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जहरीली शराब से बिहार में फिर मौतें... जानें क्यों फेल हो जाती है शराबबंदी? और किन-किन राज्यों में एल्कोहल पर बैन?

बिहार में जहरीली शराब की वजह से एक बार फिर मौतें हुईं हैं. मोतिहारी में जहरीली शराब पीने से अब तक 22 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 29 लोग अस्पताल में भर्ती हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि बिहार में शराबबंदी के सात साल हो चुके हैं, फिर भी जहरीली शराब पीने से होने वाली मौतें थम क्यों नहीं रहीं हैं?

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बिहार में अप्रैल 2016 से शराबबंदी लागू है. (फाइल फोटो-PTI)
बिहार में अप्रैल 2016 से शराबबंदी लागू है. (फाइल फोटो-PTI)

शराबबंदी वाले बिहार में एक बार फिर से जहरीली शराब पीने से दो दर्जन लोगों की मौत हो गई है. इस बार पूर्वी चंपारण में जहरीली शराब पीने से अब तक 22 लोगों की मौत हो चुकी है. 

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पूर्वी चंपारण जिले की पुलिस ने एक बयान जारी कर बताया कि मोतिहारी के तुर्कौलिया, हरसिद्धि, सुगौली और पहाड़पुर गांव में 22 लोगों की मौत हो चुकी है. 29 लोग अब भी जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहे हैं, जिनमें से चार की हालत बहुत गंभीर है.

पुलिस ने दावा किया है कि इस मामले में अब तक 80 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है. जिला प्रशासन ने भी 11 पुलिसकर्मियों को सस्पेंड कर दिया है. इसके अलावा मोतिहारी के अलग-अलग गांवों में तैनात 9 चौकीदारों को भी सस्पेंड किया जा चुका है.

इतना ही नहीं, ये घटना होने के बाद मोतिहारी में पुलिस ने 600 से ज्यादा ठिकानों पर छापेमारी की. इस छापेमारी में पुलिस ने सैकड़ों लीटर जहरीली शराब और केमिकल बरामद किए हैं. 

पिछले साल दिसंबर में भी सारन जिले में जहरीली शराब पीने से कई लोगों की मौत हुई थी. तब राज्य सरकार ने बताया था कि जहरीली शराब की वजह से 42 लोगों की मौत हुई है. हालांकि, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कम से कम 77 मौतें होने का दावा किया था.

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बिहार में 2016 से है शराबबंदी

2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार ने शराबबंदी (Alcohol Ban) करने का वादा किया था. उनके इस वादे का असर ये हुआ था कि महिलाओं का वोटिंग प्रतिशत 60 के करीब हो गया था. कई इलाकों में तो 70 फीसदी से ज्यादा महिलाओं ने वोट दिया था. 

सरकार बनने के बाद अप्रैल 2016 में बिहार में शराबंबदी का कानून आया. 1 अप्रैल 2016 को बिहार देश का 5वां ऐसा राज्य बन गया जहां शराब पीने और जमा करने पर प्रतिबंध लग गया.

किन-किन राज्यों में है शराबबंदी?

बिहार इकलौता राज्य नहीं है, जहां पूरी तरह से शराबबंदी लागू है. देश के कई राज्यों में शराबबंदी लागू है. गुजरात पहला राज्य था, जिसने शराबबंदी लागू की थी. 

1960 में बॉम्बे से अलग होकर जब गुजरात बना, तभी से वहां शराबबंदी लागू है. उसके बावजद भी बीते 6 साल में गुजरात में 54 लोगों की मौत जहरीली शराब पीने से हो गई. बीते साल जुलाई में गुजरात के बाटोद जिले के रोजिद गांव में कथित तौर पर जहरीली शराब पीने से दर्जनों लोगों की मौत हो गई थी.

मिजोरम, नागालैंड और लक्षद्वीप में भी पूरी तरह से शराबबंदी लागू है. मणिपुर में भी 1991 से शराबबंदी थी, लेकिन अब सरकार ने इसमें थोड़ी छूट दे दी है. सरकार का कहना था कि अवैध शराब पीने से स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं को कम करने और रेवेन्यू बढ़ाने के लिए ये फैसला लिया गया है. 

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कुल मिलाकर देखा जाए तो बिहार, गुजरात, मिजोरम, नागालैंड और लक्षद्वीप में पूरी तरह से शराबबंदी लागू है.

इन राज्यों में हो चुके हैं प्रयोग

शराबबंदी को लेकर प्रयोग होते रहे हैं. कई राज्यों में भी शराबबंदी को पहले लागू किया गया, लेकिन बाद में उसे हटा दिया गया है. 

आंध्र प्रदेश ने भी 1995 में शराबबंदी को लागू किया था. लेकिन इस बीच सत्ता बदली और चंद्रबाबू नायडू सीएम बन गए. उन्होंने 1997 में 16 महीने पहले शराब पर लगाए गए प्रतिबंध को हटा दिया. रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन 16 महीनों में सरकार को 1200 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था. 

हरियाणा ने भी 1996 में शराबबंदी को लागू किया था, लेकिन दो साल बाद ही 1998 में इस प्रतिबंध को हटा लिया. मणिपुर ने भी पिछले साल अपनी एक्साइज पॉलिसी में बदलाव किया है. यहां 1991 से शराबबंदी लागू थी, लेकिन अब इसमें कुछ छूट दी गई है.

शराबबंदी क्यों नहीं होती सफल?

इसके दो बड़े कारण हैं. पहला तो ये शराबबंदी के बावजूद अवैध शराब की तस्करी होती रहती है और दूसरा सरकार के रेवेन्यू को नुकसान. 

अब जैसे गुजरात में ही 1961 से शराबबंदी लागू है, लेकिन पड़ोसी राज्यों से यहां शराब की तस्करी होती है. बीते साल गुजरात के सूरत में पुलिस ने 56 लाख रुपये की अवैध शराब जब्त की थी. वहीं, गुजरात चुनाव के समय चुनाव आयोग ने करीब 15 करोड़ रुपये की शराब जब्त की थी.

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इसके अलावा, शराबबंदी करने से राज्य सरकार के रेवेन्यू को अच्छा-खासा नुकसान पहुंचता है. उदाहरण के लिए, शराबबंदी से पहले बिहार को हर साल लगभग 4 हजार करोड़ रुपये का रेवेन्यू मिलता था.

मणिपुर सरकार ने भी शराबबंदी के नियमों में ढील इसीलिए ही दी है ताकि रेवेन्यू बढ़ सके. सरकार को नियमों में ढील देने से सालाना 600 करोड़ रुपये का रेवेन्यू मिलने की उम्मीद है.

कितना बड़ा है अवैध शराब का कारोबार?

फेडरेशन ऑफ इंडियन चैम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (FICCI) की रिपोर्ट बताती है कि देश में अवैध शराब का कारोबार 23 हजार 466 करोड़ रुपये का है. फिक्की के मुताबिक, अवैध शराब की तस्करी की वजह से सरकार को 15 हजार 262 करोड़ रुपये का नुकसान होने का अनुमान है. 

अवैध शराब यानी जिसका कोई रिकॉर्ड नहीं है. ये शराब बिना किसी रिकॉर्ड के बिकती है. इसकी तस्करी होती है और इस पर कोई टैक्स नहीं दिया जाता है. लिहाजा अवैध शराब की तस्करी से सरकार को रेवेन्यू लॉस होता है, लोगों की मौत होती है तो दूसरी ओर शराब कारोबारी पैसा कमाते हैं. 

एक अनुमान के मुताबिक, भारत में हर साल पांच अरब लीटर शराब पी जाती है. इसमें 40 फीसदी से ज्यादा अवैध तरीके से बनाई जाती है और ये सस्ती होती है. ग्रामीण इलाकों में देसी शराब ज्यादा पी जाती है. जबकि, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का अनुमान है कि भारत में हर साल शराब की जितनी खपत होती है, उसमें से 50 फीसदी अवैध तरीके से बनती और बिकती है.

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बिहार में शराब की खपत महाराष्ट्र से ज्यादा 

बिहार में शराबबंदी लागू है, लेकिन यहां शराब की खपत महाराष्ट्र से भी ज्यादा है. महाराष्ट्र में शराबबंदी नहीं है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (NFHS-5) के आंकड़े बताते हैं कि ड्राई स्टेट होने के बावजूद बिहार में महाराष्ट्र से ज्यादा शराब की खपत होती है. 

आंकड़ों के मुताबिक, बिहार में 15.5% पुरुष शराब पीते हैं. जबकि, महाराष्ट्र में शराब पीने वाले पुरुषों की तादात 13.9% है. हालांकि, 2015-16 की तुलना में बिहार में शराब पीने वाले पुरुषों में काफी कमी आई है. 2015-16 के सर्वे के मुताबिक, बिहार में करीब 28 फीसदी पुरुष शराब पीते थे. 

NFHS-5 के आंकड़े ये भी बताते हैं बिहार के ग्रामीण और शहरी इलाकों में महाराष्ट्र की तुलना में शराब पीने वालों की संख्या ज्यादा है. बिहार के ग्रामीण इलाकों में 15.8% और शहर में 14% पुरुष शराब पीते हैं. वहीं, महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में 14.7% और शहरी इलाकों में 13% पुरुष शराब का सेवन करते हैं.

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