नवाजुद्दीन सिद्दीकी ऐसे ऐक्टर हैं, जिन्हें कैरेक्टर को जिंदा करना आता है. अगर कैरेक्टर दशरथ मांझी जैसा शख्स हो जिसने अपने जीवन के 22 साल एक पहाड़ को तोड़ने में लगा दिए हों तो उसे परदे पर जिंदा करना किसी के लिए भी चुनौती हो सकता है, लेकिन फिल्म के ट्रेलर को देखकर इस बात का अंदाजा हो जाता है कि नवाज इस चुनौती पर बखूबी खरे उतरे हैं.
किरदार में उतरने के लिए नवाजुद्दीन घंटों बैठे पहाड़ पर
'मांझीः द माउंटेन मैन' के डायलॉग और नवाज का कैरेक्टर दोनों ही गजब ढा रहे हैं और एक बेहतरीन फिल्म की झलक पेश करते हैं. फिल्म के कुछ डायलॉग दशरथ मांझी की जिजीविषा को बखूबी दिखा देते हैं. जैसे दशरथ बने नवाज कहते हैं, 'जब तक तोड़ेंगे नहीं, छोड़ेंगे नहीं.' नवाज इस फिल्म को अपने दिल के करीब मानते हैं और इस ट्रेलर को देखकर यह बात साफ भी हो जाती है कि कैसे उन्होंने कैरेक्टर को जिया है क्योंकि नवाज ने एक बार बताया था कि वह दशरथ मांझी के कैरेक्टर में उतरने के लिए घंटों पहाड़ पर बैठे उस रास्ते को देखा करते थे. डूब जाते थे, उसमें और अपने अंदर दशरथ को जिंदा करने की कोशिश करते थे. वाकई अगर 'मांझीः द माउंटेन मैन' की भाषा में कहें तो 'शानदार जबरजस्त.'
दशरथ मांझी ने 1960 में पहाड़ को तोड़ना शुरु किया था और वह भी सिर्फ हथौड़े के दम पर. उन्होंने किसी की कभी मदद नहीं ली. उन्होने 1982 तक आते-आते पहाड़ का सीना चीर दिया और रास्ता बना दिया. दशरथ मांझी की मौत 2007 में हुई.
कहानी एेसी जो दिल को छू ले
फिल्म को केतन मेहता ने डायरेक्ट किया है और इसमें उनके साथ लीड रोल में राधिका आप्टे भी हैं जो उनकी पत्नी बनी है. बेशक इतिहास में एक बादशाह ने अपने प्रेम की खातिर ताजमहल बनाया था, लेकिन इसमें एक प्रेम पुजारी अपनी पत्नी के खातिर पहाड़ का सीना चीर देता है, वह कहता है, 'यह भीतर का घाव है जब तक यह टूटेगा नहीं भरेगा नहीं.' नवाज की यह फिल्म 21 अगस्त को रिलीज हो रही है और इसका यह डायलॉग 'भगवान के भरोसे मत बैठिए. क्या पता भगवान हमरे भरोसे बैठा हो' एक इनसान के बुलंद हौसलों को बखूबी जाहिर भी कर देता है.
देखें फिल्म 'मांझीः द माउंटेन मैन' का ट्रेलर: