असरार-उल हसन ख़ान यानी मजरूह सुल्तानपुरी, भारत में शायरी के इतिहास का वो प्रगतिशील विचारक जिसे न जेल का ख़ौफ लिखने से रोक सका और न ही जिसने कभी अपनी लेखनी में किसी की मुदाख़लत (इंटरफेयर) को पसंद किया. वो शख्स जिसने भारत की शायरी और बॉलीवुड के गीतों को एक अलग अंदाज दिया.
मगर, कहानी सिर्फ इतनी भर नहीं है. लफ्जों की अदायगी और उनकी समझ मजरूह साहब में पैदाइश के बाद ही शुरू हो गई थी. देश जब महात्मा गांधी और पंडित जवाहर लाल नेहरू जैसे बड़े कांग्रेस नेताओं के नेतृत्व में आज़ादी की जंग लड़ रहा था, तब 1919 में 1 अक्टूबर को यूपी के आजमगढ़ में एक सिपाही के घर मजरूह पैदा हुए. मजरूह एक राजपूत परिवार में पैदा हुए थे, लिहाजा खानदानी परंपरा के तहत उन्हें भी स्कूली शिक्षा से दूर रखा गया और दीनी तालीम के लिए मदरसे भेजा गया. एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि राजपूत पढ़ने के लिए नहीं, लड़ने के लिए पैदा होते थे.
फुटबॉल खेलने पर लगा फतवा
मदरसे में इल्म हासिल करने के साथ ही मजरूह को फुटबॉल खेलने का शौक लग गया. लेकिन ये खेल इल्म देने वालों को पसंद नहीं आया और उन पर फतवा लगा दिया और उन्हें बाहर कर दिया गया. मदरसे से मजरूह ने अरबी और फारसी की तालीम पाई. इसके बाद लखनऊ कूच कर गए और हिकमत (यूनानी मेडिसिन) की पढ़ाई शुरू की.
तहसीलदार की बेटी से मोहब्बत हुई
हकीम बनकर वापस आए और फैजाबाद के टांडा में हकीमी करने लगे. यहां शायरी का शौक लग गया और यह नौजवान शायर वहां के तहसीलदार की बेटी के इश्क़ में पड़ गया, जिसकी उन्हें बिल्कुल इजाजत नहीं थी. लिहाजा, नतीजा ये हुआ कि जैसी-तैसी हकीमी चल रही थी, वो भी तहसीलदार के डर से छोड़कर मजरूह साहब को अपने सुल्तानपुर लौटना पड़ा. धीरे-धीरे उनकी शायरी हिकमत पर भारी पड़ने लगी और वो मशहूर होने लगे. इस दौरान उन्होंने उस वक्त के मशहूर शायर जिग़र मुरादाबादी को उस्ताद बना लिया.
एक मुशायरे ने बना दिया गीतकार
1945 की बात है, जब एक बार जिगर मुरादाबादी के साथ वह मुशायरे में शामिल होने मुंबई चले गए. उस मुशायरे में कई फिल्म मेकर्स भी थे, जिनमें अब्दुर राशिद कारदार भी मौजूद थे. मुशायरे में मजरूह साहब ने भी अपनी शायरी पढ़ी और उन्हें काफी तारीफें मिलीं. मुशायरे के बाद ए.आर कारदार ने जिगर मुरादाबादी से अपनी फिल्म शाहजहां के लिए गीत लिखने की पेशकश की. जिगर ने इससे इनकार करते हुए बॉल मजरूह के पाले में फेंक दी और कारदार को उनकी पसंद पर भरोसा करना पड़ा.
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हालांकि, मजरूह खुद फिल्मी गीत लिखने के लिए राजी नहीं थे, लेकिन उस्ताद जिगर मुरादाबादी का कहा वो टाल न सके और गीत लिखा.
मजरूह का पहला गीत
फिल्म शाहजहां 1946 में रिलीज हुआ और इसमें मजरूह साहब का पहला गाना 'जब दिल ही टूट गया...हम जी के क्या करेंगे...' लिया गया.
इस गीत में मानो मजरूह ने तहसीलदार की बेटी से अपने उस अधूरे इश्क़ का अक्स दिखाने की कोशिश की, जिसे उन्हें फैजाबाद के टांडा में छोड़ना पड़ा था. नौशाद साहब ने इस गीत को संगीत दिया और के.एस सहगल ने बड़े ही दिलकश अंदाज में उसे गाया.इस गीत से सहगल साबह इतना मुतास्सिर हुए थे कि उन्होंने अपने अंतिम संस्कार के वक्त इस गीत को बजाने की वसीयत की थी और उनकी मौत के वक्त ऐसा ही किया गया.
नहीं मांगी नेहरू से माफी
मजरूह के बोल फिल्मी गीत के जरिए जितना लोगों के मन को छू रहे थे, उनके क्रांतिकारी अल्फाज भी उतनी ही सुर्खियां बटोर रहे थे. आजादी से पहले से लेकर दुनिया से रुख्सत होने तक मजरूह साहब ने हर वक्त में अपने फ़न की मिसाल पेश की. उनके दिल में सिर्फ मोहब्बत भरी शायरी के लिए अल्फाज नहीं थे, बल्कि देश के मौजूदा हालात पर भी वो अपना कलम चलाते थे. जिसके लिए उन्हें न पारिवारिक मुसीबतें झेलनी पड़ीं, बल्कि जेल तक जाना पड़ा.
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दरअसल, देश आजाद होने के बाद पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू बने. अपनी एक कविता में उन्होंने नेहरू के खिलाफ टिप्पणी की. ये टिप्पणी नेहरू और उनके वफादारों को बड़ी नागवार गुजरी. लिहाजा, मजरूह को बोला गया कि वो नेहरू से माफी मांगे. लेकिन मजरूह जिद के पक्के. सत्ता की धमकियों का उनपर कोई असर नहीं हुआ और उन्होंने साफ कह दिया कि जो लिख दिया, सो लिख दिया और इसके बाद मजरूह को करीब 2 साल के लिए मुंबई की जेल में डाल दिया गया.
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इन पंक्तियों के लिए जाना पड़ा जेल
मन में जहर डॉलर के बसा के
फिरती है भारत की अहिंसा
खादी के केंचुल को पहनकर
ये केंचुल लहराने न पाए
अमन का झंडा इस धरती पर
किसने कहा लहराने न पाए
ये भी कोई हिटलर का है चेला
मार लो साथ जाने न पाए
कॉमनवेल्थ का दास है नेहरू
मार ले साथी जाने न पाए
दादा साहब फाल्के अवॉर्ड
मजरूह सुल्तानपुरी के काम को न सिर्फ पसंद किया गया, बल्कि उसे सम्मानित भी किया गया. मजरूह पहले ऐसे गीतकार थे, जिन्हें दादासाहब फाल्के सम्मान दिया गया. यह सम्मान उन्हें फिल्म दोस्ती के गीत 'चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे, फिर भी कभी अब नाम को तेरे..आवाज मैं न दूंगा..' के लिए दिया गया. 'मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर, लोग साथ आते गए
और कारवां बनता गया...' जैसे शेर लिखने वाले मजरूह सुल्तानपुरी 'रहें न रहें हम....महका करेंगे...बनके कली, बनके सबा...बाग़-ए वका में...' जैसे गीत लिखकर इस दुनिया से 24 मई, 2000 को 80 साल की उम्र में रुख्सत हो गए.