इंडिया बनाम भारत को लेकर घमासान शुरू हो चुका है. इस आग को हवा देने का काम किया राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के उस निमंत्रण पत्र ने, जो G20 के दौरान आने वाले मेहमानों को भेजा गया था. इसमें सबसे ऊपर प्रेसिडेंट ऑफ भारत लिखा था. अमूमन यहां प्रेसिडेंट ऑफ इंडिया दिखता है. चर्चा है कि केंद्र सरकार संविधान से 'इंडिया' शब्द हटाकर केवल भारत रखने का प्रस्ताव ला सकती है. इस बीच ये बात भी हो रही है कि नाम बदलने में देश को कितने पैसे खर्च करने होंगे.
नाम बदलने पर क्या बदलता है
दुनिया में 190 से ज्यादा देश हैं, जिनमें से कइयों ने किसी न किसी कारण से अपना नाम बदला. कोई गुलामी के दौर को भुलाना चाहता था, तो कोई इसे कल्चर से जोड़ रहा था. यानी भारत अगर ऐसा चाहे तो इतिहास में वो पहला नहीं होगा, लेकिन सवाल ये है कि नाम बदलने पर अकेला बोलचाल का नाम नहीं बदलेगा, बल्कि कागजों, वेबसाइटों, आर्मी की यूनिफॉर्म, और यहां तक कि लाइसेंस प्लेट में भी चेंज दिखेगा. ये सब काफी खर्चीला हो सकता है.
कैसे लगा सकते हैं खर्च का अनुमान
जैसा कि हम पहले कह चुके, इस बात का कोई फिक्स्ड फॉर्मूला नहीं है. ये इस तरह से नहीं है कि कोई अपने घर की नेमप्लेट पर लिखी टाइल हटाकर नई टाइल जोड़ना चाहे. देश के आकार और उसके डॉक्युमेंटेशन पर काफी कुछ तय रहता है. दक्षिण अफ्रीका के इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी लॉयर डैरेन ऑलिवियर इसपर लंबे समय से काम कर रहे हैं. वे अफ्रीकी देशों में नाम बदलने की स्टडी के आधार पर कई बातें कहते हैं.
उन्होंने साल 2018 में साउथ अफ्रीकी देश स्वाजीलैंड का नाम बदले जाने पर लंबी स्टडी की थी. उसका नाम इस्वातिनी किया जाने में लगभग 5 सौ करोड़ का खर्च आया था, जिसकी गणना इस शख्स ने पहले ही कर डाली थी.
इस तरह से लगा सकते हैं अंदाजा
नाम बदलने पर कितना खर्च आएगा, ये उस देश की टैक्सेबल और नॉन-टैक्सेबल इन्कम पर निर्भर करता है. नाम बदलना वैसा ही है, जैसे किसी बहुत बड़े कॉर्पोरेट ग्रुप की रीब्रांडिंग करना. मान लीजिए, कोई मीडिया हाउस अपना नाम बदलना चाहे, तो कागजों में, बैंक में तो इसे बदला ही जाएगा, साथ ही बड़ा खर्च लोगो बदलने और लोगों के दिमाग में अपनी छवि की रीब्रांडिंग में लगेगा.
एक्सपर्ट्स की मानें तो कॉर्पोरेट हाउस की औसत मार्केटिंग कॉस्ट उसके कुल रेवेन्यू का 6 प्रतिशत होती है. दूसरी ओर रीब्रांडिंग की कवायद उसके मार्केटिंग बजट का 10 प्रतिशत या उससे कुछ ज्यादा हो सकती है. बड़े कॉर्पोरेट पर इससे खास फर्क नहीं पड़ता, लेकिन छोटी कंपनियों के लिए ये नुकसान का सौदा है. यही बात कम और ज्यादा जीडीपी वाले देशों पर भी लागू होती है.
भारत पर खर्च होंगे 14 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा
ऑलिवियर मॉडल के हिसाब से जाएं तो भारत का नाम बदलने में 14 हजार करोड़ के करीब खर्च हो सकते हैं. ये बात लल्लनटॉप ने आउटलुक की खबर के हवाले से लिखी है. इसके मुताबिक सेंटर देशवासियों की फूड सिक्योरिटी पर जितना खर्च करती है, रीब्रांडिंग में लगभग उतना ही खर्च आ सकता है.
ये आंकड़ा निकला कैसे?
आउटलुक की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2023 में खत्म हुए वित्तीय वर्ष के लिए भारत की राजस्व प्राप्ति 23 लाख 84 हजार करोड़ रुपये थी. इसमें टैक्सेबल और नॉन-टैक्सेबल रेवेन्यू दोनों शामिल हैं. इस आंकड़े को अगर ऑलिवियर मॉडल में फिट किया जाए तो भारत का नाम बदलने की प्रोसेस में करीब-करीब 14 हजार 304 करोड़ रुपये का खर्च आ सकता है.
देश में कई शहरों के नाम बदले जा चुके
आजादी के बाद की बात करें तो अब तक 21 राज्यों ने अपने यहां 2 सौ से ज्यादा स्थानों के नाम किसी न किसी कारण से बदल दिए. अगर केवल राज्य की बात करें तो उसकी रीब्रांडिंग में 3 से लेकर हजार करोड़ रुपए तक का खर्च आ सकता है. ये इसपर निर्भर है कि राज्य कितना बड़ा है और बदलाव कहां-कहां करने होंगे.
कौन से शहर टॉप पर हैं
- सबसे ज्यादा बार नाम बदलने का रिकॉर्ड आंध्र प्रदेश के पास है. इसने अपने यहां 76 स्थानों के नाम बदल दिए.
- इसके बाद तमिलनाडु का नंबर आता है, जहां 31 बार नाम बदला गया, जबकि फिर 26 बदलावों के साथ केरल आता है.
- स्वतंत्रता के बाद से अब तक 9 राज्यों और 2 संघशासित प्रदेशों का नाम बदल दिया गया.
राष्ट्रपति के नाम से भेजे हुए इनविटेशन पर भले ही प्रेसिडेंट ऑफ भारत लिखा दिख रहा हो, लेकिन अब तक सरकार ने इसपर कोई आधिकारिक रिएक्शन नहीं दिया है. यानी ये साफ नहीं है कि इंडिया पूरी तरह से भारत कहलाने लगेगा. फिलहाल केवल चर्चा ही है.