दिल्ली के छावला रेप केस में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को जो फैसला सुनाया, उसने पीड़ित परिवार को तो बड़ा झटका दिया ही, कई सामाजिक संस्थाएं भी आक्रोशित नजर आईं. सुप्रीम कोर्ट ने छावला रेप केस के तीनों आरोपियों को बरी करने का फैसला सुना दिया था. तर्क दिया गया था कि कोर्ट के समक्ष पर्याप्त सबूत पेश नहीं किए गए, पुलिस की जांच में भी कई तरह की खामी रही. इस वजह से तीनों आरोपियों को बरी किया गया.
पीड़ित की मां ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से पीड़ित परिवार खासा खफा है. आजतक ने जब पीड़ित की मां से बात की तो उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि कोर्ट का फैसला उनके लिए किसी शॉक से कम नहीं है. वे इस फैसले से बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं हैं. एक सामाजिक कार्यकर्ता ने भी इसी कड़ी में कहा कि ऐसे अपराधों के लिए सिर्फ मौत ही सजा होनी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट को भी सख्त फैसला सुना एक उदाहरण सेट करना चाहिए था.
पुनर्विचार याचिका क्या होती है?
लेकिन अब जब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का रुख स्पष्ट हो चुका है, क्या पीड़ित का परिवार अभी भी न्याय की उम्मीद लगा सकता है? क्या सुप्रीम कोर्ट के किसी फैसले को भी चुनौती दी जा सकती है? अब इस सवाल का जवाब जरूर हां में है लेकिन वो प्रक्रिया काफी जटिल है और कई तरह के किंतु-परंतु लग जाते हैं. कानून में किसी भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले को रिव्यू किया जा सकता है. संविधान का आर्टिकल 137 कहता है कि सुप्रीम कोर्ट ही अपने किसी फैसला का रिव्यू कर सकता है. लेकिन बड़ी शर्त ये रहती है कि सुप्रीम कोर्ट को ये लगना चाहिए कि उनके पिछले फैसले मे कोई चूक थी. पुनर्विचार याचिका दायर करने वाली पार्टी अगर ये साबित कर पाती है, तब सुप्रीम कोर्ट अपने ही फैसले को रिव्यू करती है.
पुनर्विचार याचिका के नियम क्या?
बड़ी बात ये रहती है कि जो भी पुनर्विचार याचिका दायर करता है, उसमें ये स्पष्ट होना चाहिए कि ये फैसले पर पहली बार पुनर्विचार याचिका दायर की गई है और इसे फाइल करते समय हर नियम का ध्यान रखा गया. इसके अलावा किसी भी मामले में आदेश के तीस दिन के भीतर पुनर्विचार याचिका दायर की जा सकती है. वो याचिका भी उन्हीं जजों के पास जाती है, जिन्होंने उस मामले में पहले फैसला सुनाया था. अब छावला रेप केस में क्योंकि यूयू ललित रिटायर हो चुके हैं, ऐसे में अगर पुनर्विचार याचिका दायर होती है तो वो उन दो जजों के पास जाएगी जिन्होंने पहले भी इस मामले में अपना फैसला दिया था. ऐसे मामलों में कोर्ट या तो उस याचिका को खारिज कर सकता है या फिर उसकी तरफ से दूसरी पार्टी को नोटिस दिया जा सकता है.
सुप्रीम कोर्ट का फैसला गलत या सही?
अब पुनर्विचार याचिका के नियम तो समझ आ गए, लेकिन लोगों के मन में छावला रेप केस पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर भी कई सवाल हैं. इस बात पर गुस्सा जाहिर किया जा रहा है कि आरोपियों को एक जघन्य अपराध के लिए छोड़ दिया गया. लेकिन कानून के जानकार मानते हैं कि कोर्ट कभी भी जज्बातों से नहीं चलता है, उसे कुछ भी सिद्ध करने के लिए सबूत चाहिए. इस बारे में आजतक से बात करते हुए एडवोकेट ऋषि मल्होत्रा बताते हैं कि अगर ऑन रिकॉर्ड कोई भी सबूत पेश नहीं किया जाता है, ऐसी स्थिति में केस क्लोज कर दिया जाता है. कोर्ट सबूत मांगता है और क्योंकि इस मामले में वो सबूत स्पष्ट नहीं थे, ऐसे में कोर्ट मॉरल कनविक्शन नहीं कर सकता है. सुप्रीम कोर्ट तो सिर्फ सबूतों के आधार पर फैसला सुनाता है.
ऋषि मल्होत्रा ने इस बात पर नाराजगी जाहिर की कि देश की न्यायपालिका में खराब या लापरवाही वाली जांच के लिए कोई कड़ा कानून नहीं है. ज्यादा से ज्यादा उन पुलिस अधिकारियों पर जांच बैठ सकती है, लेकिन जिन आरोपियों को बरी कर दिया गया, उन्हें फिर सजा हो जाए, ये मुश्किल रहता है. अब ऋषि के तर्क तो एकदम स्पष्ट हैं, एडवोकेट जय अनंत देहद्राई तो जोर देकर कहते हैं कि कोर्ट कभी भी बदले की भावना से कोई फैसला नहीं सुनाता है. उसे हर कीमत पर निष्पक्ष रहना होता है, वो सिर्फ तथ्यों और सबूतों के आधार पर ही कोई फैसला लेता है. छावला रेप मामले में जय अनंत मानते हैं कि लापरवाही और गलती दिल्ली पुलिस की तरफ से रही है, इसमें सुप्रीम कोर्ट को दोष देना गलत है.
क्या है छावला रेप केस?
14 फरवरी 2012 को उत्तराखंड की 'निर्भया' अपने काम पर जाने के लिए घर से निकली थी. उस दिन वो देर शाम तक घर नहीं लौटी तो परिजन चिंतित हुए. घबराए परिजनों ने उसकी काफी तलाश की। लेकिन कोई सुराग नहीं लगा. बहुत खोजने के बाद इतनी सूचना जरूर मिली कि कुछ लोग एक लड़की को गाड़ी में डालकर दिल्ली से बाहर ले जाते हुए दिखाई दिए हैं. इस मामले में दोषियों ने लड़की के साथ रेप के साथ उसे असहनीय यातना भी दी थी. लड़की को कार में इस्तेमाल होने वाले औजारों से पीटा गया, उसके शरीर को जगह जगह सिगरेट से दागा गया था और उसके चेहरे को तेजाब से जलाया गया था. इसके बाद अभियुक्त गिरफ्तार किए गए थे. दिल्ली की अदालत ने 19 साल की युवती से रेप और हत्या के दोषी ठहराए जाने के बाद मौत की सजा सुनाई थी. इस फैसले को सही मनाते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने भी फांसी की सजा पर मुहर लगा दी थी. इसके बाद दोषियों की तरफ से सजा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की गयी थी.
सुप्रीम कोर्ट ने क्या तर्क दिया
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में आरोपियों को बरी तो किया है, लेकिन इस बात पर भी जोर दिया है कि जांच के दौरान कई बातें स्पष्ट नहीं हो पाईं. सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि अभियोग पक्ष आरोपियों के खिलाफ आरोप सिद्ध करने में फेल हुआ है. ये भी कहा गया है कि सुनवाई के दौरान अभियोग पक्ष ने 49 चश्मदीदों को एग्जामिन किया था, लेकिन उनमें से 10 चश्मदीदों को एक बार भी क्रॉस एग्जामिन नहीं किया गया. कोर्ट ने इस बात पर भी जोर दिया है कि जांच के दौरान ASI द्वारा मृतक के शरीर के जो बाल मिला था, वो काफी संदिग्ध है.