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क्यों नहीं चलता फीमेल-ओरिएंटेड सिनेमा? साउथ के क्रेज की असली वजह? लाठी स्टार विशाल ने दिए जवाब

विशाल कृष्णा रेड्डी. हिंदी में डब की गयीं दक्षिण भारतीय ऐक्शन फिल्में देखने वालों के लिये ये नाम कतई नया नहीं होगा. विशाल की नयी फिल्म लाठी आ रही है. इसमें विशाल एक पुलिस कांस्टेबल की भूमिका में हैं. इस फिल्म के सिलसिले में हमने विशाल से बातचीत की. ये बातचीत सवाल-जवाब की शैली में आप यहां पढ़ सकते हैं.

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विशाल कृष्णा रेड्डी
विशाल कृष्णा रेड्डी

विशाल कृष्णा रेड्डी. हिंदी में डब की गयीं दक्षिण भारतीय ऐक्शन फिल्में देखने वालों के लिये ये नाम कतई नया नहीं होगा. केबल टीवी पर 'हिम्मतवार' फिल्म लम्बे समय तक बार-बार आयी जो 'पूजई' (Poojai) का डब किया हुआ वर्जन था. हरि गोपालकृष्णन द्वारा निर्देशित इस फिल्म में विशाल और श्रुति हसन मुख्य भूमिकाओं में थे. हिंदी पट्टी में डब की हुई फिल्मों के अलावा विशाल की OTT पर आयी, शरलॉक होम्स के किरदार से प्रेरित फिल्म 'डैशिंग डिटेक्टिव' (तुप्परिवालन) भी पसंद की गयी. ये फिल्म अमेजन प्राइम पर मिलती है.

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तमिल इंडस्ट्री में विशाल को खालिस ऐक्शन हीरो का टैग मिल चुका है और उनकी गाड़ी इसी पटरी पर चल रही है. 3 साल के भीतर विशाल के रौले का अंदाजा यहां से भी लगाया जा सकता है कि 2007 में पोंगल पर इकट्ठे रिलीज हुई फिल्मों में विजय और अजीत जैसे नामों के बीच, विशाल की फिल्म 'थामिराबरानी' चल निकली और अच्छा बिजनेस किया. लीड रोल वाली शुरुआती 6 फिल्मों में विशाल को 5 हिट फिल्मे मिलीं और वो स्थापित हो चुके थे.

आगे चलकर इंडस्ट्री में और परिपक्व होने के बाद विशाल ने अपनी प्रोडक्शन कम्पनी विशाल फिल्म्स फैक्ट्री शुरू की और बतौर प्रोड्यूसर सामने आये. इससे पहले विशाल के पिता जीके रेड्डी भी तमिल फिल्मों के प्रोड्यूसरों में एक बड़ा नाम थे. विशाल के भाई विक्रम और उनकी (विक्रम की) पत्नी श्रेया रेड्डी भी फिल्म और टीवी एक्टर हैं.

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फिलहाल, विशाल कृष्णा की नयी फिल्म आ रही है - लाठी. इसमें विशाल एक पुलिस कांस्टेबल की भूमिका में हैं. फिल्म हिंदी समेत 5 भाषाओं में 22 दिसंबर को रिलीज होगी. इस फिल्म के सिलसिले में हमने विशाल से बातचीत की. ये बातचीत सवाल-जवाब की शैली में आप यहां पढ़ सकते हैं:

सवाल: आपकी आने वाली फिल्म से ही शुरू करते हैं. ट्रेलर तो काफी जोरदार दिख रहा है. क्या है ये फिल्म लाठी?

'लाठी' कई मामलों में अलग फिल्म है. इसमें मैं एक पुलिस कांस्टेबल का रोल कर रहा हूं. इससे पहले मैं जब भी पुलिसवाले रोल में रहा तो बड़े अफ़सरों वाले रोल करता था. और सिर्फ मैं ही नहीं, दूसरे ऐक्टर भी ऐसा ही करते थे. कभी कमिश्नर तो कभी डिप्टी कमिश्नर. तो, एक बार शूटिंग करते समय मुझे एक पुलिस कांस्टेबल मिले जिन्होंने मुझसे कहा कि आप बड़े अफ़सरों की कहानी दिखाते हैं, हम जैसे लोगों की कहानियां स्क्रीन पर कब लायेंगे? तो मुझे लगा कि हां, ये तो सही बात है. तो मैंने सोचा कि एक ऐसी कहानी बनाते हैं जिसमें उसकी जिंदगी दिखाते हैं. कि वो किस हद तक जाकर अपने परिवार को निहायती क्रूर लोगों के चंगुल से बचाता है और इस दौरान उसे किन चुनैतियों का सामना करना पड़ता है. 

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सवाल: क्या नया दिखा आपको इस फिल्म में? और क्या नया हमें देखने को मिलेगा?

इसमें 3 मुख्य चीज़ें हैं. सबसे पहला तो है स्क्रीनप्ले. आप ये समझिये कि एक अंडर-कंस्ट्रक्शन बिल्डिंग है. उसमें 40 मिनट का ऐक्शन सीक्वेंस है. वो बहुत बड़े लेवल का काम हुआ है. मैं इसमें पीटर हेन (एक्शन कोरियोग्राफर, जिन्होंने बाहुबली पर काम किया) के साथ काम कर रहा हूं. पहली बार उनके साथ काम किया. दूसरी बात, इसमें मैं पहली बार 7 साल के बच्चे के पिता के रोल में हूं. ये मेरे लिये एकदम ही नया एक्सपेरिमेंट है. इसके अलावा पहली बार मेरी बॉडी-लैंग्वेज बदली हुई है. अभी तक मैं ज्यादातर जगहों पर लोगों को ऑर्डर दे रहा था, यहां पहली बार मैं ऑर्डर्स ले रहा हूं. क्यूंकि मैं एक कांस्टेबल हूं. आप ट्रेलर देखेंगे तो उसमें भी दिखेगा कि मैं लेफ्ट-राइट-सेंटर सैल्यूट कर रहा हूं. ये कांस्टेबल सस्पेंड हुआ है और फिर ड्यूटी पर आया है. तो इसपर बहुत सारा दबाव है.

इस फिल्म में नये लोग शामिल हैं. विनोद कुमार ने डायरेक्ट की है जिनकी ये पहली फिल्म है. ये कहानी भी उन्हीं की है, उन्होंने ही स्क्रीनप्ले लिखा है.

सवाल: तो ये आपका प्लान था कि अब आपको इस तरह का एक कैरेक्टर करना था? इसलिये आपने ऐसी कहानी की डिमांड की?

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नहीं. मेरा कभी कोई प्लान नहीं रहता है. मेरे दरवाजे खुले रहते हैं. आने वाले काम के मामले में मैं ज्यादातर ब्लैंक रहता हूं. जो भी आ रहा है, क्या बताने के लिये आ रहा है, उसे मैं एक ऑडियंस की तरह बैठकर सुनता हूं. मैं बस इस बात का ध्यान रखता हूं कि मुझे बोर न लगने लगे. क्यूंकि अगर मैं ही बोर हो रहा हूं तो पैसे देने वाली ऑडियंस का क्या होगा. फिर मैं थोड़ा सा समय, एक दिन के आस-पास लेता हूं और सोचता हूं कि विशाल कैसे उस कैरेक्टर में फिट हो रहा है. इसके साथ ही मैं नये डायरेक्टर के साथ काम करने में ज्यादा उत्साहित रहता हूं. क्यूंकि उनके पास नये आइडिया रहते हैं और उसमें मुझे मजा आता है. इस फिल्म में ये सारी चीजें शामिल रहीं. 

सवाल: और इस फिल्म में कितना समय लगा? 

ये मेरे करियर का अब तक का सबसे लम्बा प्रोजेक्ट रहा है. इसके साथ ही ये मेरे करियर की सबसे ज़्यादा बजट वाली फिल्म भी हो गयी. इस फिल्म में 142 दिन का शूट हुआ. हमने एक ही बिल्डिंग में 80 दिन काम किया हैदराबाद में. ये वही बिल्डिंग है जो ट्रेलर में दिखती है. हमें ऐसी बिल्डिंग की जरूरत थी तो कई शहरों में हमने रेकी की. लेकिन हमें बड़े लेवल के ऐक्शन सीक्वेंस करने थे, बम फोड़ने थे. तो रिहायशी इलाकों से दूर ही काम करना था. तो हैदराबाद में सबसे ऊंचा टॉवर बन रहा था, हमें उसके बारे में मालूम चला. वो उस वक्त बन रहा था. तो हमने उसके मालिक से बात की. फिर हमने वो बिल्डिंग फ़ाइनल की.

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सवाल: एक्टिंग के अलावा, अमूमन आप फिल्मों में किन मौकों पर शामिल होते हैं? और चूंकि ये इतनी बड़ी फिल्म है, आप कितना शामिल रहे?

मैं आम तौर पर फिल्मों में लगभग सभी मौकों पर शामिल होता हूं. मैं ये भी बाकायदे जानता हूं कि शामिल होने और दख़ल देने के बीच एक बेहद महीन रेखा होती है. मैं उस लकीर का पूरा सम्मान करता हूं और लोगों के काम में दख़ल नहीं देता. मैं 9 से 6 की शिफ्ट करके, शूट करके घर या होटल चले जाने में विश्वास नहीं रखता. मैं तो एडिटिंग भी देखता हूं, और शूट करना है तो मैं उसके लिये भी तैयार होता हूं. री-रिकॉर्डिंग भी देखता हूं. फाइनल मिक्सिंग में भी मैं मौजूद रहता हूं.

उसी तरह से लाठी में भी मेरा इन्वॉल्वमेंट है. इतना काम था इस फिल्म में, मैं सभी जगह रहा. प्री-प्रोडक्शन और पोस्ट-प्रोडक्शन हर कदम पर मैं था.

 

सवाल: 'लाठी' तो आ रही है. आपके परिवार के बारे में बात करते हैं. फिल्म से जुड़े लोगों का परिवार है. घर में, जुटान होने पर कैसा माहौल रहता है?

हम डिनर टेबल पर काम की बातें नहीं करते हैं. मेरा भाई और हम लोग जब भी मिलते हैं, हम इन चीज़ों के बारे में कम ही बात करते हैं. न हम अपनी सफलताओं को डिस्कस करते हैं और न ही फेलियर्स को. हम अपने पैर जमीन पर रखते हैं और एक आम घर की तरह दुनिया-जहान की बातें करते हैं. मेरे घर में फिल्मों का माहौल रहा है. लेकिन बातें फिल्मी नहीं रही हैं. हां, कुछ मौके आते हैं जब इंडस्ट्री की इधर-उधर की बातें डिस्कस हो जाती हैं लेकिन उन्हें बहुत अहमियत नहीं देते हैं. मेरे पिता लम्बे समय से फिल्मों से जुड़े हुए थे. हमने ऊंचाई भी देखी और बुरे दिन भी देखे. हम आपस में परिवार से जुड़ी बातें ही करते रहे. मेरे भाई दूसरी जगह रहते हैं. लेकिन एक बार काम खत्म हो गया तो वहां भी बातें भी ख़त्म हो जाती हैं.

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और ऐसा नहीं है कि पिता फिल्मी दुनिया से जुड़े थे तो मुझे बड़ी आसानी से जगह मिल गयी. मैं वो रास्ता नहीं लेना चाहता था. उस रास्ते से बहुत कुछ होता भी नहीं है. मैंने पढ़ाई की. विज़ुअल कम्युनिकेशन में डिग्री ली. मुझे असल में डायरेक्टर बनना था. तो मैं उसे ही ध्यान में रखते हुए पढ़ाई कर रहा था. फिर मैंने बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर काम किया. लेकिन चीजें ऐसी हुईं कि मैं ऐक्टर बन गया.

मतलब, मुझे कहना ये है कि मैं काम को लेकर वापस नहीं आता. सोचता रहता हूं, लेकिन उसे डिनर टेबल पर नहीं रखता. मेरी एक आदत है कि मैं जब शूटिंग से वापस आ रहा होता हूं तो कार से नहीं जाता. मैं साइकिल से आता जाता हूं. वो मेरा डीटॉक्स का टाइम होता है. मुझे ये भी लगता है कि इतना काम करने के बाद एक घंटा शरीर और दिमाग को देना होगा. तो इस एक-सवा घंटे के टाइम में मेरा शरीर काम कर रहा होता है और मैं खूब सोच रहा होता हूं, तो दिमाग भी पीक पर चल रहा होता है.

सवाल: आपने बोला कि आपने, आपके परिवार ने अच्छा और बुरा, दोनों तरह का वक़्त देखा है. बतौर ऐक्टर, आपके लिये 2011 से 2014 का समय बहुत लाभप्रद नहीं गया. एक कड़क शुरुआत के बाद जब ऐसा समय आता है तो कई लोगों के लिये उससे डील करना मुश्किल होता है. आपने कैसे मैनेज किया?

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ऐसा सभी के जीवन में होता है. कभी भी ऐसा संभव ही नहीं है कि आप सिर्फ़ ऊपर ही उठते जाएं. और इस पूरे क्रम में हम सीखते जाते हैं कि कैसे मैनेज करना है. मैंने स्कूल में पढ़ाई की और फिर कॉलेज में पढ़ा. लेकिन फिल्म की इस दुनिया ने जो सिखाया, मुझे असली अक्ल वहीं आयी. दुनिया के बारे में यहीं समझ में आया. जिंदगी का सिलेबस मैंने फिल्म इंडस्ट्री में सीखा.

जब असफलता मिल रही थी, मैं सीख रहा था. मैं सोच रहा था और ये नोट करता जा रहा था कि वजहें क्या थीं. मैं मेहनत कर रहा था लेकिन फिर भी रिजल्ट मेरे मुताबिक नहीं आ रहा था, इसपर वक्त देना जरूरी था. ये इसलिये भी ज़रूरी था जिससे आगे मैं कभी भी इन्हें दोहराऊं नहीं. और जैसा मैंने बताया, मैं साइक्लिंग करते हुए अपने काम पर, उसके फीडबैक के बारे में सोचता हूं, उससे भी मुझे काफी मदद मिली. और यहां से फिर मैं सीखता गया और समझता गया कि आगे किस दिशा में कदम बढ़ाने हैं.

और एक बात ये भी है कि चीज़ें बदल रही हैं. उस वक्त भी बदल रही थीं. पहले एक जगह पर एक ही सिनेमा चल रहा होता था. अभी एक साथ 3 या 4 या 5-5 सिनेमा देखे जा सकते हैं. ऐसे में ऑडियंस के पास काफी ऑप्शन आ गया है. आज के समय में तो ओटीटी भी आ गया है. अपनी भाषा ही नहीं, आप कोरियन, चायनीज, कोई भी और फिल्म आराम से देख सकते हैं. तो ऐसे में आपको खुद पर, अपने कॉन्टेंट पर, उस कॉन्टेंट के ट्रीटमेंट पर भी खूब काम करने की जरूरत है. मुझे बहुत कुछ समझ में आया.

सवाल: आप मलयालम फिल्म में आये, आपने मोहनलाल के साथ भी काम किया.

वो बहुत शानदार अनुभव था. मोहनलाल सर मुझे अपने बच्चे की तरह रखते थे. समझाते थे. मैं फिल्म में ऐंटी-हीरो किरदार में था. ये भी मेरे लिये एक नया अनुभव था. लेकिन उस फिल्म में जब उनके साथ फाइट-सीक्वेंस करना था तो मैं बहुत नर्वस था. मैंने शूट करके उनको सॉरी बोला. उन्होंने कहा कि अरे सॉरी मत बोलो, जाकर अगले शॉट की तैयारी करो.

सवाल: ऐक्शन की बात हुई है तो मुझे यही दिमाग में आ रहा है कि एक समय था जब आपकी फिल्में हिंदी में डब होके हर हफ़्ते किसी न किसी केबल चैनल पर चल रही होती थी. आपकी इमेज एक पूरे ऐक्शन हीरो की बन गयी थी. कभी ऐसा नहीं लगा कि ये घातक साबित होगा? या आप ये सोचते थे कि जो चल पड़ा है, उसमें लगे रहते हैं?

ये तो बहुत ही अच्छी बात है कि मेरी फिल्में ऐसे चलती थीं. रिटर्न ऑफ अभिमन्यु भी टीवी पर खूब चली थी. लेकिन मुझे अभी अलग-अलग तरह की फिल्में आ रही हैं. अभी मार्क एंटनी है जो पीरियड फिल्म है. उसके बाद मेरा डायरेक्शन आएगा थुप्परीवालन 2 में जो डिटेक्टिव के बारे में है और सीक्वेल है. उसके बाद पीरियड फिल्म एक और है. तो अभी तो अच्छी फिल्में आती दिख रही हैं. वेरायटी है उनमें. और ऐक्टिंग के लिहाज से मुझे हर फिल्म में एक अलग मौका दिख रहा है. तो मैं अभी इसपर फोकस कर रहा हूं. ऐक्शन हीरो का टैग हो सकता है लेकिन मुझे ये मालूम है कि मैं एक ही जैसी फिल्म बार-बार नहीं कर रहा हूं. और ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ ऐक्शन ही सब काम कर रहा है. ऐक्शन के साथ-साथ और भी चीजें हैं जो ऑडियंस पसंद कर रही है और जो फिल्म को कम्प्लीट पैकेज बना रही हैं. लाठी में भी एक्शन है. लेकिन उसके साथ-साथ इमोशन भी है, रोमांस भी है. यानी सब कुछ है. ऐसी फिल्में तो मैं कतई छोड़ना नहीं चाहता.

सवाल: एक बिल्कुल ही अलग ज़मीन पर चलते हैं. आपने आगे चलकर प्रोड्यूसर की गद्दी भी संभाली. और आगे चले तो तमिल फिल्म प्रोड्यूसर काउंसिल के प्रेसिडेंट बने. रीजनल इंडस्ट्री में छोटे प्लेयर्स बहुत होते हैं. और कोविड ने हर फ़ील्ड में हो रहे खेल को बदला है. तमिल फिल्में, प्रोड्यूसर्स वगैरह कितना विचलित हुए कोविड से?

कोविड ने बहुत असर डाला. छोटे सिनेमा, या मीडियम सिनेमा का भी लाइफ़-स्पैन बहुत कम होता है. कोविड ने उसे और मार दिया. आपको ओटीटी में अच्छा कॉन्टेंट दिख रहा है. लेकिन वही कॉन्टेंट थियेटर में नहीं देखा जा रहा है. तमिलनाडु में, आंध्रा में, सभी जगह यही चल रहा है. कोविड के बाद छोटे प्रोड्यूसर्स को कहीं ज़्यादा नुकसान हो रहा है. क्यूंकि ओटीटी तो सब फिल्मों को लेता नहीं है. वो सिर्फ़ ऐसे लोगों का साथ दे रहे हैं, जिनके साथ उनके अच्छे सम्बन्ध हैं. और हर सिनेमा तो वैसे भी नहीं जा सकता न प्लेटफ़ॉर्म पर. इस वक़्त तमिल में 200 फिल्में बन रही हैं जिसमें 20 या बहुत हुआ तो 30, इतनी ही फिल्में अच्छी चल पाती हैं. बाकी सब डूब रहे हैं.

यहां सब जंगल जैसा हो गया है. फिल्म इंडस्ट्री पूरी तरह से 'सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट' के नियम पर चल रहा है. 

सवाल: ऐसे 'जंगलराज' में आप, बतौर प्रोड्यूसर, कैसे चीजें मैनेज करते हैं?

मैं एक काम करता हूं. मैं प्री-प्रोडक्शन पर अपना ध्यान केंद्रित करता हूं. इंडियन फिल्म इंडस्ट्री के लिये प्री-प्रोडक्शन बेहद ज़रूरी चीज़ है. हॉलीवुड में इसे बहुत सीरियसली फ़ॉलो किया जाता है लेकिन हमारे यहां इसके लिये टाइम देते ही नहीं है. ऐसे ही शूटिंग चालू कर देते हैं. वहां लोकेशन पर जाकर डायलॉग लिखकर ऐक्टर को दिए जा रहे होते हैं. इससे शूटिंग करने के दिन बढ़ जाते हैं. आप देखिये कि ग्लेडिएटर जैसी बड़ी फिल्म 72 दिन में शूट हो गयी थी. इसीलिए हमें प्री-प्रोडक्शन पर काम करने की जरूरत है. मैं तो कहता हूं कि इसमें 6 महीने लगता है तो लगने दो. 6 महीने प्री-प्रोडक्शन करने से 3 महीने में सिनेमा बनकर तैयार हो जायेगा. आप ऐसे बहुत पैसा बचा सकते हैं.

इसके अलावा बहुत सारा आर ऐंड डी (रीसर्च ऐंड डेवेलपमेंट) करने की भी ज़रूरत होती है. लोग इस वक़्त दुनिया भर का सिनेमा देख रहे हैं. दुनिया भर के लोग आपका सिनेमा भी देख रहे हैं. आपको ऐसी फिल्में बनानी चाहिये जो आप दूसरे देशों में जाकर उन्हें दिखाएं. वो भारतीय कल्चर को, भारतीय फिल्मों को पसंद करते हैं. अभी ख़ासकर साउथ अमरीकी मार्केट शुरू हो गया है भारतीय सिनेमा के लिये. ईजिप्ट और टर्की में भी खासी मांग है. मिडल ईस्ट में लोग तमिल सिनेमा देख रहे हैं. प्रोड्यूसर्स के लिये ये एडवांटेज है. बस इसे जिसने साध लिया, वो अच्छा कर लेगा. ये एकदम जुआ खेलने जैसा है. (हंसते हुए) मोदी जी ने शायद इसीलिए गैम्बलिंग और सिनेमा को जीएसटी में एक ही स्लैब में रखा है. 

सवाल: कोविड को किसी भी ऐंगल से अच्छा नहीं कहा जा सकता. लेकिन इस दौरान बहुत से लोगों ने साउथ के सिनेमा को एक्सप्लोर किया...

मैं एक बार मंदिर गया था. वहां मुझे 6 लोग मिले. 2 पुजारी थे, 2 पुलिस के लोग थे और 2 नौकरीपेशा लोग थे. सभी ने अलग-अलग शब्दों में एक जैसी बातें कहीं. सभी का कहना था कि उन्हें फिल्मों में उनका कल्चर दिखायी दे रहा था. मुझे पहली बार में तो विश्वास ही नहीं हुआ. वो कह रहे थे कि वो सभी के साथ घर में बैठकर ये फिल्में देख सकते थे और उन्हें झेंप नहीं महसूस होती थी.

सवाल: मेरा सवाल कुछ और था लेकिन आपने यह बात कही तो उसे और बल मिल जायेगा. मैं ये पूछना चाहता हूं कि कल्चर तो दिखता है, लेकिन साथ ही भयंकर पेट्रियार्की और हिंसा और गला घोंटने वाली मेस्क्युलेनिटी भी दिखती है. वहां महिला किरदारों का, सिवाय दमन झेलने के या अपने बेटों के हिंसक क्रियाकलापों का समर्थन करने के, और कोई रोल नहीं होता.

मैं कतई male chauvinist साउंड नहीं करना चाहता. यहां सब कुछ बिजनेस के हिसाब से देखना होगा. आप ये देखिये कि कितना फीमेल-ओरिएंटेड सिनेमा चलता है? 100 में से 1. लोग हीरो के लिये ही आ रहे हैं. 

सवाल: तो क्या ऐसी कहानियां ही नहीं बनायी जा रही हैं जिसमें कोई महिला उसकी हीरो हो? क्यूंकि अगर ठेठ मां-बाप से हाथ मांगने वाली रोमैंटिक फिल्म भी देखें तो उसमें भी लड़के को ही अंत में सब कुछ ठीक करना होता है और वो हीरो बनता है.

देखिये, ये सवाल हर जगह पूछा जा रहा है. पूछा जा रहा है कि क्यूं फीमेल ऐक्टर्स को बस मॉडल बनाकर रखा हुआ है. 

नहीं. सिर्फ ग्लैमर डॉल की बात नहीं है. अगर आप कर्णन या असुरन जैसी फिल्में देखें, उसमें कोई भी ग्लैमर डॉल नहीं है. मलयालम में जलीकट्टू या अजगजन्तरम जैसी फिल्में देखें, सब कुछ हीरो ही कर रहा होता है. ये अच्छी फिल्में हैं, लेकिन ये हिंसा से भरी होती हैं और सबकुछ पुरुष किरदार कर रहे होते हैं. और ऐसे सिनेमा से भरा हुआ है साउथ का सिनेमा.

ये तो ऐसा है कि हम जो भी इस समाज में होता देख रहे हैं, वही सिनेमा में चल रहा है. एक लेखक जब कहानी लिख रहा है तो उसकी सोच इस समाज में हो रही घटनाओं से ही प्रेरित होता है. ऐसे कितने उदाहरण दिए जा सकते हैं. सेंसर बोर्ड जब सवाल पूछता है कि आप इतनी हिंसा क्यूं दिखाते हैं, तो हमें जवाब देना पड़ता है कि बॉस, इससे ज़्यादा हिंसा तो टीवी दिखा रहा होता है. एक आदमी को काटकर मार डाला जाता है और उसका वीडियो बार-बार रिपीट पर टीवी पर दिखाया जा रहा होता है. ऐसा नहीं है कि हम सिनेमा में अपने मन से कहानियां बनाकर दिखा रहे हैं. ये हो रहा है बाहर. सिनेमा के मुक़ाबले हिंसा को टीवी पर कहीं ज़्यादा ग्लोरिफ़ाय किया जाता है. फिल्म में तो हम बस समाज की तस्वीर दिखा रहे होते हैं. जब फिल्म में एक नेता किसी पुलिसवाले से झगड़ा करके उसका करियर खराब करता है, उसकी रैंक कम करता है, ये समाज से उठायी गयी चीज है. ये सब हो रहा है. डायरेक्टर ऐसी कहानियां उठाकर, कमर्शियल ऐंगल से सोचते हुए उसे स्क्रीन पर लाता है.

सवाल: एक मुद्दा और जो काफ़ी चल रहा है. हिंदी भाषा का है. दक्षिण भारतीय ऐक्टर्स ने मुखर होकर अपनी बातें रखीं. हिंदी के पक्षकारों ने कहा कि साउथ की फ़िल्में असली पैसा डब होकर हिंदी पट्टी में कमाती हैं. ख़ुद को कहां पाते हैं इसमें आप?

ये तो अभी समझ में आ जायेगा. दिसंबर में समझ में आ जायेगा. अवतार आ रही है. हजार से ज्यादा स्क्रीन्स मिलेंगी उसे. दक्षिण भारत छोड़िये, हिंदी फिल्मों को पीछे खींचा जायेगा. उसे सबसे ज़्यादा स्क्रीन्स मिलेंगी. सारा मुद्दा बिजनेस देने का है. जिसका थियेटर जिस सिनेमा से भरेगा, वो वही सिनेमा दिखायेगा. कोई फिल्म इंडस्ट्री किसी दूसरे क्षेत्र या भाषा के दम पर ही बढ़ सकती है, ऐसा कतई नहीं है. इसमें हम क्या कोई भी कुछ नहीं कर सकता है. जिसका जो बिजनेस है, वो वैसे ही करेगा. मैं तो देख रहा हूं रोज  कौन सा सिनेमा कहां, कैसा काम कर रहा है. साउथ के सिनेमा के पास उसकी अपनी ऑडियंस है और वो आती है, बिजनेस देती है. बाकी, ये एक फेज है. आगे क्या होगा, कोई कुछ नहीं कह सकता.

 

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