हम सब ने प्रकृति और पर्यावरण को समझने और सहेजने के मामले में सिर्फ लापरवाही ही बरती है. हम जब भी पर्यावरण और प्रकृति के संरक्षण की बात करते हैं तो जल संरक्षण सबसे ऊपर आता है. अगर जल को सहेजना और संरक्षित करना है तो उसके मर्म को स्पर्श करना यानी समझना जरूरी है. इसी बात को ध्यान में रखते हुए पर्यावरणविद और समाजसेवी राकेश खत्री के दिमाग में एक विचार आया. क्यों ना कुछ रोचक अंदाज में इन बातों को पिरोया और समझाया जाए ताकि यह सिर के ऊपर से नहीं गुजरे.
राकेश ने पुराने समय के मनोरंजन के साधन माने जाने वाले बायस्कोप का सहारा लिया और इसके जरिये लोगों को जागरूक करने का मन बनाया. उन्होंने इस विचार को जब अपनी टीम की अहम सदस्य अपनी पत्नी के साथ साझा किया तो उसे सजाने और संवारने की जिम्मेदारी उन्होंने ली.
बायस्कोप की टेक्नोलॉजी
5 मिनट 11 सेकेंड के जल चित्र में उन्होंने ताना बाना बुना. उन सब चीजों का समावेश किया जो जरूरी थीं जिसकी शुरुआत सभ्यता के जन्म से होती है. यानी इस पूरी अवधि में जल अपने जन्म से लेकर दोहन की कथा सुनाता नजर आता है. इसमें जल की शुरूआत से लेकर उसकी कमी के सिलसिले को पिरोया गया. एक दस इंच का टैब उसमें लगाया गया जिसे अच्छे किस्म के स्पीकर के साथ जोड़ा और तीन घंटे का बैटरी बैक उप दिया गया. फिल्म उसमे हर 20 सेकंड के गैप के बाद चलती है.
बायस्कोप में क्या है कहानी
शुरआत होती है सृष्टि की रचना से और फिर धरती पर मिलने वाली पहली बूंद मानव द्वारा उसका पहला स्पर्श और फिर सभ्यताओं का विकास और पानी को समेटने सहजने की तकनीक और उसकी बढ़ती जरूरत के हिसाब से उसका वितरण. इसे रोचक बनाने के लिये कुछ फिल्म के गाने के बोल जैसे ताल मिले नदी के जल में नदी मिले सागर में/ पीतल की मेरी गागरी दिल्ली से मोल मंगाई आदि. फिर एक खुश हाल समाज और दुनिया का नजारा दिखता है. समस्याएं भी इसमें पेश की गई हैं.
जल समस्या से निबटने वाले लोगों को भी इसमें दिखाया गया है और आखिरी चित्रों में लोगो से अपील और गुजारिश की गई है पानी को अपने पर्सनल बैंक अकाउंट की तरह इस्तेमाल करें, भविष्य की पीढ़ी को वैसा ही सुन्दर और संपन्न संसार दें जैसे हमारे पुरखों ने हमे दिया. उनकी योजना लगभग 1,000 बायस्कोप बनाने की है. इसमें कोशिश में वे सैकड़े के आंकड़े को छूने के करीब हैं. इन्हें लेकर वे उत्तर भारत के कई गांवों में गए हैं, जहां उन्हें अच्छा रिस्पॉन्स मिला है.