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'सिम्बा' की जिस बात के लिए आलोचना, उसी के लिए 'महाराजा' की तारीफ... दोनों फिल्मों में क्या है अलग?

'महाराजा' में विजय सेतुपति के किरदार का बदला पूरा करवाने में पुलिस का बहुत बड़ा रोल है और इसे तारीफ मिल रही है. 'सिम्बा' की कहानी का प्लॉट भी लड़की के रेप के आसपास बुना हुआ था. हालांकि, इसमें बदला लेने वाला लड़की का पिता नहीं एक पुलिस ऑफिसर था और कहानी के इस एंगल पर विवाद हो गया था.

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विजय सेतुपति, रणवीर सिंह
विजय सेतुपति, रणवीर सिंह

हिंदी से लेकर तमिल तक और गुजराती से लेकर असमिया तक... भारत में हर साल हजारों फिल्में बनती हैं. थिएटर की स्क्रीन पर फिल्म किसी भी दिशा से आई हो, ऑडियंस के लिए एंटरटेनमेंट का डोज तो पर्याप्त बना रहता है. लेकिन ऐसी कुछ ही फिल्में होती हैं जो दिमाग के पुर्जों में नॉर्मल से थोड़ी ज्यादा हलचल करती हैं और स्क्रीन के सामने बैठे दर्शक की सोच की लिमिट के तोते उड़ा देती हैं. 

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विजय सेतुपति और अनुराग कश्यप स्टारर 'महाराजा' ऐसी ही फिल्म है. करीब महीन भर पहले थिएटर्स में रिलीज हुई ये तमिल फिल्म जबसे नेटफ्लिक्स पर आई है, तबसे इसे ऐसी ऑडियंस मिली है कि ये भारत ही नहीं, कई दूसरे देशों में भी नेटफ्लिक्स पर टॉप ट्रेंडिंग इंडियन फिल्म बन गई. 

'महाराजा' में विजय सेतुपति (क्रेडिट: सोशल मीडिया)

'महाराजा' ये तारीफें डिजर्व भी करती है. एक अवयस्क बच्ची के रेप का बदला लेने चले पिता के बदले की कहानी, इस कदर बेहतरीन और परतदार स्टोरीटेलिंग के साथ बहुत कम ही देखने को मिलती हैं. डायरेक्टर नितिलन स्वामीनाथन की 'महाराजा' को और भी बेहतर बनाने वाला एक फैक्ट ये है कि फिल्म को 'रिवेंज थ्रिलर' के ब्रैकेट तक ही सीमित नहीं रखा जा सकता. लेकिन इसे देखने के बाद अचानक ही सुपरहिट बॉलीवुड फिल्म 'सिम्बा' की याद आती है. 

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'सिम्बा' की याद क्यों दिलाती है 'महाराजा'
पुलिस महकमे को एक सैल्यूट के तौर पर रोहित शेट्टी ने बड़े पर्दे पर अपना कॉप यूनिवर्स तैयार किया है. रणवीर सिंह का किरदार 'सिम्बा', उनके यूनिवर्स में 'सिंघम' (अजय देवगन) के बाद दूसरा बड़ा कॉप कैरेक्टर बनकर आया था. 

'सिम्बा' की कहानी का प्लॉट भी लड़की के रेप के आसपास बुना हुआ था. हालांकि, इसमें बदला लेने वाला लड़की का पिता नहीं एक पुलिस ऑफिसर था और कहानी के इस एंगल को लेकर विवाद भी हुआ था. कहानी में जिस लड़की का रेप होता है, उसे इंस्पेक्टर संग्राम भालेराव उर्फ सिम्बा अपनी बहन मानता है. कहानी में जब ये केस कोर्ट पहुंचता है तो दोनों आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त सबूत न मिलने से मामला फंस जाता है. मगर उस लड़की को 'न्याय' दिलाने के लिए सिम्बा और उसके साथी पुलिसवाले एक प्लान बनाते हैं और फेक एनकाउंटर की शक्ल में, दोनों आरोपियों की हत्या कर देते हैं. 

'सिम्बा' का विवाद और 'महाराजा' का स्वाद 
रणवीर सिंह की फिल्म में पुलिस ने जो किया, उसे न्यायेतर हत्या या एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल किलिंग कहा जाता है. इन मामलों में कानूनी कार्रवाई के जरिए आरोपी को सजा और पीड़ित को न्याय दिलाने की बजाय, निजी नैतिकता के आधार पर शक्ति का प्रयोग करके आरोपियों की हत्या कर दी जाती है. और इसे पीड़ित के साथ 'न्याय' के लिफाफे में लपेट दिया जाता है. 

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'सिम्बा' में रणवीर सिंह (क्रेडिट: सोशल मीडिया)

2018 में रिलीज हुई 'सिम्बा' आज भी रणवीर सिंह की सबसे बड़ी सोलो हिट है, जिसमें उनके साथ उनकी सुपरस्टार वाइफ दीपिका पादुकोण नहीं हैं. रोहित शेट्टी के कॉप यूनिवर्स में भी ये सबसे कमाऊ फिल्म है. यानी जनता ने यकीनन थिएटर्स में इस फिल्म को बहुत सपोर्ट किया. 

मगर 2018 की तीसरी सबसे बड़ी बॉलीवुड फिल्म, ब्लॉकबस्टर 'सिम्बा' पर बहुत लोगों ने ये आरोप लगाया कि ये फिल्म इस तरह की न्यायेतर हत्याओं को प्रमोट करती है. फिल्म के कई रिव्यूज में भी इस बात की आलोचना हुई, और इस तरह के उदाहरण सेट होने से समाज और कानून पर पड़ने वाले असर की बात करते हुए कई लेख भी लिखे गए. फिल्म को इसी चश्मे से इतना देखा गया कि 2019 में जब हैदराबाद में एक 26 साल की डॉक्टर के साथ रेप के आरोपियों का एनकाउंटर हुआ, तो इस घटना को 'सिम्बा स्टाइल' न्याय कहा गया.  

'महाराजा' पर वापस लौटें तो इस फिल्म में विजय सेतुपति के किरदार का बदला पूरा करवाने में पुलिस का बहुत बड़ा रोल है. अपनी बेटी के साथ दुष्कर्म करने वाले तीन लोगों को तलाश रहा लीड किरदार महाराजा, एक को तो खुद खोजकर मार देता है. जबकि दूसरे को मारने और तीसरे तक पहुंचने में उसकी मदद वो पुलिसवाले करते हैं, जिन्हें फिल्म में कम से कम दो बार भ्रष्ट दिखाया गया है. 

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'महाराजा' फिल्म से एक सीन (क्रेडिट: सोशल मीडिया)

फिल्म की कहानी के एक निर्णायक सीन में, महाराजा के हाथ में हथियार थमाकर, दूसरे आरोपी को उसके हवाले करके बाहर निकलते इंस्पेक्टर से उसका जूनियर सवाल करता है- 'हम ऐसा कर तो रहे हैं, लेकिन बाद में कुछ गड़बड़ हुई तो?' इंस्पेक्टर 'जो होगा देख लेंगे' स्टाइल में उस हेडकांस्टेबल से कहता है, 'तेरी अपनी बेटी के साथ ऐसा होता तब ही इतना सोचता?' ये डायलॉग शब्दशः फिल्म वाले नहीं हैं मगर इन किरदारों की बातचीत का लब्बोलुआब ऐसा ही है. 

कहानी के नैरेटिव में छुपा 'न्याय'
किसी भी फिल्म की कहानी पहले एक समस्या खड़ी करती है और फिर उसका ट्रीटमेंट करती है. शर्त बस ये है कि इस ट्रीटमेंट में एक फिलमची को एंटरटेनमेंट, स्टोरी लवर को दिमाग चलाने के लिए खाद-पानी और कहानी की समस्या से रिलेट कर रही मास ऑडियंस को एक 'रिलीफ' मिल जाना चाहिए.

'सिम्बा' में एक बड़ी दिक्कत ये थी कि कहानी में रेप को एक अपराध की बजाय किसी लड़की के साथ हुई ऐसी घटना की तरह ट्रीट किया गया, जिसके बाद जी पाना असंभव है. ये सच है कि इस जघन्य अपराध ने लड़कियों की जान ली है, लेकिन सवाल मैसेज का है. दिक्कत ये है कि लड़की को 'पीड़िता' की भूमिका में दिखाया गया, 'सर्वाइवर' की नहीं. 

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ऊपर से पर्दे पर दिखती इमेज का खेल ऐसा था कि लड़कियों की सुरक्षा, उनके जीवन से जुड़े बड़े मुद्दे पर बनी फिल्म में, बड़ी-बड़ी देर तक फ्रेम में लड़कियां दिखती ही नहीं थीं. ऐसे में 'सिम्बा' लड़कियों की समस्या पर पुरुषों द्वारा, पुरुषों प्रधान समाज और सोच के लिए बनाई फिल्म बन गई थी.

'महाराजा' की छवियों को देखें तो सिर्फ हीरो ही नहीं, विलेन और कई सपोर्टिंग किरदार बेटियों के ही पिता हैं. विजय सेतुपति की फिल्म एक बहुत बड़ा कमाल करती है कि लड़की को 'सर्वाइवर' की भूमिका में दिखाती है. यहां लड़की अपने पिता से कहती है कि उसे रेपिस्ट को देखना है, उससे पूछना है कि उसने इतना घिनौना कृत्य उसके साथ किया क्यों? उसे देखना है कि ऐसा भयानक एक्ट करने वाला ये आदमी दिखता कैसा है? 

और इस लड़की का पिता महाराजा, उसे ये मौका देता भी है. यहां 'महाराजा', रेप से जुड़े स्टिग्मा को तोड़ने में कामयाब होती है और दिखाती है कि उस लड़की के साथ जो हुआ वो किसी का किया अपराध है. और लड़की का जीवन किसी विकृत मानसिकता वाले एक व्यक्ति के कृत्य से नहीं डिफाइन होगा.

'महाराजा' फिल्म से एक सीन (क्रेडिट: सोशल मीडिया)

लेकिन फिल्म का नैरेटिव स्ट्रक्चर देखिए, लड़की के लिए बदला लेने कौन निकला, उसका उसका पिता. मदद किसने की? पुरुष पुलिसवालों ने, जबकि अलग-अलग सीन्स में कम से कम दो महिला पुलिसकर्मी भी दिखती हैं. एक दलील ये हो सकती है कि इस तरह के नैरेटिव स्ट्रक्चर पुरुषों को ज्यादा असर करने के लिए डिजाईन किए जाते हैं, क्योंकि जेंडर से पक्षपात करने वाले ये अपराध पुरुष ही ज्यादा करते हैं.

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ऐसे में सवाल ये है कि आखिर एक जैसी कमी होने के बावजूद एक फिल्म की तारीफ और एक की आलोचना क्यों? क्या इसका लेनादेना इस सिनेमाई पूर्वाग्रह से है कि 'साउथ में तो जबरदस्त सिनेमा बन रहा है'? या फिर पिछले दो-तीन साल में बॉलीवुड में विशेष तौर पर मीन-मेख निकालने की सोशल मीडियाई आदत, ज्यादा पक्की हो चुकी है? 

ये सवाल हम लोगों पर है... ऑडियंस पर. फिल्म लवर्स पर. फिल्मों के प्रतीकों और छवियों की व्याख्या करने वालों पर, फिल्मों पर फैनडम खड़ा करने वालों पर और इसका जवाब किसी को देने से ज्यादा जरूरी है, इस जवाब की खोज करना. क्योंकि स्क्रीन पर दिख रही छवियों पर दिमागी घोड़े दौड़ाना ही तो सिनेमा प्रेम है! 

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