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क्या डोनाल्ड ट्रंप की यूरोप पर नाराजगी खुद अमेरिका पर पड़ेगी भारी, क्यों चीन उठा सकता है फायदा?

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कई इंटरनेशनल फोरम्स से पीछे हटने की बात कर रहे हैं. यहां तक कि NATO भी इससे नहीं छूटा. इस बात पर पक्के सहयोगी माने जाते यूरोपियन यूनियन और यूएस के बीच दरार दिखने लगी. इसका फायदा चीन को मिल सकता है. अमेरिकी दो-टूक के बीच बीजिंग यूरोप को अपने पाले में लेने की कोशिश में है.

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अमेरिकी दूरी के बीच चीन और यूरोप करीब आ सकते हैं. (Photo- Getty Images)
अमेरिकी दूरी के बीच चीन और यूरोप करीब आ सकते हैं. (Photo- Getty Images)

जर्मनी में हाल ही में म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन (MSC) के दौरान अमेरिकी उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस ने यूरोप को लेकर जरा टेढ़ा रुख दिखाया. उन्होंने कहा कि NATO बना रहे, इसके लिए यूरोपियन यूनियन के देशों को भी अपना डिफेंस बजट बढ़ाना चाहिए. ट्रंप भी यही बात कहते हुए नाटो से हाथ खींचने तक के बयान दे चुके. वाइट हाउस में सत्ता परिवर्तन के बीच अमेरिका और यूरोप संबंध पहली बार तल्ख दिख रहे हैं. इसका फायदा चीन उठा सकता है. 

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ट्रंप के आने के बाद से अमेरिका-ईयू के बीच जैसे रिश्ते हो रहे हैं, उसमें चीन दो बिल्लियों की लड़ाई में बंदर की भूमिका में आ सकता है, जिसके हिस्से रोटी का बड़ा हिस्सा चला आए. दरअसल बीते हफ्ते हुए म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन के दौरान जेडी वेंस अमेरिका का प्रतिनिधित्व कर रहे थे.

यूरोपियन यूनियन को उम्मीद थी कि वेंस कुछ न कुछ भूल सुधार करेंगे और यूरोपियन सुरक्षा पर बड़ी बात करेंगे. वेंस ने सुरक्षा पर बात तो की, लेकिन उलट तरीके से. ट्रंप की बात को दोहराते हुए उन्होंने यूरोप से अपना डिफेंस बजट बढ़ाने को कह दिया. साथ ही ये भी कह दिया कि कॉन्टिनेंट को सबसे बड़ा खतरा बाहर से नहीं, बल्कि खुद भीतर से है. उन्होंने यूरोपियन सरकारों पर हेट स्पीच को बढ़ावा देने का आरोप तक लगा दिया. 

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म्यूनिख में चीन की तरफ से विदेश मंत्री वांग यी मौजूद थे. उनकी टोन मुलायम और संवेदना भरी रही. यी ने कहा कि बीजिंग यूरोप को साथी की तरह देखता है, न कि दुश्मन की तरह. उन्होंने यूरोप की ताजा चिंता यानी रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर भी पीस डील की बातें कीं. 

america and european union tension and china benefit amid russia ukraine war photo Getty Images

चीन फिलहाल उस एकतरफा प्रेमी की भूमिका में है, जो लंबे समय से एक रिश्ता कमजोर पड़ने का इंतजार कर रहा था ताकि खुद बीच में आ सके.

हालांकि, जितना दिख रहा है, यह उतना आसान नहीं. बीजिंग और यूरोपियन यूनियन के रिश्ते काफी समय से या तो ठंडे रहे, या दोनों के बीच तनाव रहा. बीते कुछ सालों में उइगर मुस्लिमों के साथ कथित नाइंसाफी के चलते ईयू ने चीन पर कई बार नाराजगी दिखाई. कोविड के दौरान दोनों में अविश्वास और बढ़ा. यहां तक कि चीन और ईयू दोनों ने ही एक-दूसरे पर कई तरह के व्यापारिक प्रतिबंध तक लगा दिए, जो अब तक जारी हैं. 

कुल मिलाकर, यूरोप के साथ बीजिंग का मामला जरा पेचीदा ही है. ऐसे में जिनपिंग सरकार को यूरोप का यकीन हासिल करने के लिए कुछ बड़ा करना होगा. जैसे वो यूक्रेन और रूस युद्ध में शांति दूत की भूमिका निभाना चाह रहा है. बता दें कि तीन साल से चली आ रही ये जंग यूरोप के लिए बड़ा डर बन चुकी. उसे आशंका है कि रूस को अगर इस बार मन की करने का मौका मिला, तो बाल्टिक देशों से होते हुए वो यूरोप के भीतर तक आ सकता है. 

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जिनपिंग सरकार शांति प्रस्ताव की बात कर ही रही थी कि इस बीच ट्रंप वाइट हाउस पहुंच गए. अब वे जंग को रोकने में एक्टिव भूमिका में हैं. लेकिन सवाल ये है कि यूरोप को इसपर क्यों एतराज हो रहा है?

असल में ट्रंप शांति दूत बन तो रहे हैं लेकिन यूक्रेन की बजाए वे रूस के लिए नर्म हैं. उन्होंने यूक्रेन को नाटो में शामिल करने से साफ इनकार कर दिया. साथ ही वॉशिंगटन और मॉस्को इस लड़ाई को ऐसे डिस्कस करते दिख रहे हैं, जैसे कीव सीन में हो ही नहीं. यही बात यूरोप को परेशान कर रही है. 

america and european union tension and china benefit amid russia ukraine war photo AFP

कैसा है ट्रंप-काल में चीन से रिश्ता

ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के बारे में अंदाजा लगाया जा रहा है कि वे बीजिंग पर और भी ज्यादा सख्त हो सकते हैं. कोविड के दौरान बार-बार उन्होंने कोरोना वायरस को चाइनीज वायरस कहा था. साथ ही WHO तक को घेरा था कि वो जिनपिंग की गलतियां छिपा रहा है.

बाइडेन प्रशासन चीन को लेकर कुछ उदार रहा लेकिन साल 2023 में स्पाई बैलून दिखने की घटना ने ये उदारता एक झटके में खत्म कर दी. तब यूएस के आसमान में कुछ गुब्बारे दिखे थे, जिनके बारे में कहा गया कि चीन ने उन्हें जासूसी के लिए भेजा है. अब वाइट हाउस में ट्रंप हैं, जो चीन के लिए अपने कड़े रुख के लिए जाने जाते रहे, खासकर व्यापार के मामले में. टैरिफ लगाने से इसकी शुरुआत भी हो चुकी. तो कुल मिलाकर, ये पक्का है कि आने वाले दिनों में दोनों देशों के बीच संबंध कुछ नरम-गरम ही रहेंगे. 

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यूरोप में चीन किस स्थिति में

साल 2019 में यूरोपियन यूनियन ने चीन को रणनीतिक प्रतिद्वंदी कहा था. उसने बीजिंग की विस्तारवादी नीति को लेकर बार-बार सवाल उठाए और उसे लोकतंत्र और शांति के लिए खतरा तक बता दिया. ईयू के स्टैंड के बीच चीन अलग-अलग देशों को साध रहा था जैसे उसने हंगरी में भारी इनवेस्टमेंट किया. जैसे वहां चीनी फुडान यूीनिवर्सिटी बनी, जो देश के कुल एजुकेशन बजट से कहीं ज्यादा थी. इसपर हंगरी में काफी हंगामा भी हुआ था. ईयू ने भी हंगरी और चीन की बढ़ती नजदीकी पर सवाल उठाए थे. 

हालांकि ये सारी बातें कुछ पुरानी हैं. नया ये है कि अमेरिका, जो कि ईयू का लगभग प्रोटेक्टर रहा, वो धीरे-धीरे अपने हाथ पीछे कर रहा था. इससे यूरोप पर नए सिरे से अपने डिफेंस पर सोचने का दबाव बढ़ेगा. ऐसे में बीजिंग अगर उसका मददगार बनकर आए, तो वो अमेरिका की जगह वक्ती तौर पर ही सही, लेकिन ले सकता है. 

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