की ट्रोलिंग की वजह बना था. 

बिल्कुल इसी तरह की वजहों के चलते सोशल मीडिया पर वेब सीरीज 'फोर मोर शॉट्स प्लीज' को भी ट्रोलिंग का सामना करना पड़ा है. इस शो पर 'बहुत ज्यादा सेक्स सीन' के आरोप लगते रहे हैं. 2023 में भूमि पेडनेकर स्टारर सेक्स-कॉमेडी फिल्म 'थैंक्यू फॉर कमिंग' को भी सोशल मीडिया पर बहुत नफरत का सामना करना पड़ा था. 

महिलाओं पर बनी इन बॉलीवुड फिल्मों पर छिड़ा विवाद

'बैड गर्ल' के विरोध में जिस तरह एक जाति को गलत दिखाने का आरोप लगाया जा रहा है, वो कोई नई बात नहीं है. महिला किरदारों को बोल्ड तरीके से दिखाने वाली फिल्मों पर कभी धर्म का सहारा लेकर तो कभी जाति के आधार पर अटैक होते रहे हैं. मगर विडंबना ये है कि फिल्मों में महिलाओं का जो बर्ताव विरोध की वजह बनता है, वो पुरुष किरदारों में खूब स्वीकार किया जाता है. 

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जहां 'एनिमल' और 'KGF' जैसी तमाम मसाला फिल्मों में हीरो का नशा करना, कई-कई महिलाओं के साथ फिजिकल रिलेशनशिप में होना बड़े पर्दे पर सेलिब्रेट किया जाता है. वहीं, महिला किरदारों को सिनेमा में इस तरह की लाइफ जीते देखना किसी न किसी आधार पर विरोध का कारण बन ही जाता है. तृप्ति डिमरी ने 'एनिमल' में जो किरदार निभाया, वो हीरो की शादी से बाहर एक एक्स्ट्रा-मैरिटल रिलेशनशिप में था. मगर ना सिर्फ हीरो को सेलिब्रेट किया गया बल्कि एक्ट्रेस रातोंरात पॉपुलैरिटी के चरम पर पहुंच गईं और उन्हें 'नेशनल क्रश' का तमगा मिल गया. 

जबकि बहुत संभव है कि बहुत से लोगों को आज उनके किरदार का नाम भी ना याद हो. ना ही उनके किरदार का समुदाय या जाति के आधार पर कोई विरोध हुआ. मसाला फिल्मों में कितने ही महिला किरदार, पुरुष हीरो की फैंटेसी को पूरा करते नजर आते हैं. लेकिन पूरा रस लेकर इन्हें बड़े पर्दे पर देख रही जनता ने शायद ही इनके किरदारों और जाति पर ध्यान दिया हो. मगर जैसे ही 'बैड गर्ल' जैसी कोई फिल्म आती है, तो जाति-धर्म-समाज की छवि का हवाला देकर विरोध शुरू हो जाता है. 

हालांकि, इस तरह के विवादों से मिली चर्चा कई बार छोटी बजट की फिल्मों के लिए फ्री की मार्केटिंग भी बन जाती है. 'बैड गर्ल' कैसी फिल्म होगी, ये तो थिएटर्स में इसे देखने के बाद ही पता चलेगा, मगर ये विवाद फिल्म को अटेंशन तो दिलवा ही रहा है. 

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