Agenda Aaj Tak 2023: 'एजेंडा आजतक' के महामंच पर उत्तरकाशी रेस्क्यू ऑपरेशन के हीरो और 17 दिन तक टनल में फंसे रहने वाले मजदूरों ने भी शिरकत की. उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस ऑपरेशन को एक चैलेंज की तरह लिया था. गुरुवार को Agenda Aaj Tak के मंच पर 'हम लाए हैं चट्टान से जिंदगी निकालके' विषय पर चर्चा की गई. इसमें उत्तरकाशी टनल सर्वाइवर अखिलेश, गब्बर सिंह नेगी, सुपरवाइजर सबा अहमद और रैट माइनर्स मुन्ना कुरैशी ने ऑपरेशन की पूरी कहानी सुनाई.
बता दें कि दिवाली की सुबह 12 नवंबर को उत्तराखंड के उत्तरकाशी में लैंडस्लाइड होने से निर्माणाधीन टनल में काम कर रहे 41 मजदूर फंस गए थे. इन मजदूरों को निकालने के लिए राज्य सरकार से लेकर केंद्र सरकार तक एक्टिव हुई. देश-विदेश के टनल एक्सपर्ट से राय ली गई और वो खुद ग्राउंड पर पहुंचे. पहाड़ को चीरकर मजदूरों को निकालने के लिए अमेरिकी निर्मित मशीन लगाई गईं. लेकिन, बड़ी सफलता नहीं मिल रही थी. ऐसे में रैट माइनर्स ने खुद की जान जोखिम में डाली और पाइप के जरिए अंदर पहुंचे और हाथों से खुदाई कर ऑपरेशन को पूरा करने में मददगार साबित हुए.
'शुरुआत में बाहर मैसेज पहुंचाने की चुनौती थी'
गुरुवार को 'एजेंडा आजतक' के मंच पर सभी ने बातचीत की. मिर्जापुर के रहने वाले अखिलेश ने टनल में 17 दिन तक फंसे रहने के दौरान आईं चुनौतियों के बारे में बात की. अखिलेश ने कहा, पहले दिन जब फंसे थे तो यह चुनौती थी कि बाहर अपना मैसेज कैसे पहुंचाया जाए. 16 घंटे बाद हम लोगों तक ऑक्सीजन पहुंचना शुरू हो गई थी. खाने के लिए चना वगैरह दिया जा रहा था. हम लोगों को लग रहा था कि किसी तरह बाहर से मैसेज आ जाए. ऑक्सीजन आई तो हमारी जान में जान आ गई. 70 प्रतिशत तक हम एनर्जी फुल हो गए थे. बाद में बाहर से मैसज आने लगे कि काम तेजी से चल रहा है. अंदर मशीनों की आवाजें आ रही थीं. खाने को मिलने लगा तो टेंशन कम हो गई थी.
'24 घंटे तक आती रही बिजली'
अखिलेश कहते हैं कि हम लोग पाइप के जरिए बात करते थे. बाहर से हल्की आवाजें भी अंदर आती थीं. हम लोगों को जोर-जोर से बोलना पड़ती थी. मलबा और पाइप हटाने में वक्त लग रहा था. जहां हम फंसे थे, वहां टनल की लंबाई ढाई किमी तक थी. टनल की चौड़ाई 14 मीटर और ऊंचाई 10 मीटर थी. अटल टनल के बाद ये देश की दूसरी सबसे लंबी टनल है. 17 दिन हम लोग अंदर रहे, लेकिन एक मिनट के लिए लाइट नहीं गई. इसलिए अंधेरा भी नहीं था. बिजली की केबिल अंडरग्राउंड डाली गई थी. अंदर 25-26 ट्रांसफॉर्मर रखे थे.
'छिलके खाकर मिटाई थी भूख'
गब्बर सिंह नेगी ने कहा, पूरे घटनाक्रम को अल्फाजों में बयां नहीं किया जा सकता है. मैं यही कहना चाहता हूं कि वो घड़ी हमारे किसी दुश्मन को भी ना देखना पड़े. दुश्मन के सामने भी इस तरह का नजारा सामने ना आए. बहुत ही खतरनाक स्थिति थी. वो दिन याद करते हैं तो रूह कांप जाती है. वो वक्त बहुत मुश्किल और कठिन था. शुरुआत में अंदर पानी पीने की समस्या थी. पूरी दुनिया से संपर्क टूट गया था. भूख लग रही थी तो कुछ खाने के लिए आगे बढ़े. एक जगह रास्ते में मूंगफली और केले के छिलके पड़े मिले तो वो उठाए और बांटकर खाए थे. हम लोग आपस में कह रहे थे कि ज्यादा से ज्यादा समय जिंदा रहना है. हमारी आंखों के सामने 40 जिंदगियां थीं. उन सभी का हौसला बनाकर रखना था. हम सब मजदूर थे तो कोई रो रहा था, कोई परिवार को याद कर रहा था. उन सभी का हौसला बनाकर भी एक चुनौती थी.
'पाइप के जरिए संपर्क हो पाया'
गब्बर कहते हैं कि हादसे से पहले हम लोगों का रुटीन था. सुबह पर काम पर जाने से पहले घरवालों को फोन करते थे और बताते थे कि हम काम करने के लिए टनल में जा रहे हैं. हादसे के बाद अंदर ऐसे फंसे कि बाहर निकलने का कोई मौका ही नहीं मिला. परिवार को कुछ बता नहीं पा रहे थे कि हम लोग किस तरह और किस हाल में फंसे हैं. वो दिवाली का दिन था. घर में सब लोग दिवाली मनाने की तैयारी में थे. घर में बूढ़ी माता और बच्चे-परिवार मेरे फोन आने का इंतजार कर रहे थे. बाद में मेरे बच्चों ने देहरादून में रहने वाले भाई को फोन किया. उसके बाद सभी लोग टनल साइट पर पहुंचे. बाहर घरवालों का बुरा हाल था. मेरे और परिवार के बीच एक दीवार खड़ी हो गई थी. कुछ समय बाद पाइप के जरिए संपर्क हो पाया. वो देख नहीं पा रहे थे, इसलिए घबरा भी रहे थे. हालांकि, परिवार और कंपनी से जुड़े लोगों ने खूब हौसला बढ़ाया.
गब्बर कहते हैं कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी मौके पर पहुंचे. बाहर से प्रधानमंत्री भी ऑपरेशन पर नजर बनाए हुए थे. पाइप से हम लोग बहुत तेज आवाज में बात करते थे, ताकि बाहर लोगों को लगे कि हम लोग पूरी तरह स्वस्थ हैं.
'ऑक्सीजन आने से जिंदा रहने की उम्मीद बढ़ी'
बिहार के आरा के रहने वाले सबा अहमद कहते हैं कि दिवाली के दिन सुबह 5.30 बजे एक मैसेज आया कि टनल ढह गई है. मैं और एक साथी गाड़ी से मौके पर पहुंचे. यह हादसा टनल में पीछे की तरफ हुआ था. वहां जाकर देखा तो हादसा बहुत बड़ा था. किसी का दिमाग कम नहीं कर रहा था. वॉकी-टॉकी और मोबाइल भी काम नहीं कर रहे थे. चूंकि किसी भी टनल में दो या तीन पाइप पहले से रहते हैं. एक पाइप में साफ पानी अंदर जाता है और दूसरे में खराब पानी बाहर निकलता है. तीसरा एक चार इंची की पाइप लाइन थी. उसे डिवाटरिंग किया तो मैसेज बाहर जाना शुरू हो गए. इस पूरी प्रक्रिया में रात 12 बजे गए. इस बीच भूख भी तेज लगने लगी. टनल में ही कहीं बादाम (मूंगफली) के छिलके और केले के छिलके पड़े मिल गए. जिंदा रहने के लिए उन छिलकों को खाया. रात एक बजे साउंड आया तो पता चला कि ऑक्सीजन आना शुरू हो गई और हम लोगों को भी जिंदा रहने की उम्मीद बढ़ गई. हालांकि, हम लोग भी मानकर चल रहे थे कि बाहर निकलने में समय लगेगा. 15 से 20 दिन लगने की उम्मीद कर रहे थे. लेकिन, घरवाले यह बात नहीं समझते हैं. वो पूरी प्रक्रिया नहीं जानते हैं. उन्हें टेंशन हो रही थी.
'बिहार सरकार ने सुध नहीं ली'
सबा अहमद कहते हैं कि हम लोगों ने यह तय कर लिया था कि घर की टेंशन नहीं लेंगे. क्योंकि जितना सोचेंगे, उतनी ही तबीयत बिगड़ेगी. अपने बारे में सोचना शुरू किया. अच्छे से खाने और रहने के लिए मोटिवेट किया. जहां रह रहे थे, वहां साफ-सफाई का विशेष ख्याल रखा. हम लोग उत्तराखंड सरकार, केंद्र सरकार और कंपनी को शुक्रिया कहना चाहते हैं. हालांकि, हमें इस बात का मलाल है कि हमारे राज्य बिहार की सरकार की तरफ से किसी ने सुध नहीं ली. मंत्री या अधिकारी तक हाल चाल लेने नहीं पहुंचा. हमारे घर पर भी कोई नहीं आया. ब्लॉक स्तर के अधिकारी ने भी आना मुनासिब नहीं समझा. ये दुख की बात है. मैं पूछना चाहता हूं कि बिहार सरकार बनाने में मेरा सहयोग नहीं है क्या? झारखंड-यूपी के अधिकारी मौके पर पहुंचे. जितने राज्यों के लोग फंसे थे, हर राज्य ने अपने अधिकारियों को मौके पर भेजा और सम्मानित किया. सिर्फ बिहार को छोड़कर.
'रैट माइनर्स अंदर पहुंचे तो मजदूरों ने खिलाई चॉकचेट'
रैट माइनर्स मुन्ना कुरैशी कहते हैं कि मेरे पार्टनर वकील हसन के पास 22 नवंबर को सूचना आई थी. उन्होंने मुझे पूरी घटना के बारे में बताया. मैंने मौके का वीडियो मंगाया और देखा. उसके बाद मैंने पार्टनर से कहा कि हम साइट पर चलेंगे और मदद करेंगे. उन्होंने मुझसे कहा कि एक घंटे में जाना है. तुरंत अपनी पूरी टीम के साथ तैयार हो जाओ. हम 12 लोगों की टीम के साथ 24 नवंबर की सुबह मौके पर पहुंचे. इनमें 6 लोग दिल्ली के रहने वाले थे. हम लोग अपने खर्चे पर जाने को तैयार थे, क्योंकि अंदर 41 जिंदगियों पर संकट था. जैसे हम मजदूर हैं, वैसे ही वो मजदूर थे- जो 17 दिन से अंदर फंसे थे. हम लोग अंदर गए तो देखा कि सरिया डले हैं. रोड भी बहुत थे. खुदाई करना आसान काम नहीं था. ऑर्गर मशीन के ऑपरेटर ने कहा कि हम एक बार फिर ट्राई करेंगे. लेकिन हालात देखकर मैंने उनसे कहा कि वहां मशीन के काम करने की कंडीशन नहीं है. फंस जाएगी. कुछ देर बाद वही हुआ, जो आशंका थी. हम लोग टेंशन में आ गए. तीन दिन बाद ऑर्गर मशीन निकल पाई. हमारा ऑपरेशन तीन दिन लेट हो गया. हम लोग अंदर खुदाई के लिए घुसे. गाटर और चैनल काटे गए. बहुत मुश्किलें आईं. टीम के साथियों को हाथ-पैर में चोटें पहुंचीं, लेकिन किसी ने हार नहीं मानी. मेरे मन में यही चल रहा था कि मजदूरों पर कोई आंच नहीं आना चाहिए. देश का सवाल है. हम लोग पीछे नहीं हटे. टनल के अंदर टॉयलेट-बाथरूम नहीं थी. मशक्कत के बाद हम लोग पहली बार मजदूर साथियों तक पहुंचे. वहां मजदूरों ने हमें चॉकलेट खिलाई. मेरी टीम के साथियों को काजू-बादम खिलाए. मजदूरों ने कहा कि आप हमारे लिए भगवान के ओहदे जैसे हैं. हम लोग सभी मजदूर साथियों को बाहर निकालने में कामयाब हो गए.