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Agenda Aajtak 2019: 'निर्भया कांड एक टेस्ट, पुलिस ने दिखाई मुस्तैदी, फिर न्याय में देरी क्यों'

निर्भया कांड यह जांचने का एक टेस्ट है कि आखिर बलात्कार जैसे जघन्य मामले में भी न्याय में देरी किस तरह से होती है. दिल्ली पुलिस के पूर्व आयुक्त नीरज कुमार ने एजेंडा आजतक 2019 को संबोधित करते हुए यह बात कही.

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एजेंडा आजतक के सत्र 'देर है तो अंधेर है'  में है शामिल वक्ता (फोटो: चंद्रदीप कुमार)
एजेंडा आजतक के सत्र 'देर है तो अंधेर है' में है शामिल वक्ता (फोटो: चंद्रदीप कुमार)

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  • निर्भया कांड में न्याय में देरी पर एजेंडा आजतक में दिग्गजों ने की चर्चा
  • दिल्ली पुलिस के पूर्व आयुक्त ने इस केस को न्यायिक व्यवस्था का एक टेस्ट बताया
  • नीरज कुमार ने कहा कि पुलिस ने इस मामले में 10 दिन में चार्जशीट दाख‍िल की थी

निर्भया कांड यह जांचने का एक टेस्ट है कि आखिर बलात्कार जैसे जघन्य मामले में भी न्याय में देरी किस तरह से होती है. दिल्ली पुलिस के पूर्व आयुक्त नीरज कुमार ने एजेंडा आजतक 2019 के सत्र 'देर है तो अंधेर है' को संबोधित करते हुए यह बात कही. इस सत्र को पूर्व न्यायाधीश जस्टिस उषा मेहरा, तिहाड़ जेल के पूर्व लॉ अफसर सुनील गुप्ता और मानवाधिकार कार्यकर्ता जॉन दयाल ने भी संबोधित किया.

पुलिस ने सिर्फ 10 दिन में चार्जशीट दाखिल की थी

नीरज कुमार ने कहा, 'निर्भया केस एक टेस्ट है यह जांचने का कि न्यायिक प्रक्रिया में देरी क्यों हो रही है और क्या हम इसे और जल्दी कर सकते हैं. निर्भया केस में 10 दिन के भीतर पुलिस ने चार्जशीट दाखिल कर दी थी. अगर 7 साल लग गए ट्रायल में तो हमारा दोष नहीं. कोई ऐसा दिन नहीं जब कोर्ट ने बुलाया हो और पुलिस पहुंची नहीं. इस केस में जब सब कुछ ठीक है तो फिर इतना समय क्यों लग रहा है?'

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कई बार FIR दर्ज करने में 6 महीने लग जाते हैं

जस्टिस उषा मेहरा ने कहा कि कई बार एक एफआईआर दर्ज करने में 6 महीने का समय लग जाता है. दिल्ली हाईकोर्ट ने सिफारिश की थी कि पुलिस की इनवेस्टीगेशन और प्रॉसीक्यूशन ब्रांच अलग कर देनी चाहिए. ऐसी वैन होनी चाहिए जिसमें साइंटिफिक इंस्ट्रुमेंट, फॉरेंसिक जांच आदि की सुविधा हो. शायद ऐसी वैन तैयार भी की गई है, लेकिन कहां इस्तेमाल हो रहा पता नहीं. रेप की विक्टिम नॉर्मल अस्पताल में नहीं जानी चाहिए, एक अलग विंग हो, एक एक्सपर्ट डॉक्टर और एक्सपर्ट नर्स हो.

हमारा सिस्टम एफिशिएंट नहीं है

तिहाड़ के पूर्व लॉ अफसर सुनील गुप्ता ने कहा, 'कैदियों की संख्या बढ़ती जा रही है, इसकी वजह से जेल 115 फीसदी ओवरक्राउड हैं. कनविक्शन रेट सिर्फ 30 फीसदी है यानी इसमें 70 फीसदी अंडरट्रायल कैदी होते हैं. यानी हमारा सिस्टम एफिशिएंट नहीं है.'

फांसी देना जरूरी नहीं

मानवाधिकार कार्यकर्ता जॉन दयाल ने कहा, 'हर चीज के लिए एक टाइमफ्रेम होना चाहिए. जस्ट‍िस को पक्का टाइमबाउंड होना चाहिए, लेकिन जिसका क्राइम प्रूव है उसी को सजा मिलेगी. सोशल फैक्टर भी हैं, गांवों में जाति, रुतबे की वजह से पुलिस वाले दबंग लोगों पर कार्रवाई नहीं करते, मेरा मानना है कि फांसी देना जरूरी नहीं, उम्रकैद दी जा सकती है. मर्सी पेटिशन को आप देरी मानते हैं, लेकिन यह भी न्याय का ए‍क हिस्सा है. यह पूरा एक सीरीज है, उसके आखिरी प्रक्रिया तक पूरा करना चाहिए. हर पेटिशनर का यह हक है.'

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