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15 दिन रोशनी, 15 दिन अंधेरा... चंद्रयान-3 का लैंडर जहां उतरा, वो जगह कैसी है?

भारत ने इतिहास रच दिया. चंद्रयान-3 का लैंडर बुधवार शाम 6 बजकर 4 मिनट पर चांद की सतह पर उतर गया. ये लैंडर चांद के दक्षिणी ध्रुव के पास उतरा है. ऐसा करने वाला भारत, दुनिया का पहला देश बन गया है. लेकिन जहां चंद्रयान-3 का लैंडर उतरा है, वो जगह आखिर है कैसी? जानते हैं...

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चंद्रयान-3 का लैंडर चांद के दक्षिणी ध्रुव के पास उतर गया है.
चंद्रयान-3 का लैंडर चांद के दक्षिणी ध्रुव के पास उतर गया है.

इस साल जुलाई की 14 तारीख को दोपहर 2 बजकर 35 मिनट पर जब चंद्रयान-3 को लॉन्च किया गया था, तब उसके साथ 140 करोड़ लोगों की उम्मीदें भी थीं. उम्मीद थी, चांद पर सॉफ्ट लैंडिंग करने की. उम्मीद थी, दुनिया को भारत की ताकत दिखाने की. उम्मीद थी, इतिहास रचने की. और ठीक 40 दिन बाद 23 अगस्त को शाम 6 बजकर 4 मिनट पर ये सारी उम्मीदें पूरी हो गईं.

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पहली उम्मीद पूरी करते हुए चंद्रयान-3 के लैंडर ने चांद पर सॉफ्ट लैंडिंग कर दी. ऐसा करते ही दूसरी उम्मीद भी पूरी हो गई और दुनिया ने भारत की ताकत देख ली. तीसरी उम्मीद पूरी करते हुए चंद्रयान-3 के लैंडर ने चांद के दक्षिणी ध्रुव के पास उतरकर इतिहास रच दिया. 

चंद्रयान-3 का लैंडर चांद के दक्षिणी ध्रुव के पास उतर गया है. चांद के दक्षिणी ध्रुव के पास लैंडर उतारने वाला भारत, दुनिया का पहला देश बन गया है. वहीं, चांद की सतह पर लैंडर उतारने वाला चौथा देश बन गया है. 

इससे पहले सितंबर 2019 में भी इसरो ने चंद्रयान-2 को चांद के दक्षिणी ध्रुव के पास उतारने की कोशिश की थी. लेकिन तब हार्ड लैंडिंग हो गई थी. चांद के दक्षिणी ध्रुव पर भारत ही नहीं, बल्कि चीन और अमेरिका समेत दुनिया की नजरें भी हैं. चीन ने तो कुछ साल पहले दक्षिणी ध्रुव से कुछ दूरी पर लैंडर उतारा भी था. इतना ही नहीं, अमेरिका तो अगले साल दक्षिणी ध्रुव के पास अंतरिक्ष यात्रियों को भेजने की तैयारी भी कर रहा है.

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कैसा है दक्षिणी ध्रुव का इलाका?

जैसा पृथ्वी का दक्षिणी ध्रुव है, वैसा ही चांद का भी है. पृथ्वी का दक्षिणी ध्रुव अंटार्कटिका में है. पृथ्वी का सबसे ठंडा इलाका. ऐसा ही चांद का दक्षिणी ध्रुव है. सबसे ठंडा. 

चांद के दक्षिणी ध्रुव पर अगर कोई अंतरिक्ष यात्री खड़ा होगा, तो उसे सूर्य क्षितिज की रेखा पर नजर आएगा. वो चांद की सतह से लगता हुआ और चमकता नजर आएगा. 

इस इलाके का ज्यादातर हिस्सा छाया में रहता है. क्योंकि सूर्य की किरणें तिरछी पड़ती हैं. इस कारण यहां तापमान कम होता है.

ऐसा अंदाजा है कि हमेशा छाया में रहने और तापमान कम होने की वजह से यहां पानी और खनिज हो सकते हैं. इसकी पुष्टि पहले हुए मून मिशन में भी हो चुकी है.

वहां ऐसा क्या है?

अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने एक रिपोर्ट में बताया था कि ऑर्बिटरों से परीक्षणों के आधार पर कहा जा सकता है कि चांद के दक्षिणी ध्रुव के आसपास बर्फ है और यहां दूसरे प्राकृतिक संसाधन भी हो सकते हैं. फिर भी इस हिस्से के बारे में बहुत सी जानकारियां जुटाना है.

1998 में नासा के एक मून मिशन ने दक्षिणी ध्रुव के पास पर हाइड्रोजन की मौजूदगी का पता लगाया था. नासा का कहना है कि हाइड्रोजन की मौजूदगी वहां बर्फ होने का सबूत देती है.

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नासा की मानें तो चांद के दक्षिणी ध्रुव पर बड़े-बड़े पहाड़ और कई गड्ढे (क्रेटर्स) हैं. यहां सूरज की रोशनी भी बहुत कम पड़ती है. 

जिन हिस्सों पर सूरज की रोशनी आती है वहां 54 डिग्री सेल्सियस तक तापमान होता है. पर जिन हिस्सों पर सूरज की रोशनी नहीं पड़ती, वहां तापमान माइनस 248 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है. नासा का दावा है कि कई सारे क्रेटर्स ऐसे हैं जो अरबों साल से अंधेरे में डूबे हैं. यहां कभी सूरज की रोशनी नहीं पड़ी.

लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि पूरा दक्षिणी ध्रुव अंधेरे में ही डूबा रहता है. दक्षिणी ध्रुव के कई इलाके ऐसे भी हैं जहां सूरज की रोशनी आती है. उदाहरण के लिए, शेकलटन क्रेटर के पास कई ऐसी जगहें हैं जहां साल के 200 दिन सूरज की रोशनी रहती है.

चंद्रयान-3 का लैंडर जिस जगह उतरा है, वहां 15 दिन सूरज की रोशनी पड़ेगी और 15 दिन बाद फिर अंधेरा आ जाएगा. 23 तारीख को लैंडिंग कराने के पीछे एक वजह ये भी थी, क्योंकि अभी वहां रोशनी है. लेकिन 15 दिन बाद वो इलाका फिर अंधेरे में डूब जाएगा.

पानी या बर्फ मिली भी तो उससे होगा क्या?

चांद का दक्षिणी ध्रुव और उसके आसपास का इलाका काफी रहस्यमयी है. दुनिया अब तक इससे अनजान है. नासा के एक वैज्ञानिक का कहना है कि हम जानते हैं कि दक्षिणी ध्रुव पर बर्फ है और वहां दूसरे प्राकृतिक संसाधन भी हो सकते हैं. हालांकि, ये अब तक अनजान दुनिया ही है.

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नासा का कहना है कि चूंकि दक्षिणी ध्रुव के कई क्रेटर्स पर कभी रोशनी पड़ी ही नहीं और वहां का ज्यादातर हिस्सा छाया में ही रहता है, इसलिए वहां बर्फ होने की कहीं ज्यादा संभावना है. 

ऐसा भी अंदाजा है कि यहां जमा पानी अरबों साल पुराना हो सकता है. इससे सौरमंडल के बारे में काफी अहम जानकारियां हासिल करने में मदद मिल सकेगी.

नासा के मुताबिक, अगर पानी या बर्फ मिल जाती है तो इससे हमें ये समझने में मदद मिलेगी कि पानी और दूसरे पदार्थ सौरमंडल में कैसे घूम रहे हैं. उदाहरण के लिए, पृथ्वी के ध्रुवीय क्षेत्रों से मिली बर्फ से पता चला है कि हमारे ग्रह की जलवायु और वातावरण हजारों साल में किस तरह से विकसित हुई है.

पानी या बर्फ मिल जाती है तो उसका इस्तेमाल पीने के लिए, उपकरणों को ठंडा करने, रॉकेट फ्यूल बनाने और शोधकार्य में किया जा सकेगा.

वहां पहुंचना कितना मुश्किल?

चांद का दक्षिणी ध्रुव अजीब जगह है. सबसे बड़ी चुनौती तो यहां का अंधेरा ही है. यहां पर चाहे लैंडर उतारना हो या किसी अंतरिक्ष को, काफी मुश्किल है. क्योंकि चांद पर पृथ्वी की तरह वायुमंडल नहीं है. 

नासा का तो ये भी कहना है कि हम कितनी भी बेहतरीन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर लें और कितना ही एडवांस्ड लैंडर वहां उतार दें, तब भी ये बता पाना मुश्किल है कि दक्षिणी ध्रुव की जमीन दिखती कैसी है. और कुछ सिस्टम तो बढ़ते-घटते तापमान के कारण खराब भी हो सकते हैं.

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हालांकि, दुनिया इस हिस्से तक पहुंचने की कोशिश कर रही है. नासा अगले साल दक्षिणी ध्रुव पर अंतरिक्ष यात्रियों को भेजने की तैयारी कर रहा है. 

चंद्रयान-3 का मकसद क्या?

चंद्रयान-3 का भी वही मकसद है, जो चंद्रयान-2 का था. यानी, चांद के दक्षिणी ध्रुव के पास सॉफ्ट लैंडिंग करना. और इसमें इसरो कामयाब रहा है. इसरो के इस तीसरे मून मिशन की लागत करीब 615 करोड़ रुपये बताई जा रही है. 

इसरो के मुताबिक, चंद्रयान-3 के तीन मकसद हैं. पहला- लैंडर की चांद की सतह पर सुरक्षित और सॉफ्ट लैंडिंग करना. दूसरा- रोवर को चांद की सतह पर चलाकर दिखाना. और तीसरा- वैज्ञानिक परीक्षण करना. पहला और सबसे कठिन पड़ाव पार हो चुका है. 

लैंडर के साथ तीन और रोवर के साथ दो पेलोड हैं. पेलोड को हम आसान भाषा में मशीन भी कह सकते हैं. 

रोवर भले ही लैंडर से बाहर आ जाएगा, लेकिन ये दोनों आपस में कनेक्ट होंगे. रोवर को जो भी जानकारी मिलेगी, वो लैंडर को भेजेगा और वो इसरो तक. 

लैंडर और रोवर के पेलोड चांद की सतह का अध्ययन करेंगे. ये चांद की सतह पर मौजूद पानी और खनिजों का पता लगाएंगे. सिर्फ यही नहीं, इनका काम ये भी पता करना है कि चांद पर भूकंप आते हैं या नहीं.

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